हर साल ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मां धूमावती की जयंती के रूप में मनाया जाता है. इस साल धूमावती जयंती गुरुवार, 14 जून यानी आज है. धूमावती मां पार्वती का ही एक रूप हैं. मां धूमावती के एक हाथ में तलवार है. देवी के बाल बिखरे हुए हैं और इनका स्वरूप काफी रौद्र और भयानक है. मां धूमावती की पूजा से पापियों और शत्रुओं का नाश होता है. इनकी आराधना से व्यक्ति के जीवन से विपत्ति, रोग आदि के संकट दूर हो जाते हैं. लेकिन मां धूमावती की पूजा सुहागिन महिलाओं के लिए वर्जित है. आइए मां धूमावती की पूजन विधि और कथा बताते हैं.
धूमावती जयंती की पूजन विधि
धूमावती जयंती के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि के बाद साफ कपड़े पहन लें. इसके बाद सूर्य देवता को अर्घ्य अर्पित करें. फिर पूरे घर को गंगाजल से पवित्र करें. इसके बाद पूजा में मां को सफेद रंग के फूल, आक के फूल, और सफेद रंग के वस्त्र अर्पित करें. इसके बाद पूजा में गंगाजल, केसर, कुमकुम, अक्षत, धतूरा, आक, सुपारी, दूर्वा, फल, शहद, कपूर, चंदन, नारियल, पंचमेवा, पूजा में अवश्य शामिल करें. इसके बाद देवी के समक्ष दीपक प्रज्ज्वलित करें. इस दिन की पूजा में सफेद तिल अवश्य शामिल करें.
धूमावती जयंती की पौराणिक कथा
मां धूमावती को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. इनमें सबसे प्रमुख भगवान शिव और माता पार्वती की कथा है. कहते हैं एक बार देवी पार्वती ने भोलेनाथ से अपने लिए भोजन की व्यवस्था करने को कहा. लेकिन जब तक महादेव देवी के लिए खाने का बंदोबस्त कर पाते, उनकी भूख का बांध टूट गया. देवी इस कदर व्याकुल हो गईं कि उन्होंने स्वयं अपने पति भोले शंकर को ही निगल लिया. लेकिन शिवजी के गले में विष होने के कारण मां पार्वती उन्हें गले से नीचे नहीं उतार सकीं. उनके शरीर से धुआं निकलने लगा. इसी जहर के प्रभाव से उनका रूप बेहद ही भयंकर दिखने लगा.
इसके बाद सभी देवी-देवताओं ने देवी पार्वती से भगवान शिव को मुक्त करने का अनुरोध किया. मुक्त होने के बाद शिवजी ने क्रोध में आकर देवी को वृद्ध विधवा होने का श्राप दिया था. शिवजी ने देवी सती से कहा कि तुम्हारे इस रूप को दुनिया धूमावती देवी के नाम से जानेगी. यही वजह है कि सुहागन महिलाओं को धूमावती जयंती के दिन की पूजा नहीं करनी चाहिए. सुहागनों के लिए इनकी पूजा अशुभ मानी जाती है.