Ramcharitmanas: अयोध्या में नवनिर्मित राम मंदिर की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं. भगवान राम की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी को होगी. रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के अवसर पर अयोध्या के साथ-साथ पूरा देश राममय हो रहा है. इस खास मौके पर हम आपको तुलसीदास द्वारा अवधी में लिखी गई राम की कहानी बता रहे हैं. आज हम जानेंगे कि भगवान राम माता सीता से पहली बार कब, कहां और कैसे मिले थे.
प्रभु श्री रामचन्द्र जी ऐसे दीनबन्धु और बिना ही कारण दया करने वाले हैं. श्री राम जी और लक्ष्मण जी मुनि विश्वामित्र के साथ चले. वे वहां गए, जहां जगत को पवित्र करने वाली गंगा जी थीं. महाराज गाधि के पुत्र विश्वामित्र जी ने वह सब कथा कह सुनाई जिस प्रकार देव नदी गंगा जी पृथ्वी पर आई थीं. तब प्रभु ने ऋषियों सहित स्नान किया. ब्राह्मणों ने भांति-भांति के दान पाए. फिर मुनि वृन्द के साथ वे प्रसन्न होकर चले और शीघ्र ही जनकपुर के निकट पहुंच गए. श्री राम जी ने जब जनकपुर की शोभा देखी, तब वे छोटे भाई लक्ष्मण सहित अत्यन्त हर्षित हुए. वहां अनेकों बावलियां, कुएं, नदी और तालाब हैं, जिनमें अमृत के समान जल है और मणियों की सीढ़ियां बनी हुई हैं. मकरन्द-रस से मतवाले होकर भौरे सुंदर गुंजार कर रहे हैं. रंग-बिरंगे पक्षी मधुर शब्द कर रहे हैं. रंग-रंग के कमल खिले हैं. सदा (सब ऋतुओं में) सुख देने वाला शीतल, मंद, सुगंध पवन बह रही है. पुष्पवाटिका, बाग और वन, जिनमें बहुत से पक्षियों का निवास है, फूलते, फलते और सुंदर पत्तों से लदे हुए नगर के चारों ओर सुशोभित हैं. नगर की सुंदरता का वर्णन करते नहीं बनता. मन जहां जाता है; वहीं लुभा जाता है. सुंदर बाजार हैं, मणियों से बने हुए विचित्र छज्जे हैं, मानो ब्रह्मा ने उन्हें अपने हाथों से बनाया है.
अति अनूप जहँ जनक निवासू। बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू।।
होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु रोकी।।
आमों का एक अनुपम बाग देखकर, जहां सब प्रकार के सुभीते थे और जो सब तरह से सुहावना था, विश्वामित्रजी ने कहा- हे सुजान रघुवीर! मेरा मन कहता है कि यहीं रहा जाए. कृपा के धाम श्री रामचन्द्र जी 'बहुत अच्छा स्वामिन्!' कहकर वहीं मुनियों के समूह के साथ ठहर गए. मिथिलापति जनक जी ने जब यह समाचार पाया कि महामुनि विश्वामित्र आए हैं, तब उन्होंने पवित्र हृदय के मंत्री, बहुत-से योद्धा, श्रेष्ठ ब्राह्मण, गुरु (शतानन्दजी) और अपनी जाति के श्रेष्ठ लोगों को साथ लिया और इस प्रकार प्रसन्नता के साथ राजा मुनियों के स्वामी विश्वामित्र जी से मिलने चले. राजा ने मुनि के चरणों पर मस्तक रखकर प्रणाम किया. मुनियों के स्वामी विश्वामित्र जी ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया. फिर सारी ब्राह्मण मंडली को आदर सहित प्रणाम किया और अपना बड़ा भाग्य जानकर राजा आनंदित हुए. बार-बार कुशलप्रश्न करके विश्वामित्रजी ने राजा को बैठाया. उसी समय दोनों भाई आ पहुंचे, जो फुलवाड़ी देखने गए थे. सुकुमार किशोर अवस्था वाले, श्याम और गौर वर्ण के दोनों कुमार नेत्रों को सुख देने वाले और सारे विश्व के चित्त को चुराने वाले हैं. जब रघुनाथ जी आए तब सभी उनके रूप एवं तेज से प्रभावित होकर उठकर खड़े हो गए. विश्वामित्र जी ने उनको अपने पास बैठा लिया.
