अमेरिका और इज़राइल लगातार ईरान पर हमले कर रहे हैं. जवाब में ईरान भी अमेरिकी ठिकानों और इज़राइली शहरों पर मिसाइल दाग रहा है. हाल के हमलों में ईरान के अहम न्यूक्लियर ठिकानों को निशाना बनाए जाने की खबरें आई हैं, जिससे पूरे पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है.
हालात ऐसे हैं कि हर नई स्ट्राइक के बाद दुनिया तीसरे बड़े टकराव की आशंका जताने लगती है. लेकिन इस बार जंग सिर्फ आसमान में उड़ते फाइटर जेट या जमीन पर गिरती मिसाइलों की नहीं है.
वॉर में AI का जम कर हो रहा यूज
इस बार चर्चा एक और चीज़ की है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की. रिपोर्ट्स के मुताबिक, हालिया हमलों से पहले अमेरिकी सेना ने बड़े पैमाने पर AI टूल्स का इस्तेमाल डेटा एनालिसिस और ऑपरेशन प्लानिंग में किया.
सैटेलाइट तस्वीरें, ड्रोन फुटेज, सिग्नल इंटेलिजेंस और जमीनी रिपोर्ट्स जैसे भारी डेटा को इंसानों के लिए तुरंत समझना मुश्किल होता है, लेकिन AI कुछ ही मिनटों में पैटर्न पकड़ लेता है और संभावित टारगेट की सूची तैयार कर सकता है.
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रिपोर्ट्स में Anthropic के Claude जैसे मॉडल का नाम भी सामने आया है, जिसे सीधे हथियार चलाने के लिए नहीं बल्कि विश्लेषण और रणनीति बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया. साफ है कि अब जंग की तैयारी में एल्गोरिद्म की भूमिका बढ़ चुकी है. अंतिम फैसला अब भी इंसान लेते हैं, लेकिन फैसला लेने से पहले मशीनों से सलाह ली जा रही है.
न्यूक्लियर विकल्प चुन रहा है AI
इसी बीच एक नई स्टडी ने दुनिया की चिंता और बढ़ा दी है. अलग-अलग AI मॉडल्स को जब वॉर गेम सिमुलेशन में डाला गया और उन्हें न्यूक्लियर कोड जैसी काल्पनिक ताकत दी गई, तो बड़ी संख्या में मामलों में इन मॉडलों ने टकराव बढ़ाने वाले विकल्प चुने.
कई सिमुलेशन में AI ने पारंपरिक हथियारों की जगह न्यूक्लियर ऑप्शन को रणनीतिक रूप से सही बताया. एक्सपर्ट्स का कहना है कि इंसानों में जो न्यूक्लियर टैबू या नैतिक झिझक होती है, वह मशीन में स्वाभाविक रूप से नहीं होती. मशीन सिर्फ डेटा और संभावित जीत-हार के गणित को देखती है.
यही वजह है कि अमेरिका-इज़राइल और ईरान के मौजूदा संघर्ष के बीच यह बहस और तेज हो गई है कि भविष्य की जंग कैसी होगी. क्या मिसाइल दागने से पहले हजारों AI सिमुलेशन चलेंगे.
क्या टारगेट चुनने में इंसान से ज्यादा भरोसा मशीन पर होगा. और अगर कभी सिस्टम पूरी तरह ऑटोमेटिक हो गए तो क्या इंसानी कंट्रोल कमजोर पड़ सकता है.
पश्चिम एशिया में चल रहे हमलों ने यह साफ कर दिया है कि अब जंग सिर्फ जमीन, हवा और समुद्र तक सीमित नहीं रही. यह सर्वर, सॉफ्टवेयर और सुपरकंप्यूटर की भी जंग है.
जो देश डेटा और AI में आगे है, उसे रणनीतिक बढ़त मिल सकती है. लेकिन सवाल यही है कि अगर मशीनें टकराव बढ़ाने की सलाह देने लगें तो दुनिया कितनी सुरक्षित रहेगी.