भारतीय क्रिकेट में एक नई जंग छिड़ चुकी है. इस बार मैदान पर नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर! दिग्गज ऑफ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने 'फैन आर्मी' के नाम पर चल रहे इस डिजिटल खेल को खुलकर ललकारा है. उनका सीधा वार- 'ये बीमारी है...'सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि क्रिकेट की बदलती आत्मा पर करारा तमाचा है.
अश्विन ने साफ इशारा किया है कि सोशल मीडिया पर जो ट्रेंड्स, बहसें और ‘ओपिनियन’ दिखते हैं, उनमें से कई बिल्कुल नेचुरल नहीं हैं. यानी पर्दे के पीछे कोई स्क्रिप्ट लिखी जा रही है और फैन्स सिर्फ उसे आगे बढ़ा रहे हैं. ये आरोप छोटा नहीं है- ये सीधे उस सिस्टम पर सवाल है, जो खिलाड़ियों को 'भगवान' और बाकी को 'साइड कैरेक्टर' बना देता है.
... यानी यह कोई हल्का-फुल्का आरोप नहीं है, बल्कि एक गंभीर इशारा है कि क्रिकेट के अंदर ऐसा माहौल बन गया है जहां कुछ खिलाड़ियों को जरूरत से ज्यादा महिमामंडित (भगवान जैसा) किया जाता है, जबकि बाकी खिलाड़ियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है या उन्हें कम अहमियत (सिर्फ सहायक किरदार) माना जाता है.
इससे पहले सुनील गावस्कर और गौतम गंभीर भी इस ‘सुपरस्टार कल्चर’ को लेकर चेतावनी दे चुके हैं. लेकिन अश्विन ने इसे और आगे ले जाकर ‘ऑर्केस्ट्रेशन’ यानी सुनियोजित खेल की तरफ इशारा कर दिया है. मतलब यह है कि अश्विन सिर्फ फैन आर्मी के असर की बात नहीं कर रहे, बल्कि यह संकेत दे रहे हैं कि सोशल मीडिया पर जो राय और ट्रेंड्स दिखते हैं, वे पूरी तरह नेचुरल नहीं होते.
Revsportz Conclave में अश्विन ने जो खुलासा किया, वो और भी चौंकाने वाला है. उन्होंने कहा, 'जो बातें वो निजी बातचीत में सुनते हैं, वही कुछ समय बाद सोशल मीडिया पर अलग नाम से ट्रेंड करने लगती हैं. सवाल सीधा है- क्या ये सब अपने आप हो रहा है? या फिर कोई इसे पीछे से चला रहा है?
आज का क्रिकेटर सिर्फ खिलाड़ी नहीं, एक चलता-फिरता 'ब्रांड' है. पीआर, इमेज और फॉलोइंग...सब कुछ मायने रखता है. लेकिन अश्विन की नाराजगी यहां है कि इस दौड़ में अब खिलाड़ी, खिलाड़ी को ही काटने लगे हैं- सीधे नहीं, बल्कि 'फैन आर्मी' के जरिए.
उन्होंने साफ कहा, 'दूसरे खिलाड़ी को गिराकर खुद ऊपर उठना? ये मैं कभी नहीं करूंगा. 'यानी इशारा साफ है- सब खेल ‘क्लीन’ नहीं है.
इस ‘डिजिटल ड्रामे’ का सबसे बड़ा नुकसान क्या है? क्रिकेट खुद गायब हो रहा है! अब चर्चा इस पर नहीं होती कि गेंद कैसे घूमी, बैटिंग में क्या तकनीकी खामी थी, बल्कि इस पर होती है कि 'कौन बेहतर', 'किसका फैनबेस बड़ा', 'किसे टारगेट किया गया'.
अश्विन ने इसे 'सिनेमाई सुपरहीरो कल्चर' कहा- जहां खिलाड़ी क्रिकेटर नहीं, फिल्मी किरदार बन चुके हैं. और हर किरदार के पीछे खड़ी है एक आर्मी, जो किसी भी कीमत पर अपने ‘हीरो’ को जिताना चाहती है.
इसका ताजा शिकार बने शुभमन गिल...जब अश्विन ने गिल के आउट होने की तकनीकी वजहें समझाईं, तो मामला क्रिकेट से निकलकर पर्सनल एजेंडा बन गया. सवाल उठे- 'सिर्फ Gill ही क्यों?'
यहीं अश्विन का गुस्सा फूटा, 'मेरे लिए ‘क्या’ और ‘क्यों’ मायने रखता है, ‘कौन’ नहीं.' लेकिन आज के दौर में ‘कौन’ ही सब कुछ बन चुका है. इसी बीच, अश्विन का करियर भी एक अहम मोड़ पर खत्म हुआ. बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी 2024-25 के दौरान, जब वॉशिंगटन सुंदर को तरजीह मिली, तो उन्होंने इंटरनेशनल क्रिकेट को अलविदा कह दिया.
537 टेस्ट विकेट- सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, एक युग की कहानी है. उनसे आगे सिर्फ अनिल कुंबले हैं.
... लेकिन अश्विन असली ‘क्लाइमेक्स’ शायद यह बयान है, जहां उन्होंने क्रिकेट के सामने खड़े सबसे बड़े खतरे को बेनकाब किया है. अब असली सवाल यही है- क्या क्रिकेट ‘जेंटलमैन गेम’ रहेगा? या फिर 'फैन आर्मी' के हाथों एक डिजिटल जंग बनकर रह जाएगा?