आईपीएल के इस सीजन में चेन्नई सुपर किंग्स (Chennai Super Kings) की हालत देखकर एक सवाल बार-बार सिर उठाता है, क्या इस टीम की धड़कन अब भी मैदान पर नहीं, ड्रेसिंग रूम के बाहर बैठी है? और जवाब जितना सीधा है, उतना ही असहज भी. जब तक महेंद्र सिंह धोनी नहीं लौटेंगे, CSK की कहानी अधूरी ही रहेगी.
शनिवार रात सनराइजर्स हैदराबाद (Sunrisers Hyderabad) के खिलाफ 10 रनों से हार सिर्फ एक और नतीजा नहीं थी, बल्कि उस गिरती लय का आईना थी, जिसे अब नजरअंदाज करना मुश्किल हो चुका है. अभिषेक शर्मा और हेनरिक क्लासेन ने अर्धशतक जड़कर मैच की नींव रखी, लेकिन असली फर्क वहां पड़ा जहां CSK को अपने ‘पुराने रूप’ की जरूरत थी. दबाव में शांत दिमाग, सटीक फैसले और आखिरी ओवरों में मैच निकालने की कला. SRH अब चौथे स्थान पर है, जबकि CSK 7वें पर.
यहीं से वो फर्क साफ नजर आया, जो कभी CSK को बाकी टीमों से अलग करता था.
ऋतुराज गायकवाड़ के पास प्रतिभा है, तकनीक है, लेकिन कप्तानी का वह ‘टेम्परामेंट’ अभी विकसित होता नहीं दिख रहा, जो इस टीम की जरूरत है. धोनी के दौर में CSK सिर्फ एक टीम नहीं, एक ‘सिस्टम’ थी, जहां हर खिलाड़ी को अपना रोल पता होता था और हर स्थिति के लिए एक स्पष्ट योजना होती थी. आज वही स्पष्टता गायब है. ऋतुराज की बल्लेबाजी में भी वह आत्मविश्वास नहीं दिख रहा, जो बड़े मौकों पर टीम को संभाल सके.
मिडिल ऑर्डर की स्थिति और चिंताजनक है. शिवम दुबे, जिन्हें फिनिशर की भूमिका में तैयार किया गया, वो लगातार उस भरोसे पर खरे नहीं उतर पा रहे. बड़े शॉट्स की कोशिश में निरंतरता गायब है, और यही वजह है कि आखिरी ओवरों में CSK का रन-चेज बार-बार लड़खड़ा जाता है. पहले यही वो चरण होता था, जहां धोनी क्रीज पर होते थे और विपक्षी टीम के लिए हर गेंद एक पहेली बन जाती थी.
गेंदबाजी में भी कहानी कुछ अलग नहीं है. CSK के गेंदबाजों के पास अनुभव है, विविधता है, लेकिन कप्तान की रणनीतिक सूझबूझ का अभाव साफ झलकता है. कब किस गेंदबाज को लाना है, किस बल्लेबाज के खिलाफ क्या फील्ड लगानी है, कब दबाव बनाना है और कब विकेट के लिए जोखिम लेना है... ये सभी छोटे-छोटे फैसले मिलकर मैच का रुख तय करते हैं. धोनी इन बारीकियों के उस्ताद थे. उनकी कप्तानी में गेंदबाज सिर्फ गेंद नहीं डालते थे, वे एक योजना पर काम करते थे.
CSK की सबसे बड़ी ताकत हमेशा उसकी ‘मेंटल स्ट्रेंथ’ रही है. यह टीम कभी घबराती नहीं थी, चाहे लक्ष्य कितना भी बड़ा हो या स्थिति कितनी भी कठिन. लेकिन इस सीजन में कई बार देखा गया है कि जैसे ही मैच टाइट होता है, टीम का आत्मविश्वास डगमगाने लगता है. यह वही CSK नहीं है, जिसे ‘कमबैक किंग’ कहा जाता था.
यहां सवाल सिर्फ तकनीक या फॉर्म का नहीं है- यह सवाल नेतृत्व का है.
धोनी की मौजूदगी सिर्फ विकेट के पीछे खड़े एक खिलाड़ी की नहीं थी, वह एक ‘गाइडिंग फोर्स’ थी. वह खिलाड़ियों को पढ़ते थे, मैच को पढ़ते थे, और सबसे अहम, दबाव को नियंत्रित करते थे. उनकी कप्तानी में CSK कभी हड़बड़ी में फैसले नहीं लेती थी. हर चाल सोच-समझकर, लंबी योजना के तहत चलती थी.
आज CSK के पास खिलाड़ी हैं, अनुभव है, लेकिन वह ‘दिमाग’ नहीं है, जो इन सभी टुकड़ों को जोड़कर एक विजयी तस्वीर बना सके.
इसलिए बार-बार यही सवाल उठता है- क्या CSK को फिर से पटरी पर लाने के लिए धोनी की वापसी जरूरी है? जवाब है- हां, और शायद पहले से भी ज्यादा.
सच तो ये है कि CSK इस वक्त सिर्फ खिलाड़ियों की कमी से नहीं, नेतृत्व की अनुपस्थिति से जूझ रही है. धोनी मैदान पर हों या न हों, उनकी मौजूदगी टीम की मानसिकता तय करती है. उनकी एक नजर, एक इशारा, एक शांत मुस्कान...ये सब मिलकर उस घबराहट को खत्म कर देते थे, जो आज हर अहम मोड़ पर दिख रही है.
इसलिए बात अब सीधी है- रणनीति बदलने, प्लेइंग इलेवन बदलने या रोल तय करने से ज्यादा जरूरी है उस भरोसे को वापस लाना, जो CSK की सबसे बड़ी ताकत था. और वो भरोसा, वो ठहराव, वो ‘धोनी फैक्टर’, वो तभी लौटेगा, जब MS Dhoni खुद लौटेंगे.