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कनिमोलि की अग्नि परीक्षा

उनकी कठिन परीक्षा ने द्रमुक को विभाजित कर दिया है तो यूपीए के लिए खतरा पैदा हो गया है. यह सुविधा संपन्न कवयित्री अब घोटाले के कलंक से मुक्ति पाने की अपनी सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है

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कनिमोलि
कनिमोलि

अपने 11 बरस के बेटे आदित्यन को गोद में बिठाए वे दिल्ली स्थित पटियाला हाउस अदालत के एक कोने में चुपचाप बैठी हैं. कभी वे बैठे-बैठे अपनी मां रजती अम्माल का हाथ थाम लेती हैं. अक्सर वे गैब्रिएल गार्शिया मार्केज़ का उपन्यास पढ़ती रहती हैं, जिनके पन्ने मुड़े-तुड़े रहते हैं. 20 मई को गिरफ्तार होने के बाद से उन्होंने महज एक शख्स-अपने बेटे-से माफी मांगी है.

अदालत में 2जी मामले के दूसरे अभियुक्त अगर अपने वकीलों को एसएमएस भेजते हैं, बातें करते हैं, सवाल करते हैं, तो वे अकेली बैठी रहती हैं, मानो वे कहीं और हों. कनिमोलि अगर किसी चीज से संघर्ष कर रही हैं, तो वे उनकी भावनाएं हैं. बाकी लोग कई मोचों पर लड़ाई लड़ रहे हैं, वे मोर्चे, जो अब उनके जीवन में भी खुल गए हैं-कानूनी, राजनैतिक, व्यक्तिगत.

2जी मामले की सुनवाई 11 नवंबर को शुरू हुई, लेकिन वंशवादी द्रमुक में नेतृत्व के लिए चल रहा राजनैतिक संघर्ष वह मूक परिदृश्य है, जिसकी पृष्ठभूमि में यह कानूनी नाटक चल रहा है. छह माह में चार बार खारिज होने के बाद उनके वकील अब जमानत की अर्जी लेकर दिल्ली हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाने जा रहे हैं.

तमिल में कनिमोलि का अर्थ है  'प्यारी-सी.' उस बेटी के लिए एक प्यारा-सा नाम, जिसके जन्म ने उसके पिता की किस्मत बदलकर रख दी थी. माथे पर बिंदिया लगाए और नाक में लौंग पहने हुए 2जी मामले में द्रमुक की अभियुक्त सांसद के 'दक्षिण भारतीय लावण्य' से अभिभूत युवा वकील दिल्ली के अदालती गलियारों में कहते हैं कि वे 'सचमुच की महिला हैं.' दूसरे लोग उन्हें 'गरिमामय' मानते हैं.

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यूनिटेक के प्रबंध निदेशक और 2जी मामले में अभियुक्त संजय चंद्रा की वकील रेबेका जॉन कहती हैं, ''अपने व्यवहार से वे किसी का ध्यान आकर्षित नहीं करतीं.'' अक्सर तिहाड़ जेल जाते रहने वाले एक युवा वकील का कहना है कि वे पूरी तरह अपने में सिमटी रहती हैं. उन्हें महिलाओं की जेल नंबर 6 में रखा गया है. सारे पुरुष एक साथ जेल नंबर 3 या 4 में हैं. इस वकील के अनुसार, ''सभी पुरुष एक-दूसरे के साथ बने रहते हैं, लेकिन कनिमोलि सारी भागदौड़ से दूर रहती हैं. वे अदालत भी एक अलग बस से आती-जाती हैं.'' 2जी मामले के अभियुक्त पुरुषों का मानना है कि कनिमोलि को यह मामला नागवार गुजरा है.

कम ही लोग होंगे, जो कनिमोलि की तरह उत्थान और पतन देखने का दावा कर सकते हैं. प्यारी-सी यह बेटी अपने पिता के अंतिम दिनों में उनके लिए ही सबसे बड़ी वेदना बन गई है. यह कवयित्री कलंकित राजनीतिक बन गई है. तमिल संस्कृति की यह अलमबरदार अब भारत के सबसे बड़े भ्रष्टाचार घोटाले की अभियुक्तों में से एक है.

