देश में गर्मी का सीजन शुरू होने से पहले ही एयर कंडीशनर बाजार दबाव में आ गया है. आमतौर पर मार्च से कूलिंग प्रोडक्ट्स की मांग तेज होने लगती है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है. आपने ध्यान दिया होगा कि दिल्ली जैसे शहरों में भी फिलहाल बिना एसी के काम चल रहा है.
हाल ही में LPG शॉर्टेज की वजह से ऑनलाइन और ऑफलाइन मार्केट में इंलेक्ट्रिक कुकिंग अप्लाइंसेज मंहंगे हो गए. डबल कीमत हो गई और आउट ऑफ स्टॉक हो गए. बड़ा सवाल ये है कि क्या एयर कंडीशनर का मार्केट भी उसी तरफ जा रहा है?
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बेमौसम बारिश ने शुरुआती AC डिमांड को धीमा कर दिया है. दूसरी तरफ कच्चे माल और ईंधन की बढ़ती कीमतों ने कंपनियों मेकिंग कॉस्ट बढ़ा दी है. यानी बाजार एक साथ दो फ्रंट पर दबाव झेल रहा है. डिमांड में भी कमी है और सप्लाई चेन में भी मुश्किल.
मांग की शुरुआत कमजोर, सीजन पर टिका दांव
एसी कंपनियों के लिए मार्च और अप्रैल सबसे अहम होते हैं. यही वह समय होता है जब डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क में स्टॉक भरता है और रिटेल मांग तेज होती है. लेकिन इस बार उत्तर और पश्चिम भारत के कई हिस्सों में हुई बेमौसम बारिश की वजह से टेंप्रेचर ज्यादा नहीं हुआ है.
इसका असर सीधे शुरुआती बिक्री पर पड़ा है. क्योंकि अब तक दिल्ली जैसे शहरों में गर्मी शुरू हो जाती थी और एसी की जरूरत भी महसूस होने लगती थी. इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर अप्रैल में तापमान तेजी से नहीं बढ़ता, तो पूरे सीजन की मांग पर असर पड़ सकता है.
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मांग कमजोर होने के बावजूद कंपनियां कीमत बढ़ाने की तैयारी में हैं. दलील ये दी जा रही है कि मिडिल ईस्ट वॉर की वजह से सप्लाई चेन पर असर पड़़ रहा है. कॉपर, एल्यूमिनियम, स्टील और प्लास्टिक जैसे कच्चे माल महंगे हुए हैं. इसके अलावा रुपये में कमजोरी और लॉजिस्टिक्स लागत ने दबाव और बढ़ाया है.
इंडस्ट्री के प्रोजेक्शन के मुताबिक, इस सीजन में एसी की कीमतों में 5% से 15% तक बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है. कंपनियों के लिए दिक्कत यह है कि अगर वे कीमत नहीं बढ़ातीं, तो मार्जिन घटेगा. और अगर बढ़ाती हैं, तो डिमांड और कमजोर पड़ सकती है.
क्याों हो रहा है ऐसा?
इस बार एसी बाजार पर ग्लोबल डेवेलपमेंट का असर भी साफ दिख रहा है. वेस्ट एशिया में टेंशन और कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने पूरी सप्लाई चेन को डिसरप्ट किया है. तेल महंगा होने से पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट्स की लागत बढ़ती है, जो एसी के कई पार्ट्स में इस्तेमाल होते हैं.
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इसके अलावा LPG और गैस सप्लाई में दबाव की वजह से प्रोडक्शन पर भी असर पड़ने की उम्मीद है. कुछ इंडस्ट्री प्रोजेक्शन में यह भी कहा गया है कि अगर सप्लाई डिसरप्ट रहती है, तो प्रोडक्शन में 20% तक कमी करनी पड़ सकती है.
नए ऊर्जा नियमों का असर
इस साल से लागू नए ऊर्जा मानकों ने भी मेकिंग कॉस्ट बढ़ाने में रोल निभाया है. इन नियमों के तहत कंपनियों को ज्यादा एनर्जी बचाने वाले मॉडल बनाने पड़ रहे हैं. हालांकि इससे लंबे समय में बिजली की बचत होगी, लेकिन फिलहाल मशीन की लागत बढ़ी है, जिसका असर कीमतों पर दिख रहा है.
एसी कंपनियां इस समय अजीब स्थिति का सामना कर रही हैं. एक तरफ उन्हें पोटेंशियल डिमांड को ध्यान में रखते हुए प्रोडक्शन बढ़ाना है, दूसरी तरफ लागत और सप्लाई को लेकर अनिश्चितता है.
अगर मौसम अचानक गर्म होता है, तो मांग तेजी से बढ़ सकती है. लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ, तो ज्यादा स्टॉक जोखिम बन सकता है. यानी इस बार स्ट्रैटिजी बनाना भी चुनौती बन गया है.
इस पूरे डेवेलपमेंट का असर डायरेक्ट कस्टमर्स पर पड़ेगा. कीमतें पहले ही बढ़नी शुरू हो चुकी हैं और आगे और बढ़ोतरी के चासेंस बने हुए हैं. हालांकि, अगर मांग उम्मीद से कम रहती है, तो कंपनियां लिमिटेड टाइम के लिए ऑफर और छूट भी दे सकती हैं. लेकिन कुल मिलाकर इशारा यही हैं कि इस बार एसी खरीदना पहले के मुकाबले महंगा पड़ सकता है.