कल्पना कीजिए कि एक बहुत ही खुशहाल शहर है, जहां हजारों लोग हंसी-खुशी रह रहे हैं. लेकिन अचानक एक ऐसी रात आती है कि सुबह होने से पहले ही वहां के सारे लोग अपना घर-बार छोड़कर कहीं चले जाते हैं. न कोई शोर होता है, न कोई लड़ाई, बस पीछे छूट जाता है एक गहरा सन्नाटा. यह किसी हॉरर फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि राजस्थान के जैसलमेर में स्थित 'कुलधारा' गांव की हकीकत है. आज भारत के इस सबसे रहस्यमयी शहर को भूतिया गांव के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यहां 1825 की उस एक काली रात के बाद फिर कोई कभी नहीं बस सका. आखिर ऐसा क्या हुआ था कि रातों-रात 84 गांव खाली हो गए? चलिए जानते हैं इस अनसुलझे रहस्य के बारे में.
जैसलमेर से करीब 18 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव कभी वीरान नहीं था. साल 1291 में पालीवाल ब्राह्मणों ने इसे बसाया था. ये लोग इतने समझदार और मेहनती थे कि तपते रेगिस्तान में भी शानदार फसलें उगा लेते थे. कुलधारा उस समय का एक अमीर और समृद्ध शहर था, जहां की बनावट और हवेलियां देखने लायक थीं. लेकिन फिर वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि एक जालिम इंसान की नजर ने इस गांव की खुशियों को श्राप में बदल दिया. आज यहां सिर्फ पत्थर के खंडहर और डरावनी खामोशी बची है, जिसे देखने के लिए दुनिया भर से लोग आते हैं.
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जालिम दीवान की जिद और वो खौफनाक श्राप
इस गांव के वीरान होने के पीछे एक बहुत ही दर्दनाक कहानी छिपी है. कहा जाता है कि उस समय जैसलमेर का दीवान सलीम सिंह एक बेहद लालची और दुष्ट इंसान था. उसकी बुरी नजर गांव के मुखिया की सुंदर बेटी पर पड़ गई. उसने गांव वालों को धमकी दी कि या तो वे उस लड़की की शादी उससे करवा दें, वरना वह गांव पर हमला कर देगा और भारी टैक्स वसूलेगा. गांव वालों के सामने अपनी इज्जत और धर्म बचाने की चुनौती थी. उस दीवान के आगे झुकने के बजाय, कुलधारा और आसपास के 83 गांवों के लोगों ने मिलकर एक बड़ा फैसला लिया.
उन्होंने तय किया कि वे अपनी बेटी और अपनी इज्जत की खातिर यह जगह हमेशा के लिए छोड़ देंगे. 1825 की उस रहस्यमयी रात में, हजारों लोग अपना सारा सामान छोड़कर अंधेरे में निकल गए. लेकिन जाते-जाते उनके सब्र का बांध टूट गया और उन्होंने भारी मन से यह श्राप दिया कि, आज के बाद इस जमीन पर कोई भी दोबारा कभी नहीं बस पाएगा. बताया जाता है कि उनके इसी खौफनाक श्राप का असर है कि सदियां बीत जाने के बाद भी यह गांव आज तक आबाद नहीं हो सका.
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पत्थरों में कैद इतिहास और पर्यटकों का रोमांच
भले ही आज कुलधारा को भूतिया कहा जाता है, लेकिन इसकी खूबसूरती आज भी वैसी ही है. यहां के खंडहरों को देखकर पता चलता है कि उस जमाने के लोग घर बनाने की कला (Architecture) में कितने माहिर थे. यहां की संकरी गलियां, पत्थर की नक्काशी वाली दीवारें और पुराने मंदिर आज भी फोटोग्राफरों और फिल्म बनाने वालों को अपनी ओर खींचते हैं. यहां का सन्नाटा इतना गहरा है कि आपको ऐसा महसूस होगा जैसे पत्थरों की दीवारें खुद अपनी बर्बादी की दास्तान सुना रही हों.
अब यह गांव राजस्थान सरकार के पुरातत्व विभाग की देखरेख में है और इसे एक ऐतिहासिक स्मारक घोषित कर दिया गया है. पर्यटक यहां दिन के समय घूमने आते हैं, लेकिन प्रशासन की तरफ से रात को रुकने की सख्त मनाही है. अगर आप इस रहस्यमयी जगह को करीब से देखना चाहते हैं, तो जैसलमेर शहर से बड़ी आसानी से टैक्सी किराए पर लेकर यहां पहुंच सकते हैं. बस एक बात का ख्याल रखिएगा कि यहां दिन के उजाले में तो रोमांच है, लेकिन रात के अंधेरे में सिर्फ खौफ और सन्नाटा पसरा रहता है.