आज से 26 बरस पहले आई फिल्म 'मिशन कश्मीर' के एक गाने 'सोचो के झीलों का शहर हो, लहरों पे अपना एक घर हो' में ख्वाहिशों की दुनिया को जीने का अहसास कराया गया था. मतलब ऐसी कल्पना जो हकीकत लगे. ख्वाहिशों की दुनिया बड़ी हसीन और अनंत है. यह मन के उस कोने की तरह है जहां हम नामुमकिन को मुमकिन होते देखते हैं. सच तो ये है कि इंसान अपनी ख्वाहिशों के दम पर ही जिंदा है. और इन्हें अपनी ही शै में पूरा कर रहे हैं अल्ट्रा रिच.
सबसे पहले इस शब्द को समझिए- अल्ट्रा रिच मतलब बहुत ज्यादा अमीर. जिन्हें ऐसी लग्जरी लाइफ या राजसी ठाठ-बाट चाहिए, जहां हर चीज़ पर्सनल हो, सर्विसेज बेजोड़ हो, प्राइवेट विला हों और पर्सनल बटलर हर इच्छा पूरी कर दे. उन्हें लाइन में नहीं लगना. ग्रुप में नहीं घूमना और इंतज़ार तो बिल्कुल पसंद नहीं. अल्ट्रा रिच लोगों की ख्वाहिशें चौंकाने वाली हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक एक कस्टमर ने अपने होटल के कमरे से लाल रंग को पूरी तरह हटाने की मांग की, जबकि दूसरा कस्टमर चाहता था कि उसका बेटा इटली के नेशनल स्टेडियम में प्रोफेशनल खिलाड़ियों के साथ फुटबॉल खेले, लिहाजा उसने पूरा स्टेडियम ही बुक कर लिया.
वहीं एक शख्स ने कस्टमर ने ऐसे रूम की डिमांड की जहां सूर्यास्त सीधे समुद्र में दिखे, किसी पेड़ या पहाड़ के पीछे नहीं. ऐसे लोग अपनी दुनिया को ठीक वैसा ही बनाना चाहते हैं जैसा वे सोचते हैं, जो कल्पनाएं उनके ज़हन में उठती हैं. उन्हें मूर्त रूप देने के लिए पैसा कोई बाधा नहीं है. अल्ट्रा रिच ओवरटूरिज्म से बचना चाहते हैं. इसलिए ग्रीनलैंड, आइसलैंड, अंटार्कटिका और नॉर्वे जैसी ठंडी और शांत जगहें लोकप्रिय हो रही हैं. इटली और फ्रांस जैसे देशों में भी लोग कम भीड़ वाले समय में जाना पसंद कर रहे हैं. जलवायु परिवर्तन के कारण भी कई लोग अपनी यात्रा योजनाएं बदल रहे हैं.
बहामास और मालदीव में ऐसे प्रोजेक्ट तैयार हो रहे हैं जहां कुछ विला पूरी तरह से प्राइवेट आईलैंड पर बने हैं. लक्ज़री ट्रैवल एक्सपर्ट कहते हैं कि आज लग्ज़री ट्रैवल का फोकस पर्सनलाइजेशन, एक्सक्लूसिविटी और सस्टेनेबिलिटी पर है. यानी हर यात्रा खास हो, निजी हो और पर्यावरण का ध्यान भी रखे. इन्हीं अल्ट्रा रिच कस्टमर्स की वजह से लग्ज़री ट्रैवल इंडस्ट्री में जबरदस्त कॉम्पटीशन बढ़ा है. कंपनियां अब सबसे शानदार, निजी और अनोखे अनुभव देने की होड़ में हैं. अमीर लोग जिनके पास कम से कम 30 मिलियन डॉलर यानी करीब 2500 करोड़ रुपये से ज़्यादा के निवेश योग्य एसेट्स हैं, वे होटल रूम के लिए हजारों डॉलर प्रति रात या विला के लिए दसियों हज़ार डॉलर देने को तैयार हैं. इनकी वजह से लग्ज़री ट्रैवल की दुनिया में एक तरह की आर्म्स रेस चल रही है.
एक रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में लग्ज़री ट्रैवल बाजार 160.59 लाख करोड़ रुपये का था, इसके 2033 तक 190.53 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है, जो कि स्पेन, मैक्सिको, ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड्स और स्विट्जरलैंड जैसे देशों की जीडीपी से ज्यादा है. इसकी वजह है अमीर लोगों की बढ़ती इच्छाएं और खास अनुभवों की बढ़ती मांग.
इटली की एक डेस्टिनेशन मैनेजमेंट कंपनी के ग्लोबल सेल्स हेड कहते हैं कि उनकी कंपनी हाई-एंड क्लाइंट्स के लिए ट्रिप प्लान करती है. हमारे ग्राहक चाहते हैं कि उन्हें ऐसा अनुभव मिले जो आम लोग हासिल नहीं कर सकते. हम छुट्टियां नहीं बेचते, हम क्लाइंट की सबसे पागलपन भरी कल्पनाओं को हकीकत में बदलते हैं.
दरअसल, फिल्मों और वेब सीरीज़ का भी ट्रैवल ट्रेंड पर बड़ा प्रभाव है. जिन जगहों पर मशहूर शो या फिल्में शूट होती हैं, वहां जाने की इच्छा बढ़ रही है. लोग कहानी से जुड़ी जगहों पर जाकर स्थानीय संस्कृति, खाना और कला का अनुभव करना चाहते हैं. पहले लोग कम समय में ज्यादा जगहें देखना चाहते थे, लेकिन अब वे एक जगह रुककर उसे गहराई से समझना चाहते हैं. जैसे केन्या की ग्रेट माइग्रेशन देखना या गैलापागोस द्वीप की सैर करना. दक्षिण अमेरिका में लोग अर्जेंटीना, चिली और पेरू में ज्यादा समय बिता रहे हैं.
अमीर लोग अब मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दे रहे हैं. भारत में आयुर्वेद प्रोग्राम, कोस्टा रिका में योग-सर्फिंग और कनाडा में वेलनेस रिट्रीट जैसी यात्राएं लोकप्रिय हो रही हैं. सोलो ट्रैवलर्स में भी वेलनेस ट्रिप्स की मांग बढ़ी है. अल्ट्रा -रिच लोगों के लिए अब असली लग्ज़री का मतलब है कोई चिंता नहीं, कोई इंतजार नहीं और हर अनुभव पूरी तरह निजी. उनके लिए पैसा नहीं, बल्कि सबसे अलग अनुभव ही असली शान है.