राजकोट में न्यूजीलैंड ने भारत को जिस अंदाज में 7 विकेट से मात दी, उसने केवल सीरीज बराबर नहीं की... बल्कि टीम इंडिया के 'वनडे प्रबंधन' में छिपी रणनीतिक खामियों को भी उजागर कर दिया. 285 का लक्ष्य ऐसा लगा जैसे कीवी टीम के लिए ‘ओपन नेट सेशन’ हो. डेरिल मिचेल (131*) और विल यंग (87) की 162 रनों की साझेदारी के सामने भारतीय गेंदबाजी बेअसर दिखी और 47.3 ओवरों में ही न्यूजीलैंड ने मैच निपटा दिया... ढाई ओवर बाकी रहते. स्टोरी सिर्फ हार नहीं है, बल्कि इस मैच ने तीन बड़ी 'क्रूर रियलिटी' उजागर कीं.
भारत की बल्लेबाजी: स्लो मोशन में सपने...
भारतीय बल्लेबाजी अब एक तय पैटर्न पर चलती दिख रही है- पावरप्ले में ठीक-ठाक शुरुआत, मिडिल ओवर्स में टेस्ट मैच वाली रफ्तार और फिर आखिर में किसी चमत्कार की उम्मीद. राजकोट में भी यही कहानी दोहराई गई. मिडिल ओवर्स में स्ट्राइक रोटेशन और आक्रामक इरादे की कमी ने स्कोरिंग की रफ्तार दबा दी, जिसके कारण 285 जैसा स्कोर आज के 300+ युग में औसत ही साबित हुआ. इतना लक्ष्य आधुनिक ODI माहौल में प्रतिद्वंद्वी पर दबाव नहीं डालता, बल्कि उसे शुरुआत से ही लय और आजादी दे देता है.
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भारत गेंदबाजी: नामों की भीड़, धार की कमी
भारतीय गेंदबाजों के पास राजकोट में न प्लान-A चला, न प्लान-B... स्पिनरों के पास न टर्न थी, न विकट लेने की चतुराई; तेज गेंदबाजों के पास न लेंथ का अनुशासन था, न वैरिएशन का असर. परिणाम यह हुआ कि कीवी बल्लेबाजी कभी दबाव में नहीं आई. मिचेल ने हार्ड लेंथ पर खेलना सिखाया और यंग ने क्रीज पर टिके रहने का महत्व दिखाया.
- पहला रहस्य: नीतीश रेड्डी- ऑलराउंडर का भ्रम
नीतीश कुमार रेड्डी को ऑलराउंडर के रूप में फिट करने की कोशिश भारतीय ODI सोच की सबसे उलझी पहेली है. वे दो ओवर से ज्यादा गेंदबाजी नहीं करते और नंबर 7 पर ऐसी बल्लेबाज़ी करते हैं, जिसमें न फिनिशिंग क्षमता दिखती है और न फ्लोटिंग रोल. ODI में इस स्लॉट से या 6–8 ओवर की स्थिर गेंदबाज़ी चाहिए या डेथ फिनिशिंग. दोनों नहीं मिल रही, नतीजा टीम बैलेंस पर सीधा असर.
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- दूसरा रहस्य: अर्शदीप सिंह- डेथ ओवर स्पेशलिस्ट, फिर भी बाहर
भारतीय चयन में अर्शदीप को बार-बार बाहर बैठाने की नीति समझ से परे है. अगर तर्क यह है कि वर्ल्ड कप को देखते हुए उन्हें ‘रेस्ट’ दिया जा रहा है, तो वैसा ही रेस्ट हर्षित राणा को क्यों नहीं? लेफ्ट-आर्म एंगल, नई गेंद और डेथ ओवर्स में कंट्रोल वाला गेंदबाज ODI में दुर्लभ पूंजी है. उन्हें लगातार बेंच पर रखना चयन दर्शन पर सवाल खड़े करता है.
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- तीसरा रहस्य: रवींद्र जडेजा — वरिष्ठ ऑलराउंडर का आउटपुट कम
जडेजा का अनुभव, क्लास और फील्डिंग अब भी सर्वोत्तम हैं, लेकिन ODI आउटपुट बल्लेबाजी और गेंदबाजी दोनों में पिछले महीनों में गिरा है. न बल्लेबाजी में फिनिशिंग वैल्यू उतनी, न गेंदबाजी में प्रभाव पहले जैसा. यहां तक कि अपने ‘रॉकेट थ्रो’ से विकेट चटकाने वाली उनकी काबिलियत भी अब कहीं पीछे छूट गई है.
भारतीय ODI सोच की जड़ समस्या: ऑलराउंडर खोज का जुनून
भारत ODI में मजबूत 6+1 कॉम्बिनेशन की जगह फैंसी ऑलराउंडर मॉडल को पकड़कर बैठा है. इस मॉडल से बल्लेबाजी अधूरी, गेंदबाजी हल्की, डेथ ओवर्स अराजक और बेंच पर गलत खिलाड़ियों की भीड़ दिखती है. ODI एक संतुलन-आधारित फॉर्मेट है जिसमें एक स्लॉट के मिसमैनेजमेंट से पूरी संरचना ढह जाती है. राजकोट इसका जीवंत उदाहरण था.
- दुनिया की मजबूत ODI टीमें अक्सर 6 बल्लेबाज + 1 विकेटकीपर + 4 विशेषज्ञ गेंदबाज या 5 गेंदबाज + 1 ऑलराउंडर मॉडल खेलती हैं.
- भारत अक्सर 'एक अतिरिक्त ऑलराउंडर' ढूंढने की कोशिश में ODI को T20 जैसी संरचना में ढाल देता है, जिससे दोनों विभाग अधूरे हो जाते हैं.
- भारत में ‘ऑलराउंडर की खोज’ का ट्रेंड:
हार्दिक/जडेजा/अक्षर/शार्दुल/वॉशिंगटन/नीतीश के साथ प्रयोग...
स्लॉट 7 पर आधा-बल्लेबाज–आधा-बॉलर टाइप खिलाड़ियों के प्रयोग से फिनिशिंग + गेंदबाजी दोनों प्रभावित होती हैं.
न्यूजीलैंड बनाम भारत: मानसिकता का फर्क
न्यूजीलैंड ने लक्ष्य तोड़ा, रन-रेट संभाला, विकेट बचाए और मैच को योजना से खेले. भारत ने लक्ष्य डिफेंड करने की कोशिश की, रणनीति में चूक की, दबाव में टूटा और उम्मीद पर खेलता रहा. हार सिर्फ मैदान पर नहीं, विचार में हुई.
आगे का सवाल: इंदौर में सिर्फ फाइनल नहीं, जवाब भी चाहिए
रविवार को इंदौर में सीरीज का फाइनल है, लेकिन असली चुनौती इससे बड़ी है- ODI में रोल स्पष्ट करने की, टीम बैलेंस स्थापित करने की और यह स्वीकार करने की कि ODI T20 का छोटा भाई नहीं, अलग विज्ञान है. राजकोट ने एक बात साफ कर दी- मैच हारे जा सकते हैं, पर सोच नहीं हारनी चाहिए.