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जंग में AI क्यों चुन रहा है न्यूक्लियर अटैक? मिडिल ईस्ट महा जंग में पहली बार यूज हो रहा बड़़े पैमाने पर एआई

मिडिल ईस्ट में महा जंग चल रही है. ये पहला मौका है जब किसी बड़े पैमाने पर लड़े जा रहे वॉर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है. साइबर वॉर फ्यूचर की बात नहीं रही, बल्कि अभी ही हो रही है. आइए समझते हैं ये पूरा प्रोसेस कैसे काम करता है.

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मिडिल ईस्ट महा जंग में AI बना बड़ा हथियार (Photo: ITG)
मिडिल ईस्ट महा जंग में AI बना बड़ा हथियार (Photo: ITG)

अमेरिका और इज़राइल मिल कर लगातार ईरान पर अटैक कर रहे हैं. ईरान भी लगातार अमेरिकी बेस और इज़राइल पर मिसाइल्स दाग रहा है. इस जंग में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल काफी अहम हो चुका है. 

आज की जंग सिर्फ मिसाइल और फाइटर जेट से नहीं लड़ी जा रही. असली गेम अब डेटा और AI का है. अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हाल के हमलों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में हुआ है. AI टूल्स ने इंटेलिजेंस समझने, टारगेट चुनने और ऑपरेशन प्लान करने में अहम रोल निभाया.

वॉर में ऐसे हो रहा आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल

सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की हुई, वह है Anthropic का Claude AI. द गार्जियन और रॉयटर्स की रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी सेना ने ईरान पर हमलों से पहले Claude जैसे AI मॉडल का इस्तेमाल डेटा एनालिसिस के लिए किया.

यह AI सीधे बम नहीं गिराता, लेकिन यह बहुत तेजी से सैटेलाइट तस्वीरें, ड्रोन फुटेज, सिग्नल डेटा और रिपोर्ट्स पढ़कर बताता है कि कहां क्या हो रहा है. इससे प्लान बनाने में काफी तेजी आती है.

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बात यहां तक आ गई कि अमेरिका ने पहले Anthropic के साथ रिश्ता तोड़ा, लेकिन बावजूद इसके Anthropic का टूल वॉर के लिए यूज किया गया. अब अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ वॉर एंथ्रॉपिक की जगह सैम ऑल्टमैन का OpenAI यूज करेगा. ऐसा इसलिए, क्योंकि एंथ्रॉपिक के फाउंडर मानते हैं कि AI को जरूरत से ज्यादा कंट्रोल देना खतरा बन सकता है. दूसरी तरफ सैम ऑल्टमैन मानते हैं कि AI को कंट्रोल देना चाहिए. 

इससे साफ होता है कि अब सैन्य सिस्टम AI पर काफी निर्भर होने लगे हैं.

जंग में आर्टिफ़िशियल इंटलेजिसें का रोल क्या है?

अब समझिए AI करता क्या है. मान लीजिए हजारों सैटेलाइट इमेज आ रही हैं. इंसान उन्हें एक-एक करके देखे तो घंटों लग जाएंगे. AI कुछ ही मिनटों में पैटर्न पकड़ लेता है. कहां ज्यादा मूवमेंट है. कौन-सी बिल्डिंग एक्टिव दिख रही है. किस इलाके में अचानक सिग्नल ट्रैफिक बढ़ा. यह सारी जानकारी मिलाकर सिस्टम संभावित टारगेट की लिस्ट बना सकता है.

इजरायल के काफी पहले से AI-बेस्ड सिस्टम यूज करता है जो टारगेट पहचानने में मदद करते हैं. ड्रोन और सर्विलांस डेटा को AI के जरिए प्रोसेस किया जाता है ताकि तेजी से फैसला लिया जा सके. इससे ऑपरेशन की स्पीड बढ़ती है.

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AI का रोल सिर्फ टारगेट तक सीमित नहीं है. लॉजिस्टिक्स, यानी कहां कौन-सी यूनिट भेजनी है. कौन-सा रास्ता सुरक्षित है. किस एंगल से हमला कम नुकसान करेगा. ऐसे कई फैसलों में AI मॉडल सिमुलेशन चलाकर अलग-अलग सीन दिखा सकते हैं. इससे कमांडर को अंदाजा मिलता है कि किस फैसले का क्या असर हो सकता है.

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हथियार के साथ-साथ साइबर वॉर

एक और बड़ा हिस्सा है साइबर वॉर. अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच डिजिटल मोर्चा भी खुला है. वेबसाइट्स हैक होना, नेटवर्क पर हमले, कम्युनिकेशन सिस्टम को बाधित करना, यह सब आज की जंग का हिस्सा है. AI ऐसे हमलों को पहचानने और जवाब देने में भी मदद करता है.

लेकिन यहां बड़ा सवाल भी है. अगर AI सुझाव दे रहा है कि कौन-सा टारगेट चुना जाए, तो आखिरी फैसला कौन लेता है? 

अभी भी अंतिम निर्णय इंसान ही लेते हैं. AI सिर्फ सलाह देता है. फिर भी डर यही है कि अगर भविष्य में सिस्टम और ज्यादा ऑटोमैटिक हो गए तो इंसानी कंट्रोल कम हो सकता है. अगर AI पर पूरा डिसिजन छोड़ देें तो छिड़ सकता है परमाणु युद्ध. 

