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रेलवे स्टेशन या नवाबों का महल, 100 साल पुराना लखनऊ का ये स्टेशन आज भी है पहेली

अगर आपने अब तक किसी रेलवे स्टेशन को महल जैसा नहीं देखा, तो लखनऊ का यह स्टेशन आपको जरूर हैरान करेगा. इस अनोखे स्टेशन की कहानी सिर्फ तस्वीरों तक सीमित नहीं है. जन्नत के बाग की कल्पना और नवाबों की विरासत को अपने भीतर समेटे हुए है.

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लखनऊ का ये रेलवे स्टेशन क्यों है खास (Photo-ITG)
लखनऊ का ये रेलवे स्टेशन क्यों है खास (Photo-ITG)

क्या आपने कभी ऐसा रेलवे स्टेशन देखा है, जहां कदम रखते ही पटरियों की खड़खड़ाहट नहीं, बल्कि किसी शाही महल की जैसा एहसास होने लगे. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक ऐसा स्टेशन मौजूद है, जिसकी भव्यता जमीन से जितनी रॉयल लगती है, आसमान से देखने पर उतनी ही अजूबा नजर आती है. हम बात कर रहे हैं चारबाग रेलवे स्टेशन की.

अगर आप इस स्टेशन को ऊपर से देखें, तो आपकी आंखें फटी की फटी रह जाएंगी,  क्योंकि यह स्टेशन किसी आम इमारत की तरह नहीं, बल्कि शतरंज की एक विशाल बिसात की तरह बिछा हुआ नजर आता है, जहां इसके गुंबद मोहरों की तरह सजे हुए दिखाई देते हैं. इंजीनियरिंग का ऐसा करिश्मा जिसे देखकर दुनिया दंग है. तो चलिए जानते हैं आखिर क्या है लखनऊ के इस ऐतिहासिक स्टेशन का पूरा सच.

शतरंज की बिसातनुमा बनावट का जादुई नजारा

चारबाग की सबसे बड़ी खासियत तब सामने आती है, जब इसे हवाई नजरिए से देखा जाता है. ऊपर से देखने पर स्टेशन की पूरी संरचना शतरंज की बिसात जैसी लगती है और इसके गुंबद और बुर्ज शतरंज की मोहरों की तरह दिखाई देते हैं. कहा जाता है कि इस डिजाइन को खास योजना के तहत तैयार किया गया था, ताकि इमारत संतुलित और मजबूत बनी रहे. यही वजह है कि सौ साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी यह स्टेशन मजबूती से खड़ा है.

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इंजीनियरिंग का कमाल और शोर से राहत

इस स्टेशन के बारे में एक और बात जो सबको हैरान कर देती है, वो है इसकी अद्भुत इंजीनियरिंग. अक्सर स्टेशनों पर ट्रेनों की आवाज और यात्रियों के शोर से कान फटने लगते हैं, लेकिन लखनऊ के इस स्टेशन को एक खास तकनीक से बनाया गया है. हैरानी की बात यह है कि स्टेशन के अंदर चाहे कितना भी शोर क्यों न हो, वह बाहर मुख्य सड़क पर सुनाई नहीं देता. बाहर खड़े व्यक्ति को यह अंदाज़ा भी नहीं होता कि अंदर ट्रेनों का इतना बड़ा जाल बिछा है और हजारों मुसाफिरों की चहल-पहल है. शांति और भव्यता का यह बेमिसाल तालमेल आज के दौर के इंजीनियरों के लिए भी किसी पहेली से कम नहीं है.

100 साल का सफर और चार बगीचों का इतिहास

1914 में जब इस स्टेशन की नींव रखी गई थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह आने वाले समय में भारत की एक बड़ी विरासत बनेगा. 1925 में पूरी तरह बनकर तैयार हुए इस स्टेशन ने साल 2025 में अपने सफल संचालन के शानदार 100 साल पूरे कर लिए हैं. इस जगह का नाम चारबाग पड़ने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी छिपी है. कहा जाता है कि 1775 में जब अवध के चौथे नवाब आसफुद्दौला ने राजधानी को फैजाबाद से बदलकर लखनऊ किया, तब उन्होंने इस इलाके को बसाया था.

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पुराने वक्त में इसे 'चहार बाग' कहा जाता था, जो नवाब का पसंदीदा बाग हुआ करता था. दरअसल, इस्लाम में चारबाग की कल्पना 'जन्नत के बाग' से की गई है, जो चार बराबर हिस्सों में बंटा होता है. 1914 में जब इसी जगह पर स्टेशन की नींव रखी गई, तो उसने नवाबियत की उसी विरासत को अपने भीतर समेट लिया. 1925 में पूरी तरह तैयार हुए इस स्टेशन ने साल 2025 में अपने सफर के शानदार 100 साल पूरे कर लिए हैं, जो आज भी हर मुसाफिर को एक शाही अनुभव कराता है.

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