जब राजा जनक से मिले प्रभु राम
दोनों भाइयों को देखकर सभी सुखी हुए. सबके नेत्रों में जल भर आया (आनंद और प्रेम के आंसू उमड़ पड़े) और शरीर रोमांचित हो उठे. रामजी की मधुर मनोहर मूर्ति को देखकर जनक विशेष रूप से देह की सुध-बुध खो बैठे. मन को प्रेम में मग्न जान राजा जनक ने विवेक का आश्रय लेकर धीरज धारण किया और मुनि के चरणों में सिर नवाकर प्रेम भरी गम्भीर वाणी से कहा- हे नाथ! कहिये, ये दोनों सुंदर बालक मुनिकुल के आभूषण हैं या किसी राजवंश के पालक? अथवा जिसका वेदों ने 'नेति' कहकर गान किया है कहीं वह ब्रह्म तो युगलरूप धरकर नहीं आया है? मेरा मन जो स्वभाव से ही वैराग्यरूप बना हुआ है, इन्हें देखकर इस तरह मुग्ध हो रहा है जैसे चन्द्रमा को देखकर चकोर. हे प्रभु! इसलिए मैं आपसे सत्य (निश्छल) भाव से पूछता हूं. हे नाथ! बताइए, छिपाव न कीजिए. इनको देखते ही अत्यन्त प्रेम के वश होकर मेरे मन ने जबर्दस्ती ब्रह्मसुख को त्याग दिया है. मुनि ने हंसकर कहा- हे राजन्! आपने ठीक ही कहा. आपका वचन मिथ्या नहीं हो सकता. जगत में जहां तक जितने भी प्राणी हैं, ये सभी को प्रिय हैं. मुनि की रहस्यभरी वाणी सुनकर श्री राम जी मन-ही-मन मुसकुराते हैं (मानो संकेत करते हैं कि रहस्य खोलिए नहीं). तब मुनि ने कहा- ये रघुकुल मणि महाराज दशरथ के पुत्र हैं. मेरे हित के लिए राजा ने इन्हें मेरे साथ भेजा है. ये राम और लक्ष्मण दोनों श्रेष्ठ भाई रूप, शील और बल के धाम हैं. सारा जगत इस बात का साक्षी है कि इन्होंने युद्ध में असुरों को जीतकर मेरे यज्ञ की रक्षा की है.
राजा ने कहा- हे मुनि! आपके चरणों के दर्शन कर मैं अपना पुण्य प्रभाव कह नहीं सकता. ये सुंदर श्याम और गौर वर्ण के दोनों भाई आनंद को भी आनंद देने वाले हैं. इनकी आपस की प्रीति बड़ी पवित्र और सुहावनी है, वह मन को बहुत भाती है, पर वाणी से कही नहीं जा सकती. जनक जी आनंदित होकर कहते हैं– हे नाथ! सुनिए, ब्रह्म और जीव की तरह इनमें स्वाभाविक प्रेम है. राजा बार-बार प्रभु को देखते हैं. प्रेम से शरीर पुलकित हो रहा है और हृदय में बड़ा उत्साह है. फिर मुनि की प्रशंसा करके और उनके चरणों में सिर नवाकर राजा उन्हें नगर में लिवा चले. एक सुंदर महल जो सभी ऋतुओं में सुखदायक था, वहां राजा ने उन्हें ले जाकर ठहराया. तदंतर सब प्रकार से पूजा और सेवा करके राजा विदा मांगकर अपने घर गए. रघुकुल के शिरोमणि प्रभु श्री रामचन्द्र जी ऋषियों के साथ भोजन और विश्राम करके भाई लक्ष्मण समेत बैठे. उस समय पहरभर दिन रह गया था. इसके बाद दोनों भाई गुरु से आज्ञा लेकर राजा जनक का नगर देखने निकल पड़े.
देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई।।
जौं सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू।।
वापस लौटने के बाद वे आराम करने शयन कक्ष में गए. रात बीतने पर, मुर्गे का शब्द कानों से सुनकर लक्ष्मण जी उठे. जगत के स्वामी सुजान श्री रामचन्द्र जी भी गुरु से पहले ही जाग गए. वे जाकर नहाये. फिर नित्यकर्म समाप्त करके उन्होंने मुनि को मस्तक नवाया. पूजा का समय जानकर, गुरु की आज्ञा पाकर दोनों भाई फूल लेने चले. उन्होंने जाकर राजा का सुंदर बाग देखा, जहां वसन्त ऋतु लुभाकर रह गई है. मन को लुभाने वाले अनेक वृक्ष लगे हैं. रंग-बिरंगी उत्तम लताओं के मंडप छाये हुए हैं. नए पत्तों, फलों और फूलों से युक्त सुंदर वृक्ष अपनी सम्पत्ति से कल्पवृक्ष को भी लजा रहे हैं. पपीहे, कोयल, तोते, चकोर आदि पक्षी मीठी बोली बोल रहे हैं और मोर सुंदर नृत्य कर रहे हैं.
देवी सीता से ऐसे मिले भगवान राम
चारों ओर दृष्टि डालकर और मालियों से पूछकर वे प्रसन्न मन से पत्र-पुष्प लेने लगे. उसी समय सीताजी वहां आईं. माता ने उन्हें गिरिजा (पार्वती) जी की पूजा करने के लिए भेजा था. साथ में सब सुंदरी और सयानी सखियां हैं, जो मनोहर वाणी से गीत गा रही हैं. सरोवर के पास गिरिजा जी का मंदिर सुशोभित है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता; देखकर मन मोहित हो जाता है. सखियों सहित सरोवर में स्नान करके सीताजी प्रसन्न मन से गिरिजा जी के मन्दिर में गईं. उन्होंने बड़े प्रेम से पूजा की और अपने योग्य सुंदर वर मांगा. एक सखी सीताजी का साथ छोड़कर फुलवाड़ी देखने चली गई थी. उसने जाकर दोनों भाइयों को देखा और प्रेम में विह्वल होकर वह सीताजी के पास आई. सखियों ने उसकी दशा देखी कि उसका शरीर पुलकित है और नेत्रों में जल भरा है. सब कोमल वाणी से पूछने लगीं कि अपनी प्रसन्नता का कारण बता. उसने कहा- दो राजकुमार बाग देखने आए हैं. किशोर अवस्था के हैं और सब प्रकार से सुंदर हैं. वे सांवले और गोरे रंग के हैं; उनके सौन्दर्य को मैं कैसे बखानकर कहूं. वाणी बिना नेत्र की है और नेत्रों के वाणी नहीं है. यह सुनकर और सीताजी के हृदय में बड़ी उत्कंठा जानकर सब सयानी सखियां प्रसन्न हुईं. तब एक सखी कहने लगी- हे सखी! ये वही राजकुमार हैं जो सुना है कि कल विश्वामित्र मुनि के साथ आए हैं.
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे।।
नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा।।
और जिन्होंने अपने रूप की मोहिनी डालकर नगर के स्त्री-पुरुषों को अपने वश में कर लिया है. जहां-तहां सब लोग उन्हीं की छवि का वर्णन कर रहे हैं. अवश्य चलकर उन्हें देखना चाहिए, वे देखने के योग्य हैं. उसके वचन सीताजी को अत्यन्त ही प्रिय लगे और दर्शन के लिए उनके नेत्र अकुला उठे. उसी प्यारी सखी को आगे करके सीताजी चलीं. पुरानी प्रीति को कोई लख नहीं पाता. नारदजी के वचनों का स्मरण करके सीताजी के मन में पवित्र प्रीति उत्पन्न हुई. वे चकित होकर सब ओर इस तरह देख रही हैं मानो डरी हुई मृगछौनी इधर-उधर देख रही हो. कंकण (हाथों के कड़े), करधनी और पायजेब के शब्द सुनकर श्री रामचन्द्र जी हृदय में विचारकर लक्ष्मण से कहते हैं- यह ध्वनि ऐसी आ रही है मानो कामदेव ने विश्व को जीतने का संकल्प करके डंके पर चोट मारी है. ऐसा कहकर श्री राम जी ने फिरकर उस ओर देखा. श्री सीताजी के मुख रूपी चन्द्रमा को निहारने के लिए उनके नेत्र चकोर बन गए. सुंदर नेत्र स्थिर हो गए (टकटकी लग गई). मानो निमि (जनकजी के पूर्वज) ने जिनका सबकी पलकों में निवास माना गया है, लड़की- दामाद के मिलन-प्रसंग को देखना उचित नहीं, इस भाव से सकुचाकर पलकें छोड़ दीं. सीताजी की शोभा देखकर श्रीरामजी ने बड़ा सुख पाया. हृदय में वे उसकी सराहना करते हैं, किन्तु मुख से वचन नहीं निकलते. वह शोभा ऐसी अनुपम है मानो ब्रह्मा ने अपनी सारी निपुणता को मूर्तिमान कर संसार को प्रकट करके दिखा दिया हो.
