आज हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, उसमें कई ऐसी चीजें हैं जो कभी युद्ध के मैदान के लिए बनाई गई थीं. सैन्य जरूरतों ने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को नई खोज करने के लिए मजबूर किया. ये खोजें शुरू में हथियार, संचार या सैनिकों की सुरक्षा के लिए थीं, लेकिन बाद में आम लोगों की जिंदगी को आसान और बेहतर बनाने लगीं. इंटरनेट से लेकर माइक्रोवेव ओवन तक, कई चीजें सैन्य रिसर्च का नतीजा हैं.
इंटरनेट: परमाणु हमले से बचने के लिए बना नेटवर्क
इंटरनेट की शुरुआत 1969 में अमेरिकी रक्षा विभाग (US DoD) की परियोजना ARPANET से हुई. उस समय ठंडे युद्ध के दौरान परमाणु हमले का खतरा था. अमेरिका चाहता था कि अगर कोई शहर नष्ट हो जाए तो भी कंप्यूटरों के बीच सूचना का मिलती रहे. इसलिए उन्होंने एक ऐसा नेटवर्क बनाया जो कई जगहों पर फैला हो और टूटने पर भी काम करे.
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शुरू में यह सिर्फ सैन्य संस्थानों और विश्वविद्यालयों के बीच था. धीरे-धीरे यह आम लोगों तक पहुंचा. आज इंटरनेट बिना जिसके हम कल्पना भी नहीं कर सकते – मोबाइल, सोशल मीडिया, ऑनलाइन शॉपिंग – सब इसी का हिस्सा हैं. ARPANET ने TCP/IP प्रोटोकॉल को जन्म दिया, जो आज पूरी दुनिया का आधार है.
GPS: सैनिकों की सटीक लोकेशन के लिए बने उपग्रह
1978 में अमेरिकी सेना ने GPS (Global Positioning System) सैटेलाइट लॉन्च किए. शुरू में यह सिर्फ सैनिकों के लिए था ताकि वे युद्ध में अपनी सटीक जगह जान सकें और मिसाइलें सही निशाने पर दाग सकें. 24 सैटेलाइट का नेटवर्क पृथ्वी के चारों ओर घूमता है और सिग्नल भेजता है.
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1996 में नागरिकों के लिए खोल दिया गया, लेकिन सैन्य संस्करण ज्यादा सटीक है. आज हम कार में, फोन में या डिलीवरी ऐप में GPS इस्तेमाल करते हैं. बिना इसके न तो उबर-ओला-स्विगी काम करेगी न ही कोई नेविगेशन. यह सैन्य तकनीक ने यात्रा और लॉजिस्टिक्स को पूरी तरह बदल दिया.
रडार: दुश्मन विमानों को पकड़ने से मौसम पूर्वानुमान तक
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रडार (Radio Detection and Ranging) को ब्रिटेन और अमेरिका ने विकसित किया. यह रेडियो तरंगों से दुश्मन के विमानों और जहाजों का पता लगाता था. युद्ध में यह बहुत काम आया. बाद में इसी तकनीक से हवाई अड्डों पर विमान नियंत्रण, मौसम पूर्वानुमान और यहां तक कि माइक्रोवेव ओवन भी बना.
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1945 में एक रडार इंजीनियर की जेब में रखी चॉकलेट बार पिघल गई, जिससे पता चला कि माइक्रोवेव खाना गर्म कर सकती है. आज हर घर में माइक्रोवेव ओवन है, जो कुछ मिनटों में खाना तैयार कर देता है.
सुपर ग्लू: बंदूक की निशानेबाजी के लिए बना चिपकने वाला पदार्थ

द्वितीय विश्व युद्ध में सुपर ग्लू (सायनोएक्रिलेट) को साफ प्लास्टिक गन साइट्स बनाने के लिए विकसित किया गया. शुरू में यह चिपकने वाला पदार्थ था, लेकिन बाद में पता चला कि यह बहुत तेजी से चिपकता है. 1958 में इसे बाजार में लाया गया. आज हम घर में, दफ्तर में या स्कूल में छोटे-मोटे टूटे सामान को जोड़ने के लिए सुपर ग्लू इस्तेमाल करते हैं. यह इतना मजबूत है कि छोटी-छोटी चीजें भी जमा लेता है.
डक्ट टेप: गोला-बारूद के डिब्बों को सील करने के लिए
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एक फैक्ट्री वर्कर वेस्टा स्टाउट ने देखा कि गोला-बारूद के डिब्बों को सील करने वाली पेपर टेप नमी से खराब हो जाती है. सैनिकों को जल्दी खोलने में दिक्कत होती. उन्होंने राष्ट्रपति रूजवेल्ट को चिट्ठी लिखी.
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जॉनसन एंड जॉनसन कंपनी ने कपड़े की मजबूत, पानी रोकने वाली टेप बनाई, जिसे शुरू में डक टेप कहा गया क्योंकि यह बत्तख की तरह पानी रोकती थी. सैनिक इसे हर चीज ठीक करने के लिए इस्तेमाल करते थे. आज डक्ट टेप घरेलू मरम्मत, पैकिंग और इमरजेंसी में हर जगह इस्तेमाल होता है.
डीईटी इंसेक्ट रिपेलेंट: जंगल युद्ध में मच्छरों से बचाव
द्वितीय विश्व युद्ध में प्रशांत महासागर के जंगलों में अमेरिकी सैनिकों को मच्छरों से बहुत परेशानी होती थी. मलेरिया और डेंगू जैसे रोग फैलते थे. अमेरिकी सेना ने DEET (डायथाइलटोलुआमाइड) विकसित किया. यह कीड़े भगाता था. आज हर गर्मी में हम DEET वाले इंसेक्ट स्प्रे लगाते हैं ताकि मच्छर काट न सकें. यह सैन्य रिसर्च ने लाखों लोगों की जान बचाई.
ड्रोन: सैन्य निगरानी से डिलीवरी और फोटोग्राफी तक

