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हमले का दर्द और जिंदगी की उम्मीद के एक साल... पहलगाम की वादियां, टूरिस्ट प्लेस और बाजार अब कैसे हैं?

कहते हैं हर जख्म भरने के लिए वक्त लगता है. एक साल पहले पहलगाम भी एक गहरे जख्म से गुजरा था. लेकिन क्या अब वो जख्म भर पाए हैं. आइए जानते हैं वहां के हालात.

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इस हमले की पहली बरसी पर पूरे इलाके में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है (Photo: PTI)
इस हमले की पहली बरसी पर पूरे इलाके में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है (Photo: PTI)

22 अप्रैल 2025 की उस सुबह, पहलगाम की बैसरन घाटी में आसमान बिल्कुल साफ था. हवा में वसंत की महक थी और मौसम अपने पूरे शबाब पर था. हरी-भरी चरागाहों पर पर्यटक हंसते-खेलते घोड़े की सवारी कर रहे थे, कुछ पिकनिक मना रहे थे-जैसे कोई साधारण, खुशहाल दिन हो.

किसी को दूर-दूर तक अंदाजा नहीं था कि कुछ ही घंटों में यही खूबसूरत घाटी एक गहरे जख्म की कहानी बन जाएगी. दोपहर करीब दो बजे अचानक AK-47 और M4 कार्बाइनों की गोलियों की बौछार शुरू हो गई. तीन से ज्यादा हथियारबंद आतंकवादियों ने बैसरन की ऊंची घाटी में अंधाधुंध फायरिंग कर दी. इस हमले में 26 निर्दोष लोग मारे गए जिनमें 25 पर्यटक (ज्यादातर हिंदू, एक नेपाली नागरिक और एक ईसाई युवक सहित) और एक स्थानीय मुस्लिम घोड़े वाला शामिल था.

आज 22 अप्रैल 2026 है. पहलगाम हमले को एक साल पूरा हो चुका है. ऐसे में सवाल यही है-क्या ये जख्म भर पाए हैं या अब भी नासूर बन गए हैं?

पहलगाम: बदली तस्वीर, फीकी पड़ी रौनक

हमले के बाद पहलगाम की तस्वीर काफी बदल चुकी है. आजतक के रिपोर्टर मीर फरीद की रिपोर्ट एक ऐसी हकीकत सामने लाती है, जहां प्राकृतिक खूबसूरती तो अब भी मौजूद है, लेकिन उसकी रौनक पहले जैसी नहीं रही.

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अप्रैल का महीना, जो कभी पर्यटन का पीक सीजन माना जाता था, अब पहले जैसा नहीं दिखता. यही वो समय होता था जब पहलगाम अपने सबसे खूबसूरत रूप में नजर आता था.ऊपर पहाड़ों पर जमी बर्फ और नीचे फैली हरियाली, जो हजारों पर्यटकों को अपनी ओर खींचती थी.

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लेकिन अब हालात बदल गए हैं. पर्यटकों की संख्या पहले की तुलना में काफी कम हो गई है. जो जगहें कभी भीड़ से भरी रहती थीं, वहां अब सन्नाटा नजर आता है.

मुंबई में पहलगाम हमले की बरसी से पहले श्रद्धांजलि पेंटिंग बनाई गई.(Photo: PTI)

मेन मार्केट की रौनक भी कम हुई

इस बदलाव का असर पहलगाम के मेन मार्केट पर भी साफ दिखाई देता है. यह वही बाजार है, जहां इस सीजन में हमेशा चहल-पहल रहती थी. अब दुकानों के सामने कम भीड़ है, आवाजाही घटी है और कारोबार पर इसका सीधा असर पड़ा है. स्थानीय लोगों के लिए यह सिर्फ माहौल का बदलाव नहीं, बल्कि रोजी-रोटी का संकट बन गया है.

सुरक्षा व्यवस्था और सख्त हुई

हमले के बाद सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था को और कड़ा कर दिया है. पहाड़ों में गश्त बढ़ा दी गई है और कई इलाकों को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है. सुरक्षा बल लगातार निगरानी में हैं और संवेदनशील क्षेत्रों में आम लोगों की आवाजाही पर रोक है. अब इन इलाकों में बिना अनुमति कोई भी नहीं जा सकता. पहले जहां सुरक्षा मुख्य रूप से सड़कों तक सीमित थी, अब यह पहाड़ियों और घाटियों तक फैल गई है.

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बैसरन घाटी अब भी बंद

हमले का केंद्र रही बैसरन घाटी आज भी आम पर्यटकों के लिए बंद है. यह घाटी पहाड़ों के बीच बसी एक बेहद खूबसूरत जगह थी, जहां पर्यटक ट्रेकिंग और घुड़सवारी के जरिए पहुंचते थे. गाइड रास्ते में कई व्यू पॉइंट्स दिखाते थे, जिनमें बैसरन अंतिम पड़ाव होता था लेकिन अब वहां कड़ी सुरक्षा तैनाती है और आम पर्यटकों के लिए रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया गया है.