सीताजी की शोभा सुंदरता को भी सुंदर करने वाली है. वह ऐसी मालूम होती है मानो सुंदरता रूपी घर में दीपक की लौ जल रही हो. अबतक सुंदरता रूपी भवन में अंधेरा था, वह भवन मानो सीताजी की सुंदरता रूपी दीपशिखा को पाकर जगमगा उठा है, पहले से भी अधिक सुंदर हो गया है. सारी उपमाओं को तो कवियों ने जूठा कर रखा है. मैं जनकनन्दिनी श्री सीताजी की किससे उपमा दूं. इस प्रकार हृदय में सीताजी की शोभा का वर्णन करके और अपनी दशा को विचारकर प्रभु श्री रामचन्द्र जी पवित्र मन से अपने छोटे भाई लक्ष्मण से समयानुकूल वचन बोले- हे तात! यह वही जानकजी हैं, जिनके लिए धनुषयज्ञ हो रहा है. सखियां इसे गौरीपूजन के लिए ले आई हैं. यह फुलवाड़ी में प्रकाश करती हुई फिर रही है, जिसकी अलौकिक सुंदरता देखकर स्वभाव से ही पवित्र मेरा मन क्षुब्ध हो गया है. वह सब कारण (अथवा उसका सब कारण) तो विधाता जानें. किन्तु हे भाई! सुनो, मेरे मंगलदायक दाहिने अंग फड़क रहे हैं. रघुवंशियों का यह सहज जन्मगत स्वभाव है कि उनका मन कभी कुमार्ग पर पैर नहीं रखता. मुझे तो अपने मन का अत्यन्त ही विश्वास है कि जिसने स्वप्न में भी परायी स्त्री पर दृष्टि नहीं डाली है. रण में शत्रु जिनकी पीठ नहीं देख पाते (अर्थात् जो लड़ाई के मैदान से भागते नहीं), परायी स्त्रियां जिनके मन और दृष्टि को नहीं खींच पातीं और भिखारी जिनके यहां से खाली हाथ नहीं लौटते, ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसार में थोड़े हैं. यों श्रीरामजी छोटे भाई से बातें कर रहे हैं, पर मन सीताजी के रूप में लुभाया हुआ उनके मुखरूपी कमल के छवि रूप मकरन्द-रस को भौंरे की तरह पी रहा है.
