Surya Grahan 2025: 21 सितंबर यानी आज साल 2025 का आखिरी सूर्य ग्रहण लगेगा. यह एक आंशिक सूर्य ग्रहण होगा, जिसमें चंद्रमा सूर्य के एक हिस्से को ढक लेगा. इस दौरान सूर्य अर्धचंद्राकार आकार में दिखाई देगा.
भारत में यह ग्रहण नजर नहीं आएगा, लेकिन ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और अंटार्कटिका के कुछ हिस्सों में इसे देखा जा सकेगा. भारतीय समयानुसार ग्रहण की शुरुआत रात 11 बजे होगी, इसका पीक टाइम 1 बजकर 11 मिनट पर होगा और समापन 22 सितंबर की रात 3 बजकर 23 मिनट पर होगा.
धर्म, ज्योतिष को मानने वाले ग्रहण को लेकर आगाह करते हैं. कहीं कहा जा रहा है कि ग्रहण के दौरान खाना नहीं खाना चाहिए, तो कहीं दावा किया जा रहा है कि गर्भवती महिलाएं अगर इस दौरान बाहर निकलेंगी तो बच्चे को नुकसान होगा. लेकिन वैज्ञानिक इसे नहीं मानते .आइये जानते हैं इस पर विज्ञान क्या कहता है.
मिथक 1: गर्भवती महिला पर ग्रहण का असर
सबसे बड़ा डर यही फैलाया जाता है कि अगर गर्भवती महिला ग्रहण के दौरान बाहर निकले तो बच्चे के शरीर पर दाग या जन्मजात निशान हो जाते हैं.
विज्ञान क्या कहता है?
वैज्ञानिक शोध और मेडिकल स्टडीज साफ बताते हैं कि इसका कोई आधार नहीं है. बच्चे की शारीरिक बनावट और त्वचा की विशेषताएं डीएनए, जेनेटिक फैक्टर, मां के स्वास्थ्य और गर्भावस्था के दौरान पोषण पर निर्भर करती हैं, न कि ग्रहण जैसी खगोलीय घटनाओं पर. अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि ग्रहण के दौरान बाहर निकलने से भ्रूण पर कोई नकारात्मक असर पड़ता है.
मिथक 2: ग्रहण में खाना जहरीला हो जाता है
अक्सर कहा जाता है कि सूर्यग्रहण के समय बनाया या रखा हुआ खाना ज़हरीला हो जाता है और इसे खाना नुकसानदायक है.
विज्ञान क्या कहता है?
खाना और ग्रहण का कोई रिश्ता नहीं है. ग्रहण सिर्फ खगोलीय घटना है, जिसका भोजन की गुणवत्ता पर कोई असर नहीं पड़ता. दरअसल, पुराने समय में जब रेफ्रिजरेशन और स्टोरेज की सुविधा नहीं थी, तब गर्मी और नमी में खाना जल्दी खराब हो जाता था. धीरे-धीरे यह धारणा जुड़ गई कि इसकी वजह ग्रहण है, जबकि असलियत में ऐसा नहीं है.
मिथक 3: ग्रहण से पानी और पौधे दूषित हो जाते हैं
अंधविश्वासों में अक्सर कहा जाता है कि चंद्रग्रहण या सूर्यग्रहण के दौरान रखा हुआ पानी पीने योग्य नहीं रहता और पौधों पर भी इसका बुरा असर पड़ता है।
विज्ञान क्या कहता है?
ग्रहण का पानी या पौधों पर कोई वैज्ञानिक प्रभाव नहीं पड़ता. यह सिर्फ एक खगोलीय घटना है, जिसका प्राकृतिक संसाधनों की शुद्धता या जीवों की सेहत से कोई संबंध नहीं है. पानी उतना ही सुरक्षित रहता है जितना ग्रहण से पहले था, और पौधे भी वैसे ही बढ़ते रहते हैं. यानी यह धारणा पूरी तरह अंधविश्वास है, जिसका हकीकत से कोई लेना-देना नहीं.
मिथक 4: ग्रहण के दौरान स्नान-पूजा न करने पर पाप लगता है
कई मान्यताओं के मुताबिक ग्रहण के समय अगर स्नान, मंत्रोच्चार या विशेष पूजा न की जाए तो इसे अपशकुन माना जाता है और व्यक्ति पर पाप लगने की आशंका जताई जाती है.
विज्ञान क्या कहता है?
ये धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं हैं, जिनकी जड़ें आस्था और रीति-रिवाजों में हैं, लेकिन विज्ञान के अनुसार ग्रहण का मानव कर्मों या पाप-पुण्य से कोई संबंध नहीं. यह केवल एक खगोलीय घटना है, जिसका असर इंसान की आध्यात्मिक या नैतिक गतिविधियों पर नहीं पड़ता.
मिथक 5: ग्रहण से भूकंप, बाढ़ जैसी आपदाएं आती हैं
लोगों के बीच यह डर भी फैलाया जाता है कि ग्रहण लगते ही धरती पर कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा जैसे भूकंप, बाढ़ या सुनामी आ सकती है.
विज्ञान क्या कहता है?
ग्रहण का प्राकृतिक आपदाओं से कोई लेना-देना नहीं है. यह सिर्फ सूर्य, पृथ्वी की एक खगोलीय स्थिति है. अब तक हुए वैज्ञानिक अध्ययनों में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि ग्रहण और प्राकृतिक आपदाओं के बीच कोई संबंध हो.
मिथक 6: ग्रहण से सेहत बिगड़ती है
कई बार कहा जाता है कि ग्रहण लगते ही लोग बीमार पड़ सकते हैं, चक्कर आ सकते हैं या उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है.
विज्ञान क्या कहता है?
अब तक ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला कि ग्रहण का इंसानी सेहत पर कोई सीधा असर होता है. अगर किसी को ग्रहण के दौरान कमजोरी या घबराहट महसूस होती है तो वह डर, वहम या मानसिक दबाव की वजह से होता है, जिसे मनोविज्ञान में प्लेसिबो/नोसिबो इफेक्ट कहा जाता है. यानी ग्रहण सेहत पर असर नहीं डालता, बल्कि हमारी सोच और मान्यताएं ही हमें बीमार महसूस करा सकती हैं.