चेन्नै की पॉश सीआइटी कॉलोनी में 5 करोड़ रु. के बंगले की यह सुविधा संपन्न मालकिन अब तिहाड़ में 19 फुट गुणा 15 फुट की एक कोठरी में दिन गुजार रही है. इन सारे जटिल विरोधाभासों के बीच कनिमोलि ने अपने राज्‍य की कल्पनाओं को कैद कर लिया है और देश उनमें दिलचस्पी लेने लगा हैः क्या उनकी किस्मत का फैसला न्याय और कानून के तकाजों के मुताबिक होगा? क्या वे घोटाले की खाक से फिर जिंदा हो उठेंगी?

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कनिमोलि के निजी कटु अनुभवों ने भी इस कदर तनाव पैदा कर दिए हैं कि यूपीए सरकार की अग्निपरीक्षा शुरू हो गई है. दिल्ली में अस्थिरता की राजनीति, और इस बार चोरी-छिपे, चल रही है. यूपीए सरकार की ओर से पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि के खिलाफ अपनी लड़ाई में ममता बनर्जी ने भले ही युद्धविराम कर दिया है. लेकिन खतरा अभी बरकरार है.

पार्टी के सांसद सुदीप बंदोपाध्याय कहते हैं, ''कीमतों में एक और वृद्धि को तृणमूल कांग्रेस आसानी से नहीं पचा लेगी.'' कांग्रेस द्रमुक के 18 सांसदों को खोने का जोखिम नहीं ले सकती. खास तौर पर जब भाजपा शीत सत्र में अविश्वास प्रस्ताव लाने की धमकी दे रही हो तो उसके लिए गठबंधन बनाए रखना जरूरी है. फिलहाल यूपीए (कांग्रेस, द्रमुक, तृणमल, राकांपा और नेशनल कॉन्फ्रेंस) के पास 269 सांसद हैं. इनमें चार छोटी पार्टियों के और 9 निर्दलीय हैं.


 

अगर उसके सारे सहयोगी दल साथ बने रहें, तो भी उसे सत्ता में बने रहने के लिए बाहर से समर्थन की जरूरत पड़ती है. इस समय राजद, सपा, बसपा और जनता दल (एस) सरकार का समर्थन कर रहे हैं. अगर तृणमूल या द्रमुक में से कोई जाता है, तो कांग्रेस को इसकी भरपाई करने के लिए ऐसे दल की जरूरत होगी, जिसके पास बड़ी संख्या में सांसद हों. उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं और 21 सांसदों वाली बसपा सरकार का बेड़ा पार लगाने के लिए राजी नहीं है. अपने 22 सांसदों की एवज में मुलायम सिंह यादव राज्‍य में कांग्रेस के साथ समझैता करने की मांग करेंगे.

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द्रमुक प्रमुख एम. करुणानिधि को दिल्ली में सत्ता के ताने-बाने में एक जगह की जो दरकार है, उससे उनकी बेटी को कष्ट और लगातार अपमान से बचाने के लिए ज्‍यादा कुछ न कर पाने वाली कांग्रेस के खिलाफ उनकी नाराजगी छिप जाती है. पार्टी सूत्रों के अनुसार, हालांकि द्रमुक के पितृपुरुष इस बात को लेकर लाल-पीले हो रहे हैं कि कांग्रेस 2जी मामले में उनकी पार्टी को बचाने के लिए कुछ नहीं कर रही है, लेकिन वे यूपीए के साथ अपने रिश्ते तोड़ने की नहीं सोच रहे हैं. द्रमुक के करीबी एक राजनैतिक विश्लेषक का कहना है, ''उनका स्वभाव ऐसा है कि वे माकूल अवसर आने की प्रतीक्षा करेंगे. जब तक उनके हाथ में कोई विकल्प न हो, वे केंद्र के साथ अपने रिश्ते कभी नहीं तोड़ते.''

