पाकिस्तान सरकार ने एक ऐसा फैसला लिया है, जिसका असर सीधे करोड़ों महिलाओं की जिंदगी पर पड़ सकता है. वहां एक एक मंत्री ने इसका ऐलान किया है. इस टैक्स की वजह से पाकिसतान की करोड़ों महिलाएं पीरियड जैसे संवेदनशील समय में सैनेटरी पैड की कीमत ज्यादा होने की वजह से इसका इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं.
यूनिसेफ के मुताबिक पाकिस्तान में सिर्फ 12% महिलाएं ही बाजार में मिलने वाले सैनिटरी पैड का इस्तेमाल कर पाती हैं और बाकी ज्यादातर महिलाएं कपड़े या घरेलू विकल्पों के सहारे रहती हैं. ऐसे हालात यहां लागू पीरियड टैक्स की वजह से है. ऐसे में इस टैक्स को हटाने का फैसला बड़ी राहत दे सकत है. लेकिन सवाल यह है कि आखिर पीरियड टैक्स क्या है और इसके हटने से क्या वास्तव में हालात बदल जाएंगे?
द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने घोषणा की है कि सैनिटरी पैड और महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े जरूरी उत्पादों पर लगने वाला सेल्स टैक्स हटाया जाएगा. उन्होंने कहा कि ये उत्पाद महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान और सामाजिक जीवन में भागीदारी के लिए जरूरी हैं, इसलिए इन्हें लग्जरी आइटम की तरह टैक्स के दायरे में नहीं रखा जाना चाहिए.इस फैसले का महिला अधिकार संगठनों और पीरियड हेल्थ पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया है.
आखिर क्या होता है पीरियड टैक्स?
पीरियड टैक्स वह टैक्स है, जो सैनिटरी पैड, टैम्पोन और मासिक धर्म से जुड़े अन्य उत्पादों पर लगाया जाता है. पाकिस्तान में स्थानीय स्तर पर बनने वाले सैनिटरी उत्पादों पर 18% सेल्स टैक्स लगता था. वहीं आयातित उत्पादों पर 25% अतिरिक्त कस्टम ड्यूटी भी लगती थी. टाइम मैगजीन की रिपोर्ट के अनुसार, इन सभी टैक्स और शुल्कों की वजह से सैनिटरी उत्पादों की कीमत बाजार में 40% तक बढ़ जाती थी.
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क था कि जिस चीज की जरूरत महिलाओं को हर महीने पड़ती है, उसे लग्जरी सामान की तरह टैक्स करना गलत है. इसी वजह से इसे 'पिंक टैक्स' या 'पीरियड टैक्स' कहा जाने लगा.
पीरियड टैक्स की वजह से कैसी है पाकिस्तान की स्थिति?
महंगे सैनिटरी उत्पादों का सबसे ज्यादा असर गरीब और ग्रामीण इलाकों की महिलाओं पर पड़ता है. यूनिसेफ के आंकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तान में सिर्फ 12% महिलाएं ही बाजार में मिलने वाले सैनिटरी पैड या टैम्पोन का इस्तेमाल करती हैं. बाकी अधिकांश महिलाएं पुराने कपड़े या घर में उपलब्ध अन्य विकल्पों का सहारा लेती हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि बार-बार इस्तेमाल किए जाने वाले कपड़े अगर ठीक से साफ न हों तो इससे त्वचा संबंधी समस्याएं, रैशेज और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है.कई लड़कियों के लिए यह शिक्षा में भी बाधा बन जाता है. पीरियड्स के दौरान पर्याप्त सुविधाएं न होने के कारण वे स्कूल नहीं जा पातीं.
एक लड़की की कहानी बताती है असली समस्या
द गार्जियन की रिपोर्ट में सिंध प्रांत की 15 वर्षीय अजीमा का जिक्र किया गया है. 2022 में आई विनाशकारी बाढ़ के दौरान उसका परिवार बेघर हो गया था. इसी दौरान उसे पहली बार पीरियड्स हुए.
अजीमा बताती है कि उसकी मां ने उसे इस्तेमाल के लिए कपड़े का एक टुकड़ा दिया, क्योंकि सैनिटरी पैड खरीदना संभव नहीं था. इससे उसे रैशेज, बुखार और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा. आज भी उसका परिवार कपड़े का ही इस्तेमाल करता है क्योंकि पैड उनके लिए बहुत महंगे हैं.
क्या टैक्स हटने से सब कुछ बदल जाएगा?
संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि इससे ज्यादा लड़कियां स्कूल में बनी रह सकेंगी और महिलाओं के लिए काम करना आसान होगा. हालांकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ टैक्स हटाना ही पर्याप्त नहीं है.
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महवारी जस्टिस नामक संगठन की निदेशक बुशरा महनूर का कहना है कि मासिक धर्म न्याय का मतलब सिर्फ सस्ते पैड नहीं है. इसके लिए साफ पानी, स्वच्छ शौचालय, सही जानकारी और पीरियड्स से जुड़े सामाजिक कलंक को खत्म करना भी जरूरी है.
किस महिला ने शुरू की यह लड़ाई?
इस बदलाव के पीछे 25 वर्षीय पाकिस्तानी वकील महनूर ओमर की बड़ी भूमिका रही है. रावलपिंडी की रहने वाली महनूर ओमर ने पिछले साल पाकिस्तान सरकार के खिलाफ अदालत में याचिका दायर की थी. उनका सवाल सीधा था—जब सरकार दूध, पनीर और पशुपालन से जुड़े कई उत्पादों को आवश्यक वस्तु मानकर टैक्स से छूट दे सकती है, तो हर महीने करोड़ों महिलाओं की जरूरत बनने वाले सैनिटरी पैड को जरूरी वस्तु क्यों नहीं माना जाता?
महनूर का तर्क था कि महिलाओं की जैविक जरूरतों पर टैक्स लगाना लैंगिक असमानता को बढ़ावा देता है. उनकी कानूनी लड़ाई को सोशल मीडिया पर भारी समर्थन मिला. हजारों लोगों ने ऑनलाइन याचिका पर हस्ताक्षर किए और यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया.
अदालत से सड़क तक चली मुहिम
महनूर ओमर की मुहिम को 'महवारी जस्टिस' नाम के युवा संगठन का भी समर्थन मिला. यह संगठन गरीब समुदायों में महिलाओं को पीरियड हेल्थ के बारे में जागरूक करता है और जरूरतमंदों तक सैनिटरी उत्पाद पहुंचाता है.
महनूर फिलहाल लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में जेंडर, पीस एंड सिक्योरिटी की पढ़ाई कर रही हैं. उनका कहना है कि यह सिर्फ शुरुआत है और वह महिलाओं तथा जेंडर माइनॉरिटी के अधिकारों के लिए आगे भी लड़ती रहेंगी.
क्या बदलेगी तस्वीर?
पाकिस्तान में पीरियड टैक्स हटाने का फैसला निश्चित रूप से एक बड़ा कदम माना जा रहा है. इससे सैनिटरी उत्पादों की कीमतें कम हो सकती हैं और लाखों महिलाओं के लिए इन्हें खरीदना आसान हो सकता है.
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि असली बदलाव तब आएगा, जब सस्ते सैनिटरी उत्पादों के साथ-साथ साफ पानी, बेहतर स्वच्छता सुविधाएं और पीरियड्स को लेकर समाज में फैली झिझक भी खत्म होगी. फिलहाल यह फैसला उस दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम जरूर माना जा रहा है.