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दिल्ली के 'मिनी बंगाल' में तैयार है मां का दरबार

दिल्ली में एक तरफ नवरात्र के दौरान मां के मंदिर सजे-धजे हैं तो दूसरी तरफ मां दुर्गा के पंडाल भक्ति का ऐसा माहौल बना रहे हैं कि दिल्ली वाले सब कुछ भूलकर बस मां के जयकारे लगाते दिखेंगे...

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दुर्गा मां
दुर्गा मां

नवरात्र चल रहे हैं और थीम पंडालों के लिए मशहूर सीआर पार्क में दुर्गा पूजा पंडाल की तैयारियां आखिरी चरण पर हैं. कोलकाता की पूजा का रंग समेटकर दिल्ली का 'मिनी बंगाल' तैयार है अपने भक्तों को प्रकृति और संस्कृति का अनोखा संगम दिखाने के लिए.

आकाल बोधन थीम पर सजाया पांडाल
यहां के ब्लॉक का पूजा पंडाल सजावट के मामले में काफी आकर्षक है. थीम है आकाल बोधोन. नीलकमल के आकार में पंडाल सजा नजर आएगा. को-ऑपरेटिव पूजा समिति के आयोजक शोर्बोशीष भट्टाचार्या ने बताया कि 'मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए भगवान श्री राम ने 108 नीलकमल के फूल चढ़ाने का संकल्प किया था, ने श्री राम की भक्ति की परीक्षा लेने के लिए एक कमल का फूल छिपा दिया.

लिहाजा अपनी भक्ति और पूजा को पूर्ण करने के लिए कमलनयनी श्री राम ने अपने नेत्रों का दान करने का फैसला किया. भगवान राम की भक्ति से मां दुर्गा प्रसन्न हो गईं और उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया. इसी कथा को प्रेरणा लेकर इस साल नील कमल के रुप में मां का पंडाल सजाया गया है.'

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चटाई, बांस, मिट्टी, सुपारी के पेड़ की छाल, जूट जैसे रिसाइकलिंग प्रोडक्ट से बना ये पंडाल पूरी तरह इकोफ्रेंडली है. पंडाल की दीवारों पर भगवान श्री राम के मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए कमल समान नयनों को अर्पित करने की कहानी उकेरी गई है. तो वहीं मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा भी इकोफ्रेंडली है... जो पंडाल की खूबसूरती में चार चांद लगा रही है.

वाद्य यंत्र के आकार में पंडाल
सीआर पार्क के बी ब्लॉक में भी भव्य पंडाल सजाया जा रहा है. इकोफ्रेंडली थीम को ध्यान में रखते हुए पंडाल को वाद्य यंत्र की तर्ज पर अनोखा आकार दिया गया है. नगाड़े के आकार के में अंदर जाने पर आपको बंगाल के कलाकारों की कारीगरी नजर आ जाएगी. मां की सांध्य आरती के दौरान बजने वाले शंख, मंजीरा, ढाक जैसे वाद्य यंत्र हैं. पांच दिन के इस महोत्सव में रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पंडाल की शोभा बढ़ाते हैं.


इकोफ्रेंडली है सब कुछ
इस साल पूजा से लेकर पंडाल तक सबकुछ पारंपरिक है. सिर्फ पंडाल ही नहीं मां दुर्गा की प्रतिमा गढ़ने वाले कलाकार भी खास तौर पर बंगाल से आते हैं. पर्यावरण को ध्यान रखते हुए मूर्तियां पूरी तरह मिट्टी और नेचुरल रंगों से बनाई गई है. पारंपरिक 'एक चाला' ढांचे में बनी इन मूर्तियों को बनाने में 3 से 4 महीने का वक्त लगता है.

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षष्ठी को मां दुर्गा का आमत्रंण होगा... और उसके बाद मां की भक्ति से झूम उठेगा 'मिनी बंगाल'.


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