चंद्र देव चालीसा का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक शांति मिलती है, तनाव कम होता है और भावनात्मक संतुलन बना रहता है. ज्योतिष शास्त्र में चंद्रदेव को मन, माता और भावनाओं का प्रमुख कारक माना जाता है.इस चालीसा के पाठ से मन की चंचलता शांत होती है और व्यक्ति अधिक स्थिर एवं संतुलित महसूस करता है. माना जाता है कि इसके नियमित पाठ से कुंडली में चंद्र दोष के प्रभाव कम होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि एवं सकारात्मकता बढ़ती है.
॥ दोहा ॥
शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन करुं प्रणाम।
उपाध्याय आचार्य का, ले सुखकारी नाम।।
सर्व साधु और सरस्वती, जिन मन्दिर सुखकर।
चंद्रपूरी के चन्द्र को, मन मन्दिर में धार।।
॥ चौपाई ॥
जय जय स्वामी श्री जिन चंदा, तुमको निरख भये आनंदा।
तुम ही प्रभु देवन के देवा, करुं तुम्हारे पद कि सेवा।।
वेष दिगंबर कहलाता है, सब जग के मन भाता है।
नासा पर है द्रष्टि तुम्हारी, मोहनि मूर्ति कितनी प्यारी।।
तीन लोक की बाते जानो, तीन काल क्षण में पहचानो।
नाम तुम्हारा कितना प्यारा, भूत प्रेत सब करे निवारा।।
तुम जग में सर्वज्ञ कहलाओ, अष्टम तीर्थकर कहलाओ।।
महासेन जो पिता तिहारे, लक्ष्मणा के दिल के प्यारे।।
तज वैजंत विमान सिधाये, लक्ष्मणा के उर मे आये।
पोष वदी एकादश नामी, जन्म लिया चन्दा प्रभु स्वामी।।
मुनि समंतभद्र थे स्वामी, उन्हें भस्म व्याधि बीमारी।
वैष्णव धर्म जभी अपनाया, अपने को पंडित कहवाया।।
कहा राव से बात बताऊं, महादेव को भोग खिलाऊं।
प्रतिदिन उत्तम भोजन आवे, उनको मुनिजन छिपाकर खावे।।
इसी तरह निज रोग भगाया, बन गई कंचन जैसी काया।
एक लड़के ने पता चलाया, फौरन राजा को बताया।।
तब राजन फरमाया मुनि जी को, नमन करो शिवपिंडी को।
राजा से तब मुनि जी बोले, नमस्कार पिंडी नही झेले।।
राजा ने जंजीर म़ंगाई, उस शिवपिंडी में बंधवाई।
मुनि ने स्वयंभू पाठ बनाया, पिंडी फटी अचंभा छाया।।
चंद्रप्रभ की मूर्ति दिखाई, सब ने जय-जयकार मनाई।
नगर फिरोजाबाद कहाये, पास नगर चंदवार बताये।।
चन्द्रसैन राजा कहलाया, उस पर दुश्मन चढ़कर आया।
राव तुम्हारी स्तुति गई, सब फौजो को मार भगाई।।
दुश्मन को मालूम हो जावे, नगर घेरने फिर आ जावे।
प्रतिमा जमना में पधराई, नगर छोड़कर परजा धाई।।
बहुत समय ही बीता है की, एक यती को सपना देखा।
बड़े जतन से प्रतिमा पाई, मंदिर में लाकर पधराई।।
वैष्णवों ने चाल चलाई, प्रतिमा लक्ष्मण की बताई।
अब तो जैनी जन घबरावे, चंद्र प्रभु की मूर्ति बतावें।।
चिन्ह चंद्रमा का बताया, तब स्वामी तुमको था पाया।
सोनागिरि में सौ मंदिर है, एक बढ़कर एक सुंदर हैं।।
समवशरण था यहां पर आया, चंद्र प्रभू उपदेश सुनाया।
चंद्र प्रभू का मन्दिर भारी, जिसको पूजे सब नर और नारी।।
सात हाथ की मूर्ति बतलाई, लाल रंग प्रतिमा बताई।
मंदिर और बहुत बताये, शोभा वरणत पार न पाए।।
पार करो मेरी यह नैय्या, तुम बिन कोई नहीं खिवैया।
प्रभू मैं तुमसे कुछ नहिं चाहूं, भव-भव में दर्शन पाऊं।।
मैं हूं स्वामी दास तुम्हारा, करो नाथ अब तो निस्तारा।
स्वामी आप दया दिखाओ, चंद्रदास को चंद्र बनाओ।।
॥ दोहा ॥
नित चालीसहिं बार,पाठ करे चालीस दिन।
खेय सुगन्ध अपार,सोनागिर में आय के।।
होए कुबेर समान,जन्म दरिद्री होए जो।
जिसके नहीं सन्तान, नाम वंश जग में चले।।
-------समाप्त-------