लेकिन कनिमोलि के लिए उनके पास एक योजना है. वे चाहेंगे कि उनकी साहित्यिक उत्तराधिकारी जब एक शहीद की छवि लेकर जेल से बाहर निकले, तो वे उसे अपनी राजनैतिक उत्तराधिकारी भी बना दें. कनिमोलि के जेल में बीत रहे दिनों को करुणानिधि पार्टी की खातिर की गई कुर्बानी के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं.

वे कनिमोलि की वर्तमान दुर्दशा की तुलना इमरजेंसी के दौरान एम.के. स्टालिन के जेल में बिताए गए दिनों से करने की कोशिश कर सकते हैं. लेकिन स्टालिन के विपरीत कनिमोलि का द्रमुक में कार्यकर्ताओं का कोई आधार नहीं है. पिछले पांच साल में द्रमुक के कई कारनामों का भंडाफोड़ करने वाले ए. शंकर कहते हैं, ''करुणानिधि कनिमोलि को पार्टी में बतौर नेता स्थापित करने की चाहे जितनी भी कोशिश कर लें, उन्हें समर्थन मिलना मुश्किल होगा.'' कनिमोलि की पदोन्नति, अगर हुई तो, करुणानिधि के कुनबे में एक और गृह युद्ध का रास्ता साफ कर देगी. कनिमोलि को अपने शक्तिशाली सौतेले भाइयों-स्टालिन और एम.के. अलगिरी की ओर से गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ेगा.

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अक्तूबर महीने में परिवार के तनाव उफनकर बाहर आ गए थे. करुणानिधि की सबसे बड़ी बेटी सेल्वी सेल्वम, कथित तौर पर मारन भाइयों के उकसावे और स्टालिन के गुप्त समर्थन से, एक ऐसी मांग को लेकर अपने पिता से उलझ गई थीं, जिसमें 'समझैते की कोई गुंजाइश नहीं' थी. यह मांग थी कि कनिमोलि को पार्टी में कोई पद न दिया जाए, यहां तक कि उन्हें पार्टी की सदस्य बने रहने की भी इजाजत न दी जाए, भले ही उन्हें जमानत मिल जाए. वजह?

स्पेक्ट्रम घोटाले में कनिमोलि के शामिल होने की वजह से ही राज्‍य में द्रमुक की राजनैतिक किस्मत फूट गई और केंद्र के साथ सौदेबाजी कर सकने की उसकी क्षमता पर असर पड़ा. राजनैतिक विश्लेषक ज्ञानी शंकरन कहते हैं, ''गिरफ्तारी और उसके बाद जमानत याचिकाओं के खारिज होने से कनिमोलि की राजनैतिक हैसियत निश्चित तौर पर प्रभावित हुई है. उनके माता-पिता को छोड़कर न तो पार्टी में और न ही परिवार में उनके साथ कोई है.''



राजनैतिक विश्लेषक आशीष नंदी कहते हैं, ''वे ऐसी जटिल समस्या में फंस गई हैं, जिसे सुलझा पाना मुश्किल है.'' इसकी जड़ में है राष्ट्र का नया मि.जाज. उनका कहना है, ''सत्ता के प्रति गहरा अविश्वास है, भ्रष्टाचार के प्रति गहरी घृणा है और इस बात का व्यापक एहसास है कि सरकार संचालन पटरी से उतर गया है.'' सुप्रीम कोर्ट के जिहादी न्यायाधीश बदलाव की गति को तय कर रहे हैं. नंदी का कहना है, ''न्यायपालिका पर यह संकव्त देने का दबाव पड़ रहा है कि अमीर और ताकतवर लोगों को कानून के दायरे में कसा जा सकता है.

