रोहू मछली (Rohu Fish) मीठे पानी में पाई जाने वाली मछली की एक प्रजाति है. इसका वैज्ञानिक नाम लेबियो रोहिता (Labeo rohita) है. यह कार्प फेमिली से संबंधित है. भारत सहित दक्षिण एशिया के कई देशों में इस मछली का पालन किया जाता है. इसे अलग-अलग क्षेत्रों में रोहू, रोई और रुही जैसे नामों से भी जाना जाता है.
रोहू मछली का शरीर चांदी जैसा चमकीला होता है. इसका सिर अपेक्षाकृत बड़ा और ऊपरी हिस्सा धनुषाकार दिखाई देता है. इसका शरीर सामान्य रूप से कार्प परिवार की दूसरी मछलियों जैसा होता है. वयस्क रोहू मछली की लंबाई लगभग दो मीटर तक हो सकती है और इसका वजन 45 किलोग्राम तक दर्ज किया गया है. हालांकि, सामान्य आकार की रोहू मछलियां इससे छोटी होती हैं.
रोहू मछली भारत के उत्तरी, मध्य और पूर्वी हिस्सों की कई नदियों में पाई जाती है. इसके अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार और वियतनाम में भी इसका प्राकृतिक वितरण मिलता है. भारत के प्रायद्वीपीय क्षेत्रों और श्रीलंका की कुछ नदियों में भी इसे पहुंचाया गया है. यह मुख्य रूप से मीठे पानी में रहने वाली मछली है.
रोहू मछली सर्वाहारी होती है, लेकिन इसके भोजन में उम्र के साथ बदलाव आता है. जीवन के शुरुआती चरण में यह मुख्य रूप से छोटे जलीय जीवों, जिन्हें प्राणी प्लवक कहा जाता है, को खाती है. बाद के चरणों में इसके भोजन में वनस्पति प्लवक और पानी में डूबी हुई वनस्पतियां शामिल होती हैं. यह पानी में मौजूद भोजन को अपने गलफड़ों की सहायता से छानकर ग्रहण करती है.
रोहू मछली सामान्यतः दो से पांच वर्ष की उम्र के बीच प्रजनन योग्य हो जाती है. इसका प्रजनन काल प्रायः मानसून के मौसम से जुड़ा होता है. इस दौरान यह बाढ़ से प्रभावित नदियों के उन हिस्सों में अंडे देती है, जो ज्वार के प्रभाव से ऊपर होते हैं. इसके अंडों को एकत्र करके तालाबों और अन्य जलाशयों में भी पाला जा सकता है.
रोहू दक्षिण एशिया में मीठे पानी की प्रमुख पालन की जाने वाली मछलियों में शामिल है. तालाबों और झीलों जैसी नियंत्रित परिस्थितियों में इसके प्रजनन के लिए कृत्रिम प्रजनन तकनीकों का उपयोग किया जाता है. प्राकृतिक रूप से इन जलाशयों में इसका प्रजनन सामान्यतः नहीं होता. मत्स्य पालन के अलावा इसे खेल के तौर पर मछली पकड़ने वाले लोग भी पकड़ते हैं.