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'या तो चुप्पी, या फिर भावनाओं का सैलाब...', पहलगाम हमले का एक साल

पहलगाम अटैक के 365 दिन पूरे हो गए. 1 वर्ष का ये समय कुछ परिवारों के लिए अत्यंत पीड़ा का समय रहा है. बीते एक वर्षों में जम्मू-कश्मीर में उम्मीद लौट रही है, लेकिन ये गुजरा समय न भरने वाला जख्म दे गया है.

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पहलगाम शहर के एंट्रेंस पर सुरक्षा में तैनात भारतीय सेना का जवान.  (Photo: ITG/Anand singh)
पहलगाम शहर के एंट्रेंस पर सुरक्षा में तैनात भारतीय सेना का जवान. (Photo: ITG/Anand singh)

पिछले साल जब तक बैसरन घाटी में गोलियों की गूंज नहीं सुनाई दी थी तब तक ऐसा लग रहा था कि कश्मीर में फिर से बहार लौट आई है. यह सचमुच की बहार नहीं थी बल्कि एक उम्मीद थी, नए जीवन की, विकास की, और शायद सबसे जरूरी, उम्मीद की. 

पिछले साल 22 मार्च को पहलगाम में लिद्दर नदी के किनारे स्थित होटल हीवन पर्यटकों से खचाखच भरा हुआ था. होटल परिसर के अंदर कैफे विलो में एक ठंडी शाम को दर्जनों लोग कतार में खड़े थे. यह बैसरन घाटी में हुए नरसंहार से ठीक एक महीना पहले की बात है. मार्च का महीना होने के बावजूद हैरानी की बात यह थी कि बर्फ़ अभी भी वहां मौजूद थी. नदी के पथरीले किनारे के सामने बने वेटिंग एरिया में लोगों को बस एक कप गर्म कॉफी और एक गर्म खाने की ही फिक्र थी. अपनी जान का डर किसी के मन में नहीं था. 

एक महीने बाद वही होटल लगभग खाली पड़ा था. वहां बस कुछ पत्रकार, उनकी कैमरा टीमें और होटल का स्टाफ़ ही मौजूद था. वहां से महज़ सात किलोमीटर दूर पाकिस्तानी आतंकवादियों ने 26 बेकसूर नागरिकों को गोलियों से भून दिया था. छुट्टियों पर आए लोगों की पहचान उनके धर्म के आधार पर की गई और फिर उन्हें बेहद करीब से गोली मार दी गई. और यह सब उनके अपने प्रियजन अपनी आंखों के सामने दहशत में देखते रह गए. 

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कश्मीर के साथ जुड़ा वह घिसा-पिटा जुमला कि यह संघर्षों की धरती है. एक बार फिर लौट आया था और उसने वसंत के एहसास को ही दबा दिया था. 

लेकिन कश्मीर का आतंकवाद के साथ जो सामना रहा है उसमें अब एक खास पैटर्न नजर आता है. दिल दहला देने वाली सबसे भयानक घटनाओं के बावजूद यहां उम्मीद हमेशा लौट आती है; और पिछले चार दशकों से यही सच रहा है. कभी-कभी यह उम्मीद पर्यटकों के रूप में आती है और कभी-कभी यह स्थानीय लोगों के उस हौसले के रूप में दिखाई देती है जिसके सहारे वे अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाते रहते हैं. 

आज वही उम्मीद एक बार फिर घाटी में लौट रही है. एक तरफ जहां स्थानीय लोग अपनी जिंदगी को फिर से संवार रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पर्यटक भी कश्मीर का रुख कर रहे हैं.

आज कश्मीर में पर्यटन की स्थिति कैसी है?

किसी आम कश्मीरी से पूछिए कि वे यहां की पूरी स्थिति के बारे में आम तौर पर कैसा महसूस करते हैं, तो अक्सर उनका जवाब इन दो में से किसी एक तरह का होता है- या तो पूरी तरह चुप्पी, या फिर भावनाओं का सैलाब. 

पहलगाम में लिद्दर नदी की एक तस्वीर. (Photo: ITG)

आखिरकार दुनिया के सबसे ज़्यादा सेना वाले इलाकों में से एक में पूरी तरह से सामान्य स्थिति की कल्पना करना मुश्किल है. वो भी तब जब यहां आतंकवाद को बाहरी ताकतें स्पॉन्सर करती हैं और जहां हिंसा की वजह से लोगों की जिंदगी लंबे समय से तबाह रही हो.

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लेकिन इन सब बातों के बावजूद पर्यटक हमेशा यहां वापस आते रहे हैं. एक वरिष्ठ पत्रकार जिन्होंने लगभग ढाई दशकों तक जम्मू-कश्मीर की रिपोर्टिंग की है, कहते हैं कि कश्मीर में पर्यटन अक्सर सामान्य स्थिति का एक साफ पैमाना होता है. भले ही यह अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा ज़रिया न हो. 

इंडिया टुडे डिजिटल से बात करने वाले स्थानीय लोगों ने बताया कि पर्यटकों की आमद लगभग शून्य से बढ़कर उस स्तर के लगभग 50% तक पहुंच गई है जो पहलगाम हमले से पहले थी. 

यह रिकवरी टूरिज़्म इकॉनमी और उससे जुड़े लोगों के लिए बहुत मुश्किल भरे दौर के बाद आई है.

