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कैलास, गिरनार और पावागढ़ हिल्स, हिंदुओं ही नहीं जैनियों के लिए भी तीर्थ स्थल हैं ये पर्वत

भारत में जैन और हिंदू परंपराओं के पर्वतीय तीर्थ स्थल अपनी प्राचीनता और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं. कैलास पर्वत, गिरनार पर्वत, शत्रुंजय पर्वत, सम्मेद शिखरजी और पावागढ़ पहाड़ी जैसे तीर्थ स्थल दोनों धर्मों के लिए पवित्र माने जाते हैं.

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कैलास पर्वत सिर्फ हिंदुओं ही नहीं जैन परंपरा में भी पवित्र माना जाता है
कैलास पर्वत सिर्फ हिंदुओं ही नहीं जैन परंपरा में भी पवित्र माना जाता है

जैन परंपरा खुद को भारत की सबसे प्राचीन परंपरा बताती है. अहिंसा, सत्य, तप, और मोक्ष के चार तत्वों को ही जीवन का लक्ष्य और उद्देश्य मानकर जीने वाले जैन समुदाय के लोगों के तीर्थ भी इन्हीं शिक्षाओं पर आधारित हैं. सबसे बड़ी बात है कि जैन परंपरा और हिंदू परंपरा की मान्यताएं बहुत अलग-अलग दिखाई देते हुए भी अपनी जड़ों में एक जैसी हैं. यही वजह है कि दोनों के कई तीर्थस्थलों में भी समानता है.

सिर्फ देश के पवित्र पर्वतीय तीर्थों की ही बात करें तो ऐसे कई पहाड़ी तीर्थस्थल हैं जो हिंदुओं और जैनियों दोनों के लिए ही बहुत पवित्र और मान्यता वाले हैं. 

कैलास पर्वत : हिंदुओं के लिए यह भगवान शिव का निवास स्थान है. माना जाता है कि महादेव शिव यहीं निवास करते हैं. यहीं मानसरोवर झील है जो काफी पवित्र मानी जाती है. जैन परंपरा में कैलास को पहले तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) से जोड़कर देखा जाता है. उन्हें भगवानि आदिनाथ भी कहा जाता है. जैन कथा के अनुसार भगवान आदिनाथ ने यहीं से मोक्ष पाया था. इसे जैन ग्रंथों में अष्टपद भी कहा जाता है.

गिरनार पर्वत (गुजरात): यह जैन परंपरा के लिए 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ की निर्वाण स्थली के रूप में पवित्र है. भगवान नेमिनाथ श्रीकृष्ण के ही परिवार से बताए जाते हैं. दोनों का काल और युग महाभारत के दौरान का ही है. कहते हैं कि जब नेमिनाथ का विवाह हो रहा था, उस दौरान दावत के लिए लाए गए पशुओं की पुकार उनके लिए ब्रह्म की आवाज बन गई. उन्होंने उसी समय वैराग्य ले लिया. नेमिनाथ अपनी विवाह पालकी से उतर गए और सजे-धजे कपड़े भी उतार दिए. फिर उन्होंने श्रमण परंपरा अपना ली. इसके बाद उन्हें गिरनार पर्वत से मोक्ष की प्राप्ति हुई.

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गिरनार पर्वत हिंदुओं के लिए भी पवित्र तीर्थ स्थल है. यहां अंबा माता का प्राचीन मंदिर है. यह तीर्थ शक्तितीर्थ के रूप में जाना जाता है और इसकी चढ़ाई की बहुत मान्यचा है.

शत्रुंजय पर्वत (पालिताना, गुजरात): गुजरात के पालिताना में मौजूद यह पर्वत पुंडरीक नाम से भी जाना जाता है. जैन परंपरा की मानें तो यहां प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने निर्वाण प्राप्त किया था. इस पर्वत पर राम, सीता और पांडवों के भी आने का जिक्र मिलता है. कहते हैं कि इस स्थान पर खुद भगवान विष्णु चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए इसे पुंडरीक पर्वत कहा जाता है. श्रद्धालु यहां नवरात्र के मौके पर दर्शन के लिए आते हैं.

सम्मेद शिखरजी (झारखंड): झारखंड राज्य के गिरिडीह में स्थित यह पर्वत जैन परंपरा का प्रमुख तीर्थ स्थल है. इसे जैन लोग शिखरजी नाम से पुकारते हैं. यह पर्वत 20 तीर्थंकरों के निर्वाण स्थली के रूप में जाना जाता है और जैनियों के लिए सर्वोच्च तीर्थ है. इसे पारसनाथ पर्वत भी कहते हैं, और आदिवासी परंपरा में भी यह पूजनीय है. आदिवासी इसे ईश्वर का मधुबन कहते हैं. 

पावागढ़ पहाड़ी (गुजरात): यह जैन मंदिर और महाकाली के जागृत स्थान के रूप में दोनों धर्मों के लिए आस्था का केंद्र है. गुजरात के पंचमहल जिले में स्थित प्रसिद्ध तीर्थ 822 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यहां प्रसिद्ध महाकाली माता मंदिर (शक्तिपीठ) चोटी पर स्थित है, जहां 1800 सीढ़ियां या रोपवे से पहुंचा जा सकता है. यह क्षेत्र यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल 'चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व पार्क' का हिस्सा है, जो अपने ऐतिहासिक किलों और मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है.

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जैन ग्रंथों (निर्वाण कांड) के अनुसार, यह स्थान अत्यंत प्राचीन है. 19वीं शताब्दी के प्रमाणों के अनुसार, पूरी पहाड़ी पर केवल दिगंबर जैन मंदिर थे. चंद्रप्रभ और सुपार्श्वनाथ मंदिर काली माता मंदिर के पास ही स्थित है. पार्श्वनाथ मंदिर इस समूह का मुख्य मंदिर, जो अन्य मंदिरों से घिरा हुआ है और जैन परंपरा के लोगों की आस्था का केंद्र है.

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