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इसके बावजूद अगर यह सिलसिला आगे बढ़ता गया, खास तौर पर 2जी जैसे मामले में, तो सरकार के शीर्ष कर्ताधर्ता भी कुर्सी से नीचे आ सकते हैं.'' जनमत के दबाव में और अंगड़ाई ले रही न्यायपालिका के सामने गठबंधन की राजनीति का ताना-बाना बदल रहा है. कनिमोलि का भाग्य कानूनी मजबूरी और राजनैतिक सुविधा की आपस में गुंथी उलझ्न में फंसा हुआ है. या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शब्दों में 'गठबंधन राजनीति की सीमाओं' में अटका पड़ा है.

20 मई को गिरफ्तार किए जाने पर कनिमोलि ने पूछा था, ''क्या करुणानिधि की बेटी होना मेरी बदकिस्मती है?'' द्रमुक के एक कार्यकर्ता का कहना है कि उनके पिता उन्हें वापस घर लाने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हैं. हर बार जब भी उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई हो रही होती है, तो वे टेलीविजन से चिपके रहते हैं और हवाई अड्डे पर उनकी अगवानी करने की विस्तृत योजना बनाते हैं.

बुरी खबर उन्हें गहरे अवसाद में धकेल देती है. इन दिनों वे त्यौहार मनाने से इनकार कर देते हैं, भोजन करना छोड़ देते हैं और अपनी पसंदीदा दोपहर की नींद भी त्याग देते हैं. अप्रैल के बाद अक्तूबर में वे पहली बार अपनी पत्नी रजती अम्माल के साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलने गए थे. पार्टी के एक सदस्य का कहना है, ''उन्होंने उन लोगों से सिर्फ अपनी बेटी की रिहाई के बारे में ही बातचीत की.'' 

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अपने सारे दबदबे के बावजूद निचली और उच्च अदालतों की मर्जी के आगे सोनिया और मनमोहन भी बेबस नजर आते हैं. दबी जबान में पूछा जा रहा बड़ा सवाल यह है कि कनिमोलि अपराधी हैं या उन्हें किसी और के जुर्म में फंसाया गया है, ताकि मामले की हवा निकल जाए जबकि ज्‍यादा बड़े अपराधी खुले घूम रहे हैं और सत्ता में बने हुए हैं? जब कनिमोलि की स्थिति की तुलना पी. चिदंबरम और मनमोहन सिंह से की जाती है तो सीबीआइ का चुनिंदा तरीका एकदम स्पष्ट दिखता है.

इंडिया टुडे की खास  रपट (दिन गर्दिश के, 17 अक्तूबर) में 2जी मामले में कागजात की सारी पड़ताल की गई थी और पाया गया था कि तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम और मनमोहन दोनों ही विवादास्पद लाइसेंसों के मामले में पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा के लिए गए हरेक फैसले से अवगत थे. दोनों के पास ऐसी शक्ति थी कि अगर वे चाहते, तो उन्हें रोक सकते थे. और इसके बावजूद, जुलाई 2008 में राजा, चिदंबरम और मनमोहन सिंह के बीच बैठक में उन्होंने राजा के उस रुख को स्वीकार किया था, जिसकी वजह से पूर्व दूरसंचार मंत्री अब जेल में हैं.

कनिमोलि के खिलाफ मामला राजा के साथ उनकी परिस्थितिजन्य राजनैतिक नजदीकी पर (जो राडिया के टेपों से सार्वजनिक तौर पर उजागर हो गई है) और इस तथ्य पर टिका है कि वे कलैग्नार टीवी में 20 प्रतिशत की हिस्सेदार हैं. यह वही कंपनी है, जिसे शाहिद बलवा के डीबी समूह से कथित तौर पर 200 करोड़ रु. उस समय मिले थे, जब 2जी लाइसेंस इस समूह को दिया गया था. सीबीआइ कहती है कि पैसे का यह हस्तांतरण 2जी लाइसेंस दिए जाने की एवज में दी गई घूस था. कनिमोलि के वकील कहते हैं कि यह पैसा उधार लिया गया था, जिसे अब चुकता कर दिया गया है.

