मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच एक बेहद खतरनाक डेवेलपमेंट सामने आ रहा है. ईरान से जुड़े मीडिया और सुरक्षा एजेंसियों ने इशारा किया है कि समंदर के नीचे बिछी इंटरनेट केबल्स भी अब टारगेट बन सकती हैं.
यह वही केबल्स हैं जिन पर दुनिया का लगभग पूरा इंटरनेट चलता है. तो क्या अगर ईरान ने ऐसा किया तो दुनिया भर का इंटरनेट ठप हो जाएगा?
अभी तक जंग की चर्चा तेल, जहाज और मिसाइल तक सीमित थी, लेकिन अब बात डेटा वॉर तक पहुंचती दिख रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) से जुड़े मीडिया ने पर्शियन गल्फ और होर्मुज स्ट्रेट के नीचे मौजूद केबल नेटवर्क को हाइलाइट किया है.
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इसका मतलब ये है कि ईरान का अगला टारगेट अंडरसी केबल हो सतके हैं और ये इंफ्रास्ट्रक्चर खतरे में आ सकता है.
होर्मुज क्यों इतना अहम है?
होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ तेल का रास्ता नहीं है, बल्कि यह डिजिटल दुनिया का भी बड़ा चोकपॉइंट है. यहां से कई इंटरनेशनल फाइबर ऑप्टिक केबल्स गुजरती हैं, जो एशिया, यूरोप और मिडिल ईस्ट को जोड़ती हैं. अगर यहां कोई नुकसान होता है, तो सिर्फ एक देश नहीं बल्कि कई देशों की इंटरनेट कनेक्टिविटी प्रभावित हो सकती है.
यह वही रास्ता है जहां से दुनिया का बड़ा डेटा ट्रैफिक गुजरता है. खाड़ी देशों जैसे UAE, सऊदी अरब, कतर और कुवैत की इंटरनेट लाइफलाइन इन्हीं केबल्स पर टिकी है.
कितनी केबल्स गुजरती हैं और कितना बड़ा असर हो सकता है?
रेड सी और होर्मुज के आसपास दर्जनों सबमरीन केबल्स मौजूद हैं. सिर्फ रेड सी में ही करीब 15 से 20 केबल्स गुजरती हैं. ये केबल्स मिलकर एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बीच डेटा ट्रैफिक का बड़ा हिस्सा संभालती हैं. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, दुनिया का 95% से ज्यादा इंटरनेट डेटा इन्हीं अंडरसी केबल्स से चलता है.
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अगर एक-दो केबल कटती हैं तो असर सीमित हो सकता है, लेकिन अगर एक साथ कई केबल्स को नुकसान होता है, तो इंटरनेट स्पीड स्लो हो सकती है, वेबसाइट्स डाउन हो सकती हैं और बैंकिंग, क्लाउड और डिजिटल सर्विसेस पर असर पड़ सकता है.
क्या भारत को भी खतरा है?
भारत इस मामले में पूरी तरह सिक्योर और सेफ नहीं है. भारत का करीब 60% इंटरनेट ट्रैफिक पश्चिम की तरफ यानी मिडिल ईस्ट और यूरोप जाने वाली केबल्स से होकर गुजरता है.
इसका मतलब है कि अगर होर्मुज या रेड सी में केबल्स को नुकसान होता है, तो भारत में इंटरनेट स्लो हो सकता है, खासकर इंटरनेशनल वेबसाइट्स, क्लाउड सर्विसेस और ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम पर असर पड़ सकता है.
हालांकि भारत के पास एक दूसरा रास्ता भी है, जो पूर्व की तरफ सिंगापुर और पैसिफिक के जरिए जाता है, लेकिन वह पूरी तरह बैकअप नहीं बन सकता. इसलिए जोखिम बना रहता है.
केबल्स को नुकसान कैसे हो सकता है?
अंडरसी केबल्स को काटना आसान नहीं होता, लेकिन यह नामुमकिन भी नहीं है. कई बार यह जानबूझकर नहीं, बल्कि हादसे में भी टूट जाती हैं. जैसे जहाज का एंकर घसीटना या समुद्र में माइन बिछाना. पहले भी ऐसे केस सामने आ चुके हैं जब एक जहाज की वजह से कई केबल्स कट गई थीं और इंटरनेट पर बड़ा असर पड़ा था.
अगर कोई देश जानबूझकर ऐसा करता है, तो वह और भी बड़ा खतरा बन सकता है क्योंकि एक साथ कई केबल्स को टारगेट किया जा सकता है.
अगर केबल कट जाए तो क्या होगा?
सबसे पहले असर इंटरनेट स्पीड पर दिखेगा. फिर धीरे-धीरे बड़े प्लेटफॉर्म्स पर असर आएगा. बैंकिंग ट्रांजैक्शन, UPI, क्लाउड सर्विसेस, वीडियो स्ट्रीमिंग और इंटरनेशनल कॉलिंग प्रभावित हो सकती है.
अगर नुकसान ज्यादा हुआ और रिपेयर टीम्स वहां पहुंच नहीं पाईं, तो समस्या कई हफ्तों या महीनों तक भी चल सकती है. पहले भी कुछ केबल्स को ठीक करने में कई महीने लग चुके हैं.
क्या यह सिर्फ धमकी है या असली खतरा?
एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह सिर्फ सीधी धमकी नहीं, बल्कि एक स्ट्रैटेजिक सिग्नल भी है. यानी अगर जंग बढ़ती है, तो डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भी टारगेट बन सकता है.
हालांकि एक बड़ी बात यह भी है कि अगर ईरान केबल्स काटता है, तो उसका खुद का इंटरनेट भी प्रभावित हो सकता है. इसलिए कई एक्सपर्ट्स इसे आखिरी विकल्प मानते हैं, लेकिन खतरा फिर भी बना रहता है.
कुल मिलाकर समझिए
दुनिया अब सिर्फ तेल और जमीन पर नहीं, बल्कि डेटा पर भी चलती है. और यह डेटा समंदर के नीचे बिछी पतली केबल्स से गुजरता है. होर्मुज स्ट्रेट अब सिर्फ तेल का रास्ता नहीं, बल्कि इंटरनेट का भी गला बन चुका है. अगर यहां कुछ होता है, तो असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत समेत पूरी दुनिया तक पहुंचेगा.