बैसरान मेमोरियल, पहलगाम आतंकी हमले के शहीदों की याद में बनाया गया स्थल (Photo: PTI)

रोजी-रोटी पर पड़ा असर

बैसरान घाटी के बंद होने का असर स्थानीय लोगों की आजीविका पर भी पड़ा है. घोड़े वाले, जो पर्यटकों को घाटी तक ले जाते थे, अब काम की कमी का सामना कर रहे हैं. उनकी आय का बड़ा हिस्सा इसी पर्यटन गतिविधि पर निर्भर था, जो अब प्रभावित हो चुका है.

हमले के एक साल बाद भी परिवारों की तस्वीरें और खून से सने मैदान लोगों के दिलों में ताजा हैं. (Photo:PTI)

पर्यटकों के अनुभव में बदलाव

हाल ही में पहलगाम घूमकर लौटीं रिया बताती हैं कि अब यहां पहले जैसी बात नहीं रही. रिया, जो तीसरी बार कश्मीर आई थीं, कहती हैं कि बैसरन वैली जहां एक साल पहले हमला हुआ था. आज भी पूरी तरह बंद है. वहां अब कुछ नहीं बचा, सिर्फ सुरक्षा बलों की भारी तैनाती है.

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इस हमले की पहली बरसी पर पूरे इलाके में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है (Photo:PTI)

वह बताती हैं कि पहले ट्रेक के दौरान घोड़े वाले आठ-नौ खूबसूरत व्यू पॉइंट्स दिखाते थे, जिनमें आखिरी बैसरन घाटी होती थी. लेकिन अब वो रास्ते बंद कर दिए गए हैं और पर्यटक सिर्फ एक छोटी-सी जगह, सीएम हट तक ही जा पाते हैं.

रिया कहती हैं कि मैं वहां नहीं गई. पहलगाम के महंगे होटल भी इस वसंत सीजन में काफी खाली दिखे. जहां हम रुके थे, वहां हमारे अलावा कोई और मेहमान नहीं था.

सख्त चेकिंग और बदला माहौल

रिया के मुताबिक, इस बार सुरक्षा व्यवस्था हर जगह ज्यादा सख्त नजर आई. पहले डिफेंस या आर्मी की गाड़ियों में इतनी चेकिंग नहीं होती थी, लेकिन अब हर जगह सख्त वेरिफिकेशन हो रहा है. उनका परिवार इस बार कटरा से बदगाम तक पैसेंजर ट्रेन से गया, जहां पर्यटकों की संख्या काफी कम थी.

उनकी बातों में एक अनकही निराशा झलकती है. वह बताती हैं कि पहले भी कई बार कश्मीर आ चुकी हैं, लेकिन इस बार का माहौल अलग था. ज्यादा सतर्क और कम रौनक वाला.

नई सुरक्षा व्यवस्था: QR कोड और सख्त निगरानी

पिछले एक साल में पहलगाम की सुरक्षा व्यवस्था में कई बदलाव हुए हैं. QR कोड आधारित वेरिफिकेशन सिस्टम शुरू किया गया है. अब घोड़े वाले, गाइड, हॉकर, फोटोग्राफर और अन्य टूरिज्म सर्विस प्रोवाइडर्स को पुलिस वेरिफिकेशन के बाद यूनिक QR कोड दिया जाता है. पर्यटक इसे स्कैन करके उनकी पहचान और जानकारी देख सकते हैं.

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इसके साथ ही एंट्री पॉइंट्स पर चेकिंग बढ़ा दी गई है और सर्विलांस भी मजबूत किया गया है. सड़क, ट्रेक और टूरिस्ट स्पॉट्स हर जगह सख्त वेरिफिकेशन हो रहा है. पहाड़ी इलाकों, घाटियों और संवेदनशील जगहों पर पेट्रोलिंग और गश्त भी बढ़ा दी गई है. अब पर्यटक स्थलों पर आर्मी और जम्मू-कश्मीर पुलिस की मौजूदगी पहले से कहीं ज्यादा नजर आती है.

अब भी बाकी है डर और इंतजार

मीर फरीद की रिपोर्ट के मुताबिक, पहलगाम हमले के बाद यह इलाका पूरी तरह बदल चुका है. एक साल बीत जाने के बाद भी उस दिन के जख्म पूरी तरह नहीं भरे हैं. आज भी कई लोग पहलगाम का नाम लेते समय सोचते हैं कि वहां जाएं या नहीं. हालांकि, पर्यटन धीरे-धीरे लौट रहा है, लेकिन उम्मीद अब भी यही है कि एक दिन पहलगाम अपनी पुरानी रौनक फिर से हासिल कर सके.

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