सीताजी चकित होकर चारों ओर देख रही हैं. मन इस बात की चिंता कर रहा है कि राजकुमार कहां चले गए. बालमृगनयनी (मृग के छौने की-सी आंखवाली) सीताजी जहां दृष्टि डालती हैं, वहां मानो श्वेत कमलों की कतार बरस जाती है. तब सखियों ने लता की ओट में सुंदर श्याम और गौर कुमारों को दिखलाया. उनके रूप को देखकर नेत्र ललचा उठे. वे ऐसे प्रसन्न हुए मानो उन्होंने अपना खजाना पहचान लिया. श्रीरघुनाथजी की छवि देखकर नेत्र थकित (निश्चल) हो गए. पलकों ने भी गिरना छोड़ दिया. अधिक स्नेह के कारण शरीर विह्वल हो गया. मानो शरद्-ऋतु के चन्द्रमा को चकोरी [बेसुध हुई] देख रही हो. नेत्रों के रास्ते श्रीरामजी को हृदय में लाकर चतुर शिरोमणि जानकीजी ने पलकों के किवाड़ लगा दिए (अर्थात् नेत्र मूंदकर उनका ध्यान करने लगीं). जब सखियों ने सीताजी को प्रेम के वश जाना, तब वे मन में सकुचा गईं. कुछ कह नहीं सकती थीं. उसी समय दोनों भाई लतामंडप में से प्रकट हुए. मानो दो निर्मल चन्द्रमा बादलों के पर्दे को हटाकर निकले हों. दोनों सुंदर भाई शोभा की सीमा हैं. उनके शरीर की आभा नीले और पीले कमल की सी है. सिर पर सुंदर मोरपंख सुशोभित हैं. उनके बीच-बीच में फूलों की कलियों के गुच्छे लगे हैं. माथे पर तिलक और पसीने की बूंदें शोभायमान हैं. कानों में सुंदर भूषणों की छवि छायी है. टेढ़ी भौंहें और घुंघराले बाल हैं. नए लाल कमल के समान रतनारे (लाल) नेत्र हैं.
ठोड़ी, नाक और गाल बड़े सुंदर हैं, और हंसी की शोभा मनको मोल लिए लेती है. मुख की छवि तो मुझसे कही ही नहीं जाती, जिसे देखकर बहुत-से कामदेव लजा जाते हैं. वक्ष स्थल पर मणियों की माला है. शंख के सदृश सुंदर गला है. कामदेव के हाथी के बच्चे की सूंड के समान (उतार-चढ़ाव वाली एवं कोमल) भुजाएं हैं, जो बल की सीमा हैं. जिसके बायें हाथ में फूलों सहित दोना है, हे सखि ! वह सांवला कुंअर तो बहुत ही सलोना है. सिंह की-सी (पतली, लचीली) कमर वाले, पीताम्बर धारण किए हुए, शोभा और शील के भण्डार, सूर्यकुल के भूषण श्रीरामचन्द्रजी को देखकर सखियां अपने-आपको भूल गईं. एक चतुर सखी धीरज धरकर, हाथ पकड़कर सीताजी से बोली- गिरिजाजी का ध्यान फिर कर लेना, इस समय राजकुमार को क्यों नहीं देख लेतीं. तब सीताजी ने सकुचाकर नेत्र खोले और रघुकुल के दोनों सिंहों को अपने सामने खड़े देखा. नख से शिखा तक श्रीरामजी की शोभा देखकर और फिर पिता का प्रण याद करके उनका मन बहुत क्षुब्ध हो गया. जब सखियों ने सीताजी को परवश (प्रेम के वश) देखा, तब सब भयभीत होकर कहने लगीं - बड़ी देर हो गई, अब चलना चाहिए. कल इसी समय फिर आएंगी, ऐसा कहकर एक सखी मन में हंसी. सखी की यह रहस्यभरी वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गईं. देर हो गई जान उन्हें माता का भय लगा. बहुत धीरज धरकर वे श्रीरामचन्द्रजी को हृदय में ले आईं, और उनका ध्यान करती हुई अपने को पिता के अधीन जानकर लौट चलीं.
मृग, पक्षी और वृक्षों को देखने के बहाने सीताजी बार-बार घूम जाती हैं और श्रीरामजी की छवि देख-देखकर उनका प्रेम कम नहीं बल्कि बढ़ रहा है. शिवजी के धनुष को कठोर जानकर वे मन में विलाप करती हुई हृदय में श्रीरामजी की सांवली मूर्ति को रखकर चलीं. (शिवजी के धनुष की कठोरता का स्मरण आने से उन्हें चिन्ता होती थी कि ये सुकुमार रघुनाथजी उसे कैसे तोड़ेंगे, पिता के प्रण की स्मृति से उनके हृदय में क्षोभ था ही, इसलिए मन में विलाप करने लगीं. प्रेमवश ऐश्वर्य की विस्मृति हो जाने से ही ऐसा हुआ.