महाशिवरात्रि का मौका है और इस दौरान महादेव के 12 ज्योतिर्लिंगों की भी चर्चा होती है. इसी में से एक खास ज्योतिर्लिंग है बाबा वैद्यानाथ धाम. यह महादेव के वैद्य स्वरूप को समर्पित है. हालांकि इस ज्योतिर्लिंग को लेकर सवाल है कि असली ज्योतिर्लिंग कहां हैं? क्योंकि इस धाम को लेकर हमेशा बहस होती रही है. कोई कहता है हिमाचल, कोई बताता है महाराष्ट्र, तो ज्यादातर श्रद्धालु झारखण्ड के देवघर का नाम लेते हैं. आखिर सच क्या है?
शक्तिपीठ हृदयस्थली होने के कारण महादेव हैं विराजमान
इस बारे में झारखंड के देवघर स्थिति बाबा वैद्यनाथ धाम में पंडा दीप मिश्रा बताते हैं कि झारखंड में महादेव वैद्यनाथ का असली स्थान मानने की वजह है कि यह चिताभूमि है. चिता भूमि माता का शक्तिपीठ है और शक्तिपीठ की स्थली होने के कारण ही यहां महादेव विराजमान हुए. अपनी बात को समझाने के लिए वह शास्त्रों का हवाला देते हैं.
आदि शंकराचार्य ने अपने ‘द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र’ में बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का जिक्र करते हुए साफ लिखा है कि यह भारत की पूर्वोत्तर दिशा में ‘चिताभूमि’ में स्थित है, जहां भगवान शिव माता गिरिजा के साथ वास करते हैं. अब अगर भारत का नक्शा सामने रखकर देखें तो पूर्वोत्तर दिशा में झारखण्ड का देवघर ही बैठता है.
दूसरा बड़ा आधार है शिव पुराण. कथा के मुताबिक, जब माता सती ने दक्ष यज्ञ में अपने प्राण त्याग दिए, तो भगवान शंकर उनका शरीर कंधे पर लेकर व्याकुल होकर घूमते रहे. उसी दौरान सती का हृदय जिस जगह गिरा, वह स्थान ‘चिताभूमि’ कहलाया. मान्यता है कि वहीं शिवजी ने उस हृदय का दाह-संस्कार किया. यही स्थान आगे चलकर शक्ति पीठ भी बना. यह चिताभूमि देवघर, झारखण्ड में मानी जाती है. आज भी वहां बाबा बैद्यनाथ और माता का मंदिर साथ-साथ आस्था का केंद्र है.
अब सवाल उठता है कि फिर हिमाचल और महाराष्ट्र का नाम क्यों आता है?
हिमाचल के कांगड़ा का क्या है दावा?
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित बैजनाथ मंदिर बहुत प्राचीन है और स्थानीय मान्यता में बेहद पूजनीय है. वहीं महाराष्ट्र के परली का वैद्यनाथ मंदिर भी श्रद्धालुओं के बीच प्रसिद्ध है. लेकिन इन दोनों स्थानों को ‘चिताभूमि’ के रूप में कहीं स्वीकार नहीं किया गया है. न तो शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख मिलता है और न ही ऐसा कोई ठोस शोध सामने आया है, जिससे इन्हें मूल बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग कहा जा सके.
उनके मुताबिक इतिहासकारों और प्रामाणिक ऐतिहासिक सोर्स में जब इस विषय में जवाब लिया गया तब महाराष्ट्र के परली मंदिर के बारे में कहा गया कि यहां ऐसा कोई प्रामाणिक ज्योतिर्लिंग दर्ज नहीं है. हिमाचल के बैजनाथ मंदिर को लेकर भी यह बात सामने आई कि यहां भी चिताभूमि नहीं है, इसे असली बैद्यनाथ धाम सिद्ध किया जा सके ऐसा कोई शोध भी नहीं है. खास बात यह है कि इन दोनों स्थानों को ‘चिताभूमि’ नहीं माना जाता.
दूसरी तरफ देवघर की पहचान सिर्फ शास्त्रों तक सीमित नहीं है. सावन के महीने में लाखों कांवड़िए सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर पैदल देवघर पहुंचते हैं और बाबा पर जल चढ़ाते हैं. यह परंपरा सदियों पुरानी है. आम जनमानस की आस्था भी देवघर को ही बैद्यनाथ धाम मानती आई है. जब हम सारे पहलुओं को साथ रखकर देखते हैं,
आदि शंकराचार्य का पूर्वोत्तर दिशा का संकेत, शिव पुराण में वर्णित चिताभूमि, सती के हृदय के गिरने की कथा और देवघर की लगातार चली आ रही आस्था तो तस्वीर साफ नजर आती है. शास्त्रीय और पारंपरिक आधार देवघर, झारखण्ड की ओर ही इशारा करते हैं.