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कामदा एकादशी व्रत कथा

कामदा एकादशी व्रत कथा

कामदा एकादशी व्रत रखने से भक्तों की मनोकामना पूरी हो सकती है. इसके अतिरिक्त, यह मन, आत्मा और शरीर को शुद्ध करने में सहायक है. साथ ही, यह व्यक्ति से सभी राक्षसी शापों को दूर करने में भी मदद मिलती है. इस दिन विधिपूर्वक व्रत और पूजा करने से व्यक्ति को सभी पापों से छुटकारा मिलता है और उसके जीवन में सुख और समृद्धि आती है. हर वर्ष चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को कामदा एकादशी का व्रत रखा जाता है.

कामदा एकादशी व्रत कथा
कामदा एकादशी व्रत कथा

प्राचीन काल में भोगीपुर नामक एक गांव था, जहां पुंडरीक नामक राजा राज करते थे. यहां पर कई अप्सरा, किन्नर और गंधर्व का भी वास था. उनमें से ललिता और ललित नाम के पति-पत्नी भी थे, जिनके बीच अटूट प्रेम था.

 

एक दिन ललित राजा पुंडरीक के दरबार में गायन कर रहा था कि अचानक उसे पत्नी ललिता की याद आ गई, जिसके कारण उसका स्वर बिगड़ गया. ऐसे में राजा पुंडरीक क्रोधित हो गए और ललित को राक्षस होने का श्राप दे दिया. जिसके बाद ललित मांस खाने वाला राक्षस बन गया. 

 

पुंडरीक के श्राप के बाद ललित के मुख से अग्नि निकलने लगी, सूर्य और चंद्रमा की तरह शरीर जलने लगा. उसके बाल पर्वत समान खड़े हो गए और शरीर की भुजाएं वृक्ष के समान बड़ी हो गईं. अपने पाप को भोगते हुए ललित जंगल-जंगल भटकने लगा. ललित के साथ पत्नी ललिता भी भटक रही थी. इस दौरान ललिता विंध्याचल पर्वत पहुंच गई, जहां उसे एक ऋषि मिले, जिन्होंने ललिता से उसका हाल पूछा, जिसके बाद ललिता ने अपने पति को लगे श्राप के बारे में विस्तार से बताया. साथ ही श्राप से मुक्ति का उपाय भी पूछा. तब ऋषि ने बताया कामदा एकादशी आने वाली है, अगर तुम यह व्रत रख लो और पति को अपना पुण्य दे दो तो उसे श्राप से छुटकारा मिल जाएगा.

 

जिसके बाद ललिता ने इस व्रत को विधि-पूर्वक किया और अपने पुण्य को पति को दे दिया और ललित ठीक हो गया. इसके बाद वशिष्ठ मुनि ने कहा यह व्रत करने से सभी पापों का नाश होता है साथ ही, सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं. संसार में इसके बराबर कोई व्रत नहीं है.

 

विष्णु जी आरती 


ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

 

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥

 

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥

 

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥

 

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥

 

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥

 

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥

 

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥

 

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥

 

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥

 

-------समाप्त-------

समाप्त

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