टकराव बढ़ा कर AI ने चुना न्यूक्लियर अटैक

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कुछ स्टडीज में यह भी सामने आया है कि जब AI को युद्ध जैसी स्थिति में सिमुलेशन दिया गया तो उसने कई बार टकराव बढ़ाने वाले विकल्प चुने. यहां तक AI ने इस स्टडी में ट्रेडिशनल वेपन के बजाए न्यूक्लियर को तरजीह दी है. ये दर्शाता है कि अगर जंग में AI को खुली छूट दी गई तो ये कितना डरावना हो सकता है.

इसलिए दुनिया भर में इस बात पर बहस चल रही है कि AI को जंग में कितनी आजादी दी जानी चाहिए. साफ है कि अमेरिका-इजरायल और ईरान के इस संघर्ष ने दिखा दिया है कि अब जंग सिर्फ मैदान में नहीं, बल्कि सर्वर और एल्गोरिदम में भी लड़ी जा रही है. जो देश डेटा और AI में आगे है, उसे रणनीतिक बढ़त मिल सकती है.

भविष्य की जंग कैसी होगी? शायद ऐसी जहां मिसाइल से पहले एल्गोरिदम चलता हो. जहां बटन दबाने से पहले हजारों सिमुलेशन हो चुके हों. और जहां फैसला लेने में इंसान और मशीन दोनों शामिल हों.

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जंग में AI रोबोट्स की एंट्री

जैसे-जैसे युद्ध तकनीक आगे बढ़ रही है, एक और बड़ा बदलाव यह है कि अब जमीन पर भी रोबोट और AI मशीनें इस्तेमाल होने लगी हैं. सिर्फ आसमान से ड्रोन नहीं, बल्कि कुछ देशों ने ऐसे ऑटोनोमस या कंट्रोल वाले रोबोट डिवाइस तैयार किए हैं जो जमीन में खुद चल सकते हैं, खोज कर सकते हैं और मदद कर सकते हैं.

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दुनिया के कुछ हिस्सों में पहले से सेना-स्तर के रोबोट जैसे ट्रैक वाले वाहन, पैदल चलने वाले रोबोट और छोटे टैंक-जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल हो रहा है. अमेरिका और अन्य देशों ने जमीन पर जासूसी और खतरनाक इलाकों में सैनिकों की जगह इन मशीनों को भेजना शुरू किया है. 

पुराने उदाहरणों में अमेरिकी सेना ने MARCbot जैसे छोटे रोबोट को इस्तेमाल किया था, जो खतरनाक जगहों पर जाकर कैमरा और सेंसर से जानकारी लेता था ताकि इंसान खतरे में न पड़े. ऐसे रोबोट पहले से अफगानिस्तान और इराक जैसे इलाकों में काम कर चुके हैं.

जंगी रोबोट्स पर तेजी से काम कर रहा चीन

चीन भी रोबोटिक टेक्नोलॉजी पर बड़ी तेजी से काम कर रहा है. कुछ रिपोर्ट्स में यह दिखाया गया है कि चीन बॉर्डर पर ऐसे ह्यूमनॉइड रोबोट भेज रहा है जो पेट्रोलिंग, निगरानी और सुरक्षा जैसे काम कर सकते हैं. इन रोबोटों में AI दिमाग लगा है जिससे वे खुद-से रास्ता ढूंढ सकते हैं, बार बार बैटरी बदल सकते हैं और लंबी ड्यूटी दे सकते हैं. 

हालांकि कुछ वीडियो इंटरनेट पर जो रोबोट सैनिकों को राइफल ले कर चलते दिखाते हैं, वो कई बार AI-जनरेटेड या फेक भी पाए गए हैं, लेकिन असली में दुनिया भर की सेनाएं रोबोटिक्स पर काम कर रही हैं ताकि मानव सैनिकों को जोखिम से बचाया जा सके और जमीन पर खतरनाक काम रोबोट कर सके.

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ईरान के पास Aria जंगी रोबोट, मशीन गन तक चला सकता है

ईरान भी खुद ऐसे सिस्टम विकसित कर रहा है. सितंबर 2025 में ईरानी सेना ने अपना Aria नामक combat रोबोट पेश किया था, जो ट्रैक्ड प्लेटफॉर्म पर चलता है और रिमोट या AI-सहायता से निगरानी, गश्त या जरूरत पड़ने पर खुद लड़ाई में काम कर सकता है. 

यह रोबोट मशीन गन तक लगा सकता है और 2 किलोमीटर तक लक्ष्य पर फायर कर सकता है, जिससे कमांडर को सूझबूझ और सटीक मुकाबला करने में मदद मिलती है.

इसका मतलब यह है कि अगर भविष्य में युद्ध जमीन पर फैलता है, तो सैनिक सिर्फ इंसानों के रूप में नहीं बल्कि AI वाले रोबोट ग्राउंड यूनिट्स के रूप में भी काम करेंगे.

ये मशीनें खतरनाक इलाकों को पहले स्कैन कर सकती हैं, दुश्मन की पोजीशन बता सकती हैं, आक्रमण में मदद कर सकती हैं और घायल सैनिकों को भी सुरक्षित स्थान तक पहुंचा सकती हैं.

इस तरह की टेक्नोलॉजी अगर बड़े पैमाने पर लागू हो जाती है, तो जमीन पर लड़ाई का स्वरूप ही बदल जाएगा. इंसान को खतरनाक जगहों पर भेजने से पहले AI रोबोट भरोसेमंद सूचनाएं दे सकते हैं और कई बार ऐसे काम कर सकते हैं जो इंसानों के लिए जोखिम भरे हों.

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यही वजह है कि दुनिया के बड़े देश AI-सिस्टम और रोबोटिक्स में इतनी तेजी से निवेश कर रहे हैं, ताकि भविष्य के युद्ध में जमीन, हवा और साइबर तीनों मोर्चों पर मशीनें पहले तैयार हों.

 

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