सैन्य UAV (Unmanned Aerial Vehicles) यानी ड्रोन की शुरुआत प्रथम विश्व युद्ध के आसपास हुई, लेकिन आधुनिक रूप 1960 के दशक में आया. शुरू में ये जासूसी, हमला और निगरानी के लिए थे. आज सिविलियन ड्रोन अमेजन डिलीवरी, शादी की फोटोग्राफी, कृषि में फसल छिड़काव और फिल्म बनाने में इस्तेमाल होते हैं.
कैन फूड: नेपोलियन की सेना के लिए लंबा टिकने वाला भोजन
1795 में फ्रांस के नेपोलियन बोनापार्ट ने 12,000 फ्रैंक इनाम रखा कि कोई ऐसी विधि बताए जिसमें सेना के लिए भोजन लंबे समय तक खराब न हो. कन्फेक्शनर निकोलस अपर्ट ने ग्लास जार में भोजन भरकर उबालने की विधि खोजी. बाद में टिन के डिब्बे आए. यह कैनिंग कहलाया. नेपोलियन की सेना को इससे फायदा हुआ. आज हम दाल, सब्जी, फल के कैन घर में रखते हैं. बिना कैन फूड के आधुनिक जीवन की कल्पना मुश्किल है.
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एविएटर सनग्लासेस: पायलटों की आंखों की सुरक्षा

1930 के दशक में अमेरिकी सेना ने एविएटर सनग्लासेस बनवाए. ऊंचाई वाली उड़ान में सूरज की तेज रोशनी से पायलटों की आंखें बचाने के लिए टीयरड्रॉप आकार के लेंस और मेटल फ्रेम वाले चश्मे बनाए गए. द्वितीय विश्व युद्ध में ये बहुत लोकप्रिय हुए. आज ये फैशन स्टेटमेंट हैं. कई लोग स्टाइल के लिए पहनते हैं.
वेल्क्रो: प्रकृति से प्रेरित चिपकने वाला
1941 में स्विस इंजीनियर जॉर्जेस डी मेस्ट्राल ने कुत्ते के फर और पौधों से प्रेरणा ली. उन्होंने हुक और लूप वाला फास्टनर बनाया, जिसे वेल्क्रो नाम दिया. शुरू में यह सैन्य और स्पेस सूट में इस्तेमाल हुआ. आसान खोलने-बंद करने के कारण आज जूते, बैग, कपड़े और यहां तक कि डायपर में भी वेल्क्रो है.
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फ्रीज-ड्राइड फूड और अन्य चीजें
द्वितीय विश्व युद्ध में सैनिकों के लिए हल्का और लंबे समय तक चलने वाला भोजन चाहिए था. फ्रीज-ड्राइंग विधि विकसित हुई, जिसमें पानी निकालकर भोजन सूखा कर दिया जाता है. आज इंस्टेंट कॉफी, फ्रीज-ड्राइड फल और सैनिक राशन इसी पर आधारित हैं.

इसी तरह जीप (Willys Jeep) युद्ध में इस्तेमाल हुई, जो बाद में सिविलियन 4x4 वाहनों की मां बनी. हम्वी (Humvee) सैन्य वाहन से सिविलियन Hummer बना. ये उदाहरण दिखाते हैं कि युद्ध की मजबूरी ने कितनी उपयोगी चीजें जन्म दीं. सैन्य अनुसंधान ने न सिर्फ देश की सुरक्षा की बल्कि आम जीवन को भी सुविधाजनक बनाया.
आज जब हम माइक्रोवेव में खाना गर्म करते हैं या GPS से रास्ता ढूंढते हैं, तो अनजाने में सैनिकों और वैज्ञानिकों का शुक्रिया अदा कर रहे होते हैं जिन्होंने इनका आविष्कार किया. भविष्य में भी नई सैन्य तकनीकें रोजमर्रा की जिंदगी को और बेहतर बनाने वाली हैं.