कनिमोलि का हश्र टाटा समूह और नीरा राडिया के एकदम उलट हुआ है, जिनकी खातिर वे जाहिरा तौर पर यूपीए की दूसरी सरकार में राजा को फिर से दूरसंचार मंत्री बनवाने के लिए लॉबिइंग कर रही थीं. एक साल पहले उजागर हुए राडिया टेपों में यूपीए की दूसरी सरकार में मंत्रिमंडल के गठन से ठीक पहले राडिया और कनिमोलि के बीच हुई बातचीत की पूरी कतार टेप की गई है. इन टेपों के उजागर होने के एक साल बाद टाटा समूह और राडिया 2जी मामले में सीबीआइ के रडार से पूरी तरह बाहर हैं, जबकि कनिमोलि और राजा जेल में बंद हैं.

जैसा कि नामी वकील और भाजपा के पूर्व सांसद राम जेठमलानी कहते हैं, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के उजागर होने से ''यह सवाल पैदा होता है कि कनिमोलि का अपराध क्या है?'' उनका  कहना है, ''इससे साफ तौर पर यह पता चलता है कि 2जी स्पेक्ट्रम का आवंटन केंद्रीय मंत्रिमंडल का एक आर्थिक फैसला था और इस फैसले में प्रधानमंत्री भी शामिल थे. तो फिर उन्हें अभियुक्त क्यों नहीं बनाया गया है?''

गठबंधन की आक्रामक राजनीति के युग में दबाव के तहत आए बड़े दल अक्सर छोटे सहयोगी दलों की जबरदस्त सौदेबाजी के आगे समर्पण कर देते हैं. ये छोटे दल अपनी भूमिका खुद तय करते हैं-दूरसंचार मंत्रालय द्रमुक को, रेलवे तृणमूल कांग्रेस को और महाराष्ट्र का गृह मंत्रालय राकांपा को. कांग्रेस ने 2जी के मामले में द्रमुक की मांगों को लेकर आंखें बंद किए रखीं, लेकिन जब उसके अपने मंत्री जांच के दायरे में आ गए हैं तो क्या अपने कमजोर सहयोगी दलों को आधे रास्ते में छोड़ देना या उन्हें बलि का बकरा बनाना ज्‍यादा आसान नहीं होगा? द्रमुक के हलकों में ताजातरीन चर्चा यह है कि हो सकता है, करुणानिधि हमला बोलने के पहले कनिमोलि की रिहाई का इंतजार ही कर रहे हों.

कनिमोलि ने ऐसा क्या किया है कि उन्हें बिना जमानत के जेल मिली है? वे कलैग्नार टीवी में शेयरधारक हैं. जेठमलानी के अनुसार, सबसे पहली बात तो यह है कि शेयरधारकों के पास कार्यकारी शक्ति नहीं होती है. वरना कानूनी तौर पर हरेक शेयरधारक को पकड़ा जाना चाहिए. ''क्या ऐसा कोई सबूत है जो बताता हो कि दूसरों को अपराध के लिए उकसाने में उन्होंने अपनी नैतिक और सामाजिक हैसियत का इस्तेमाल किया है?''

उनके वकील कहते हैं कि वह पैसा कर्ज का था, जिसे ब्याज सहित लौटाया गया था. जेठमलानी के मुताबिक, उन्होंने कोई ऐसा जाहिरा कृत्य नहीं किया, जो उन्हें करीब छह महीने की जेल और बार-बार जमानत ठुकराए जाने को औचित्यपूर्ण ठहराता हो. उन्हें एक महिला और मां होने के नाते अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 437 के तहत भी जमानत का अधिकार नहीं दिया गया, जबकि इस प्रावधान का प्रयोग भारतीय अदालतें धड़ल्ले से करती आई हैं. जेठमलानी कहते हैं, ''कानूनी तौर पर यह वीभत्स है. अपने 70 वर्ष के कॅरिअर में मेरा पाला पहली बार ऐसी कानूनी न.जीर से पड़ा है.''

