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टिकट की कीमत ₹0! न रिजर्वेशन, न किराया...1948 से मुफ्त में सैर करा रही है ये ट्रेन

भारत में एक ऐसी ट्रेन है, जहां न टिकट का झंझट है और न किराए की चिंता. 1948 से चली आ रही यह अनोखी परंपरा आज भी यात्रियों को उसी पुराने अंदाज में जन्नत का एहसास करा रही है.

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 78 साल से चल रही है भाखड़ा-नंगल ट्रेन (Photo: indiarailinfo.com)
78 साल से चल रही है भाखड़ा-नंगल ट्रेन (Photo: indiarailinfo.com)

आज के इस महंगाई वाले दौर में जब हर छोटी-बड़ी चीज के लिए जेब ढीली करनी पड़ती है, तब क्या आप यकीन करेंगे कि हमारे देश में एक ऐसी ट्रेन भी है जहां टिकट शब्द का कोई वजूद ही नहीं है? जरा सोचिए, आप एक सुंदर ट्रेन में बैठे हैं, खिड़की के बाहर पहाड़ों के शानदार नजारे हैं और आपसे सफर का एक पैसा भी नहीं लिया जा रहा. यह कोई कहानी नहीं है, बल्कि पंजाब और हिमाचल की सीमा पर चलने वाली 'भाखड़ा-नांगल ट्रेन' का रोजाना होने वाला एक सुखद एहसास है.

यहां सन 1948 से एक ऐसी परंपरा चली आ रही है, जिसने आज के दौर के सारे कायदे-कानूनों को पीछे छोड़ दिया है और मुसाफिरों को एक 'फ्री' की सौगात दी है. अगर आप भी बिना बटुआ निकाले इस खास सफर का हिस्सा बनना चाहते हैं और जानना चाहते हैं कि आखिर ऐसा कैसे मुमकिन है, तो चलिए जानते हैं इस ट्रेन के बारे में.

इस जादुई सफर की शुरुआत नंगल से होती है और यह भाखड़ा तक जाती है. इस भाखड़ा-नांगल ट्रेन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां न तो आपको स्टेशन पर लंबी लाइनों में लगना है और न ही महीनों पहले रिजर्वेशन की चिंता करनी है. यहां बस आपको ट्रेन में चढ़ना है और कुदरत की गोद में शुरू हो जाता है एक ऐसा सफर, जो आपको सीधा साल 1948 की याद दिला देता है. यह ट्रेन महज एक सवारी नहीं है, बल्कि उन लाखों यात्रियों के लिए एक भरोसा है जो पिछले कई दशकों से बिना किसी खर्च के इस जन्नत जैसे नजारे का लुत्फ उठा रहे हैं.

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विरासत का पहरा और अमेरिकी इंजन का दम

इस ट्रेन की सबसे बड़ी खूबी इसकी सादगी है, जिसने सन 1948 से लेकर आज तक खुद को आधुनिकता के शोर से बचाकर रखा है. शुरुआत में यह ट्रेन भाप के इंजनों से चलती थी, लेकिन समय की रफ्तार के साथ 1953 में इसमें बड़ा बदलाव आया और इसमें अमेरिका से मंगवाए गए शक्तिशाली डीजल इंजन लगाए गए. दिलचस्प बात यह है कि पिछले सात दशकों से इन इंजनों की धमक और इनके चलने के शाही अंदाज में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया है. इस पूरी ट्रेन का संचालन भाखड़ा ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड (BBMB) संभालता है. हालांकि, बीच में बोर्ड ने कई बार मुसाफिरों पर टिकट लगाने का विचार तो किया, लेकिन आखिर में इसे एक जीती-जागती विरासत मानते हुए हमेशा के लिए मुफ्त रखने का ही फैसला लिया गया, ताकि यह परंपरा कभी न टूटे.

यह ट्रेन जब नंगल से खुलकर शिवालिक की ऊंची पहाड़ियों के सीने को चीरती हुई आगे बढ़ती है, तो हर मोड़ पर एक नया रोमांच यात्री का इंतजार कर रहा होता है. रास्ते में कल-कल बहती सतलुज नदी का नीला पानी और खिड़की से आती ठंडी हवा मुसाफिरों को एक अलग ही दुनिया में ले जाती है. भले ही बोर्ड के लिए इस ट्रेन को चलाना आज के समय में एक महंगा सौदा हो, क्योंकि इसमें रोजाना करीब 50 लीटर डीजल की खपत होती है, लेकिन यात्रियों के चेहरे पर आने वाली मुस्कान के आगे यह खर्च उन्हें हमेशा से छोटा ही लगा है.

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यात्रियों के लिए आज भी खुला दरबार है ये रेल

भारतीय रेलवे के भारी-भरकम नेटवर्क से इतर, यह छोटी सी रेल सेवा अपने आप में एक मिसाल है जो बताती है कि कुछ चीजें मुनाफे के लिए नहीं बल्कि यादों के लिए चलाई जाती हैं. इस सफर के दौरान आपको कई ऐसे स्कूली बच्चे, मजदूर और स्थानीय लोग मिल जाएंगे जिनके लिए यह ट्रेन महज एक सवारी नहीं बल्कि उनकी जिंदगी का अटूट हिस्सा बन चुकी है. यहां न टीटीई का खौफ है और न ही जुर्माने का डर, क्योंकि यहां यात्री मुसाफिर नहीं बल्कि इस ऐतिहासिक विरासत के मेहमान बनकर सफर करते हैं.

अगर आप भी पहाड़ों के बीच इस अनूठी इंजीनियरिंग और दरियादिली को करीब से देखना चाहते हैं, तो नंगल और भाखड़ा के बीच का यह रास्ता आपका इंतजार कर रहा है. यह 13 किलोमीटर का सफर बताता है कि दुनिया में सबसे बेहतरीन चीजें आज भी 'फ्री' मिल सकती हैं. यकीन मानिए, इस ट्रेन की लकड़ी की सीटों पर बैठकर जब आप सतलुज को पार करेंगे, तो आपको एहसास होगा कि यह महज एक मशीन नहीं, बल्कि सन 1948 से जारी एक जिंदा जन्नत है, जिसे हर यात्री को एक बार जरूर महसूस करना चाहिए.

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