श्रीनगर में कैब सर्विस चलाने वाले आदिल शेख जो नियमित रूप से पहलगाम गाड़ियां भेजते हैं, उन्होंने आर्थिक नुकसान के बारे में बताया जो उन्होंने देखा।

उन्होंने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया, "दिसंबर 2025 तक बिजनेस बहुत खराब था क्योंकि कश्मीर में लगभग कोई टूरिस्ट नहीं आ रहा था. हमलों के बाद यह डर कि आतंकवाद फिर से लौट आया है बहुत ज़्यादा हावी हो गया."

जनवरी से कुछ हद तक रिकवरी हई. हमलों से पहले जितने टूरिस्ट आते थे उनमें से लगभग 60% वापस आने लगे थे. यह आंकड़ा उन्होंने अपने काम-काज और अपने आस-पास जो देखा उसके आधार पर दिया. 

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लेकिन नुकसान कुछ और समय तक रहेगा. आदिल शेख ने कहा, "टूरिस्ट के न आने की वजह से कई कैब ड्राइवरों और सर्विस मालिकों के पास खाने के लिए भी नहीं था. उन्हें अपनी गाड़ियां बेचनी पड़ीं. लोन पर खरीदी गई कारें बैंकों ने जब्त कर लीं. इस हमले से टूरिज्म इंडस्ट्री को बहुत नुकसान हुआ."

कश्मीर में नॉर्मल हालात के लिए टूरिज्म एक बेंचमार्क क्यों है?

कश्मीर में खासकर पहलगाम में पीक टूरिज्म सीजन आमतौर पर मार्च से जून तक चलता है, जिसमें अच्छे मौसम पिकनिक और बेताब वैली और लिद्दर नदी जैसी जगहों पर जाने के लिए भीड़ आती है. 

गर्मियां सबसे व्यस्त रहती हैं और जुलाई-अगस्त में अमरनाथ यात्रा के समय भी भीड़ रहती है, हालांकि इस इलाके में साल भर टूरिस्ट आते हैं, जिसमें सर्दियों में आइस गेम भी शामिल हैं. 

एक सीनियर जर्नलिस्ट ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, "हालांकि कश्मीर की इकॉनमी में बागवानी जैसे और भी बड़े योगदान देने वाले फैक्टर हैं, जो मुख्य रूप से कश्मीर की इकॉनमी को चलाते हैं." लेकिन टूरिज्म नॉर्मल हालात का मुख्य मार्कर बना हुआ है और इस सेक्टर का सिंबॉलिक महत्व दूसरे पहचान को ढक लेता है. 

2019 में आर्टिकल 370 के हटने और कोविड-19 की दिक्कतों के बाद कश्मीर में टूरिज्म में अच्छी ग्रोथ दर्ज की गई. जम्मू-कश्मीर इकोनॉमिक सर्वे में इकट्ठा किए गए सरकारी डेटा के मुताबिक 2022 में कश्मीर में करीब 27 लाख विज़िटर आए जो 2023 में बढ़कर 31.56 लाख और 2024 में सबसे ज़्यादा 34.99 लाख हो गए. 

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पहलगाम हमले के कुछ साल बाद कश्मीर पीछे चला गया: कैब ऑपरेटर

हमले वाली जगह से करीब 8 KM दूर होटल बैसरन के मैनेजर नासिर अकरम वानी ने याद किया कि अचानक हालात कैसे बिगड़ गए, "पिछले साल इसी समय होटल की कैपेसिटी फुल थी. फिर अचानक अप्रैल से कम से कम चार महीने तक यह ज़ीरो हो गई. अक्टूबर तक 30% ऑक्यूपेंसी वापस आ गई. अभी यह लगभग 50% है."
 
आदिल शेख जो घाटी में आतंकी हमलों और शटडाउन को देखते हुए बड़े हुए ने कहा कि पुलवामा हमले के बाद ही हालात इतने खराब थे. उन्होंने याद करते हुए कहा, "हमें लगा कि यह अंत है." फिर भी 2021 तक रिकवरी शुरू हो गई थी और ऑफ-सीजन में भी टूरिस्ट की संख्या बढ़ रही थी.

शाम की पेट्रोलिंग पर भारतीय सेना और CRPF के बूटों की आवाज एक बार फिर शेख को उनके बचपन की याद दिलाती है. उन्होंने कहा, "जब टूरिस्ट की संख्या बढ़ी और हालात सुधरते दिखे तो आर्मी और CRPF की मौजूदगी दखलअंदाज़ी जैसी नहीं लगी."

शेख ने कहा, "आज कश्मीर ऐसा लगता है जैसे कुछ साल पीछे चला गया हो."

बुधवार को उस सामूहिक हत्याकांड को एक साल हो जाएगा और सुरक्षा की स्थिति उतनी ही कड़ी है जितनी तब थी जब आतंकवाद चरम पर था. 

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लेकिन यह तथ्य कि एक साल के भीतर बल्कि कुछ ही महीनों में पर्यटकों की संख्या पहले के लगभग आधे स्तर पर आ गई है. यह बताता है कि चीजें आखिरकार बेहतर होंगी. 

700 साल से भी पहले अमीर खुसरो ने कश्मीर को जन्नत बताया था. पिछले 37 सालों में जन्नत बहुत उथल-पुथल से गुजरा है. लेकिन अब फिर से बसंत आ गया है और हमेशा उम्मीद लौटने का इंतज़ार कर रही है. 
 

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