राजस्थान के जोधपुर से आई यह कहानी सिर्फ एक लड़की की नहीं, बल्कि उन हजारों बेटियों की आवाज है, जिनका बचपन कुछ अजीब तरह की परंपराओं की भेंट चढ़ जाता है. 12 साल की उम्र में जब ज्यादातर बच्चे स्कूल, खेल और सपनों की दुनिया में होते हैं, उसी उम्र में खुशबू (बदला हुआ नाम) की शादी कर दी गई थी. उसे तब यह भी ठीक से समझ नहीं था कि उसके साथ क्या हो रहा है.
एजेंसी के अनुसार, साल 2016 में खुशबू की शादी एक पारंपरिक रस्म के तहत कर दी गई. परिवार और समाज के दबाव में लिए गए इस फैसले में उसकी कोई राय नहीं थी. उस वक्त वह स्कूल में पढ़ती थी और एक सामान्य बचपन जी रही थी. लेकिन शादी के बाद उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई.
समय के साथ जब खुशबू बड़ी हुई, तो उसे एहसास होने लगा कि वह एक ऐसे रिश्ते में बंध चुकी है, जिसे उसने न समझा था और न ही चुना था. यह एहसास उसके लिए अंदर से तोड़ने वाला था.
कुछ साल बाद ससुराल की ओर से उस पर वैवाहिक जीवन शुरू करने का दबाव बढ़ने लगा. यही वो वक्त था, जब खुशबू ने तय किया कि वह अब चुप नहीं रहेगी. डर और समाज की बंदिशों के बावजूद उसने अपने हक के लिए आवाज उठाई.
खुशबू ने पुलिस से संपर्क किया, जिसके बाद वह सामाजिक कार्यकर्ता कृति भारती और उनकी संस्था सारथी ट्रस्ट तक पहुंची. शुरुआत में परिवार झिझक रहा था, लेकिन खुशबू के मजबूत इरादे और उसकी बड़ी बहन के सपोर्ट ने हालात बदल दिए.
कोर्ट में 18 महीने तक चली लड़ाई
करीब डेढ़ साल पहले खुशबू ने फैमिली कोर्ट में अपनी शादी को रद्द करने की याचिका दाखिल की. सुनवाई के दौरान उसने अपने दस्तावेज पेश किए, जिससे यह साबित हुआ कि शादी के वक्त वह नाबालिग थी. दूसरी तरफ, ससुराल पक्ष ने दावा किया कि शादी बालिग होने के बाद हुई थी, लेकिन कोर्ट में उनकी दलील टिक नहीं सकी.
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आखिरकार, जोधपुर फैमिली कोर्ट के जज वरुण तलवार ने इस मामले में अहम फैसला सुनाया. कोर्ट ने बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के तहत इस शादी को अमान्य घोषित कर दिया.
कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि बाल विवाह बच्चों के वर्तमान और भविष्य दोनों को नुकसान पहुंचाता है और इसे खत्म करने के लिए समाज को मिलकर कदम उठाने होंगे.
परंपरा बनाम कानून
इस मामले ने एक बार फिर उन कुरीतियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जो आज भी कई समाजों में जिंदा हैं. कृति भारती के मुताबिक, खुशबू की शादी 'मौसर' नाम की एक रस्म के दौरान हुई थी, जिसमें परिवार में किसी की मृत्यु के बाद सामूहिक रूप से बच्चों की शादी कर दी जाती है.
ऐसी परंपराओं में अक्सर कानून की अनदेखी की जाती है और परिवार सामाजिक बहिष्कार के डर से विरोध नहीं कर पाते.
आज खुशबू ने अपनी जिंदगी को एक नई दिशा दी है. उसने पढ़ाई फिर से शुरू कर दी है और अब ओपन स्कूलिंग के जरिए अपनी सेकेंडरी परीक्षा की तैयारी कर रही है. उसका सपना है कि वह आत्मनिर्भर बने और अपने पैरों पर खड़ी हो.
खुशबू कहती है कि उसकी बड़ी बहन की भी यही इच्छा है कि वह अपनी पढ़ाई पूरी करे और एक बेहतर जिंदगी जिए.
एक मिसाल बनी खुशबू
खुशबू की यह लड़ाई सिर्फ उसकी अपनी नहीं थी, बल्कि यह उन सभी लड़कियों के लिए उम्मीद की किरण है, जो बाल विवाह जैसी कुरीतियों का शिकार होती हैं. उसका साहस और दृढ़ता यह दिखाती है कि अगर हिम्मत हो, तो परंपराओं की जंजीरों को तोड़ा जा सकता है.
यह कहानी समाज के लिए एक बड़ा संदेश भी है कि परंपराओं के नाम पर बच्चों का भविष्य दांव पर नहीं लगाया जा सकता. कानून और जागरूकता के जरिए ही इस कुप्रथा को खत्म किया जा सकता है.