भेटकी (Bhetki Fish) एक मछली की प्रजाति है,बैरामुंडी नाम से भी जाना जाता है. इतना ही नहीं इसे एशियाई समुद्री बास, विशाल समुद्री पर्च और एशियाई लेट्स जैसे नामों से भी जाना जाता है. इसका वैज्ञानिक नाम लैटेस कैल्करिफर है. यह लैटिडे कुल और कैरैंगिफॉर्मीज गण के अंतर्गत आती है. यह मछली हिंद-प्रशांत क्षेत्र में व्यापक रूप से पाई जाती है. इसके प्राकृतिक क्षेत्र में मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, पूर्वी एशिया और ओशिनिया के कई हिस्से शामिल हैं.
बैरामुंडी नाम की उत्पत्ति ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड क्षेत्र में रॉकहैम्पटन के आसपास बोली जाने वाली एक आदिवासी भाषा से हुई है. इस शब्द का अर्थ बड़े शल्क वाली नदी की मछली बताया जाता है. शुरुआत में इस नाम का इस्तेमाल दूसरी मछली प्रजातियों के लिए किया जाता था. वर्ष 1980 के दशक में व्यावसायिक प्रचार के उद्देश्य से लैटेस कैल्करिफर के लिए भी बैरामुंडी नाम का उपयोग होने लगा. अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय में इसे मुख्य रूप से एशियाई समुद्री बास कहा जाता है.
भेटकी का शरीर लंबा और किनारों से दबा हुआ होता है. इसका मुंह बड़ा होता है और ऊपरी जबड़ा आंख के पीछे तक फैला रहता है. इसके शरीर पर बड़े, चांदी जैसे शल्क होते हैं. आसपास के वातावरण के अनुसार इनका रंग हल्का या गहरा दिखाई दे सकता है. इसके पंखों में कांटेदार और मुलायम किरणें पाई जाती हैं. पूंछ का आकार गोलाई लिए हुए होता है.
इस मछली की लंबाई लगभग 60 सेंटीमीटर से 1.2 मीटर तक हो सकती है. कुछ विवरणों में इसकी अधिकतम लंबाई 1.8 मीटर और वजन लगभग 60 किलोग्राम तक बताया गया है. हालांकि, इतने बड़े आकार के नमूनों के पकड़े जाने के प्रमाण सीमित हैं.
भेटकी मीठे पानी और खारे पानी, दोनों प्रकार के वातावरण में रह सकती है. यह नदियों, मुहानों, तटीय क्षेत्रों और समुद्री जल में पाई जाती है. इसके जीवन चक्र में मीठे और खारे पानी के बीच आवागमन शामिल होता है. इसी विशेषता के कारण इसे प्रवासी मछली की श्रेणी में रखा जाता है.
इस प्रजाति का वितरण भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों और ऑस्ट्रेलिया के आसपास के जल क्षेत्रों तक फैला हुआ है. इसके प्राकृतिक जीवन, प्रजनन और आनुवंशिक संरचना का अध्ययन मत्स्य विज्ञान के अंतर्गत किया जाता है. साल 2015 में जेम्स कुक विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इस मछली के जीनोम से संबंधित जानकारी प्रकाशित की थी.