कानून के मामले में विद्वान एन.आर. माधव मेनन कहते हैं, ''यह गंभीर मामला है. खास तौर पर इसलिए कि सफेदपोशों के अपराध को आंकना बहुत मुश्किल है.'' लेकिन जमानत आखिर अधिकार का मामला है. वे स्पष्ट करते हैं कि यह नियम है, अपवाद नहीं. न्यायिक प्रणाली के लिए 2जी मामले में लगातार रिमांड के गहरे निहितार्थ हैं. उनका कहना है, ''2जी की सुनवाई ने जमानत के कानून में एक नया सिद्धांत जोड़ दिया है और इसकी जरूरत से यह संकेत मिलता है कि न्यायिक प्रणाली कारगर तरीके से काम नहीं कर रही है.''

रेबेका जॉन के लिए, किसी वकील के नजरिए से यह अत्यंत चुनौतीपूर्ण मामला है. वे कहती हैं, ''कॉर्पोरेट, आपराधिक, दूरसंचार सरीखे  कानूनों की पूरी श्रृंखला के बेहद जटिल तत्वों को छूता है.'' लेकिन जमानत से लेकर आरोप पत्रों तक, इन कानूनों को लागू करने में एक तरह की बुद्धिहीनता दिखती है. 1990 के दशक के मध्य में हुए जैन हवाला कांड को याद करते हुए वे कहती हैं, ''वह भी बड़े लोगों के भ्रष्टाचार का मामला था, जिसमें भारतीय राजनीति के कई महत्वपूर्ण लोग शामिल थे. लेकिन तब किसी को भी जमानत देने से इनकार नहीं किया गया. किसी को भी सजा नहीं हुई थी, सिर्फ इसलिए कि वे अमीर और शक्ति संपन्न थे.''

कहा जाता है कि बड़े मामलों से खराब कानून बनते हैं. और कनिमोलि को, या उनको निजी तौर पर सता रहे सवालों को, सिर्फ उस सुनवाई के दायरे में समझा जा सकता है, जिसमें वे शामिल रहती हैं. अगर कोई और दौर होता, तो उन्हें अदालतों से कुछ और ही हासिल हुआ होता. लेकिन ऐसे खतरनाक दौर में नहीं, जब हर कोई अपने मत को 'पवित्र' मानता है और हर किसी का अपना घोषित नजरिया है. चाहे यह उनकी बदकिस्मती हो, निजी त्रासदी हो या बहुत बड़े पैमाने पर जायज हश्र हो, उम्मीद है कि उनकी किस्मत का फैसला कानून के शासन के मुताबिक ही होगा.

लेकिन वे जितनी परीक्षाओं से गुजर चुकी हैं, यहां तक कि 2जी की सुनवाई शुरू होने के भी पहले, राजनीतिकों, कानून निर्माताओं और आम नागरिकों के लिए एक फौरी संदेश यह मिलता हैः क्या हम लोगों का फैसला अलग-अलग मानदंडों से कर सकते हैं?

चेन्नै में कनिमोलि के महलनुमा बंगले के सामने अब कारों की कतारें नहीं लगा करतीं. घर के पिछवाड़े में उनका सांसद का कार्यालय वीरान-सा रहता है. आम तौर पर उनके घर मंडराते रहने वाले लोक कलाकार, उम्मीद से सराबोर कलाकार और चमक-दमक वाली सांस्कृतिक हस्तियां अब गायब हैं. अब घर में महज दो सदस्य हैं-उनकी मां और उनका बेटा. सिंगापुर में रह रहे उनके पति अरविंदन दिल्ली लौट आए हैं.

दिल्ली की जेल में बंद कनिमोलि किताबों में सुकून खोज रही हैं. तमिल साहित्य उम्मीद कर रहा है कि उसे एक कवि-राजनेता की जेल डायरी सरीखी कोई चीज मिलेगी. उधर, चैन्ने में अपने घर पर उनका बेटा आदित्यन शाम को नियमित तौर पर अपने नाना के साथ जब रहता है, तो एक ही सवाल बार-बार करता हैः वह यह कि मेरी मां घर वापस कब आएंगी?

-साथ में भावना विज-अरोड़ा और लक्ष्मी कुमारस्वामी

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