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जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha)

जया एकादशी व्रत कथा

जया एकादशी के दिन विष्णु जी की पूजा करने और व्रत रखने से जातकों को सुख-शांति मिलती है. कहा जाता है कि इस दिन कथा पढ़ने से हर तरह के पापों से मुक्ति मिल जाती है. श्रद्धा पूर्वक भगवान विष्णु की आरती करने से भगवान भूल–चूक माफ करते हैं और घर में सुख-समृद्धि बना रहता है.

जया एकादशी व्रत कथा
जया एकादशी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से पूछते करते हैं कि माघ शुक्ल एकादशी को किसे देवता की पूजा करनी चाहिए और इस एकादशी का क्या महात्मय है. इसके जवाब में श्रीकृष्ण कहते हैं कि माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहते हैं. यह एकादशी बहुत ही पुण्यदायी है, इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति नीच योनि जैसे कि भूत, प्रेत, पिशाच की योनि से मुक्त हो जाता है.

 

जो मनुष्य इस दिन भगवान की पूजा सच्चे मन से करते हैं और व्रत रखते हैं, उसे भूत-पिशाच की योनि से मुक्ति मिल जाती है. श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को जया एकादशी के प्रसंग के बारे में भी बताया.

 

एक बार नंदन वन में उत्सव चल रहा था. इस उत्सव में सभी देवता, जाने-माने संत और दिव्य पुरुष भी शामिल हुए थे. उस समय गंधर्व गाना गा रहे थे और गंधर्व कन्याएं नृत्य प्रस्तुत कर रही थीं. सभा में माल्यवान नामक एक गंधर्व और पुष्पवती नामक गंधर्व कन्या का नृत्य चल रहा था. इसी बीच पुष्यवती की नजर जैसे ही माल्यवान पर पड़ी वह उस पर मोहित हो गई.

 

पुष्यवती ये सोचकर सभा की मर्यादा को भूलकर ऐसा नृत्य करने लगी जिससे माल्यवान उसकी ओर आकर्षित हो जाए. माल्यवान गंधर्व कन्या की भंगिमा को देखकर सुध बुध खो बैठा और गायन की मर्यादा से भटक गया जिससे सुर ताल उसका साथ छोड़ गए. दोनों ही अपनी धुन में एक-दूसरे की भावनाओं को प्रकट कर रहे थे, किंतु वे इस बात से अनजान थे कि देवराज इन्द्र उनकी इस नादानी पर क्रोधित हो रहे थे. तभी उन्होंने दोनों को नीच पिशाच योनि प्राप्त होने का श्राप दिया. इस शाप से तत्काल दोनों पिशाच बन गए और हिमालय पर्वत पर एक वृक्ष पर दोनों का निवास बन गया.

 

पिशाच योनि में इन्हें काफी तकलीफों का सामना करना पड़ रहा था. इसी बीच माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि आई. इस दिन सौभाग्य से दोनों ने केवल फलाहार ग्रहण किया. उस रात ठंड काफी थी तो वे दोनों पूरी रात्रि जागते रहे, ठंड के कारण दोनों की मृत्यु हो गई. हालांकि, उनकी मृत्यु जया एकादशी का व्रत करके हुई जिसके बाद उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिली और वे स्वर्ग लोक में पहुंच गए.

 

इंद्रदेव उन दोनों को वहां देख हैरान हो गए और पिशाच योनि से मुक्ति कैसी मिली यह पूछा. माल्यवान ने कहा यह भगवान विष्णु की जया एकादशी का प्रभाव है. हम इस एकादशी के प्रभाव से पिशाच योनि से मुक्त हुए हैं. इंद्र इससे अति प्रसन्न हुए और कहा कि आप जगदीश्वर के भक्त हैं इसलिए आप अब से मेरे लिए आदरणीय है, आप स्वर्ग में आनंद से रहें.

 

विष्णु जी आरती 


ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

 

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय…॥

 

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय…॥

 

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय…॥

 

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय…॥

 

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय…॥

 

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय…॥

 

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय…॥

 

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय…॥

 

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ ॐ जय…॥

 

 

जया एकादशी व्रत कथा पूजा सामग्री

  • भगवान विष्णु की मूर्ति
  • पीला कपड़ा, पीला फूल, दीप
  • पंचामृत, केला, तिल की मिठाई
  • अक्षत, पीला चंदनधूप, कपूरपान पत्ता
  • तुलसी पत्ता, गोपी चंदन, हवन सामग्री

 

जया एकादशी व्रत कथा पूजा विधि

  • स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें
  • दीपक जलाएं
  • विष्णु जी को पंचामृत से स्नान कराएं
  • पीले वस्त्र, चंदन, ऋतु फल, फूल अर्पित करें
  • तुलसी दल 108 पत्ते अर्पित करें

 

जया एकादशी व्रत कथा मुख्य लाभ और महत्व

  • पापों का नाश
  • प्रेत योनि से मुक्ति
  • मोक्ष प्राप्ति

-------समाप्त-------

समाप्त

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