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महिला आरक्षण के मुद्दे पर पीएम ने दिया 'क्रेडिट कार्ड', विपक्ष कैसे करेगा विरोध?

परिसीमन के जरिए लोकसभा-विधानसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने और महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का मुद्दा संसद में बिल के जरिए साथ-साथ आया. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 36 मिनट के भाषण में ऐसा दांव खेला कि मुद्दा सिर्फ महिला आरक्षण का ही बचा. उन्होंने विपक्ष के विरोध को चौतरफा घेरकर रख दिया.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण से महिला आरक्षण के मुद्दे को सामाजिक मिशन के रूप में पेश किया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण से महिला आरक्षण के मुद्दे को सामाजिक मिशन के रूप में पेश किया.

राजनीति में टाइमिंग ही सब कुछ होती है, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस कला के माहिर खिलाड़ी हैं. और बात जब वुमन वेलफेयर से जुड़ी हो, तो वे भावनात्मक भी हो जाते हैं. गुरुवार को मोदी पूरे मूड में थे. वे एक ओर समावेशी थे, तो दूसरे ओर आक्रामक भी. वे तंज कर रहे थे, तो दूसरी ओर ठिठौली भी. बेहद संतुलित होकर उन्होंने महिला आरक्षण के मुद्दे पर विपक्ष को ऐसा लपेटा कि उसके लिए बचने का चारा नहीं रहा.

संसद के विशेष सत्र में हंगामा परिसीमन बिल को लेकर हो रहा था, लेकिन 36 मिनट के अपने भाषण में पीएम मोदी ने महिला आरक्षण की जरूरत पर फोकस करके बहस की सारी दिशा मोड़ दी. उन्होंने इस मुद्दे पर विपक्ष को ऐसा घेरा कि उसके लिए पलटवार करने के लिए कुछ नहीं बचा.

राजनीति में सबसे बड़ी होती है क्रेडिट यानी श्रेय लेने की लड़ाई. प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में विपक्ष को एडवांस में क्रेडिट देकर मुद्दा ही समेट दिया. उनका ये भाषण 2023 में लाए गए 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' की याद दिला गया. उस दौरान भी पीएम मोदी ने पक्ष और विपक्ष दोनों को सामूहिक जिम्मेदारी देते हुए कानून पास करवा लिया था. वही दांव प्रधानमंत्री ने इस बार भी चला. 

प्रधानमंत्री का भाषण केवल नीतियों का पुलिंदा नहीं था, बल्कि उन राजनीतिक दलों पर सीधा प्रहार था जिन्हें मोदी दशकों तक इस बिल को 'होल्ड' पर रखने का दोषी बता रहे हैं.

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पंचायत में बैठी महिलाएं संसद की ओर देख रही हैं

प्रधानमंत्री ने बहुत ही सरल लेकिन तीखे अंदाज में एक सच्चाई बयां की. उन्होंने कहा कि विपक्ष को पंचायतों में आरक्षण देने में कोई समस्या नहीं होती. क्यों? क्योंकि वहां उनकी अपनी कुर्सी जाने का खतरा कम होता है. उन्होंने इसकी तुलना घर के कामकाज से कर दी. उन्होंने कहा कि जैसे महिलाओं को घरों में झाड़ू-पोछे तक सीमित कर दिया जाता है, वैसे ही राजनीति में उन्हें पंचायतों तक सीमित रखने की कोशिश हुई.

लेकिन मोदी ने चेतावनी दी कि अब समय बदल गया है. पिछले 20-25 वर्षों में महिलाएं 'ग्रास रूट' लेवल पर लीडर बन चुकी हैं. वे अब सिर्फ आदेश पालने वाली नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाली ताकत बनना चाहती हैं. उन्होंने साफ कहा कि अब महिलाएं चुप नहीं रहेंगी. अगर उन्हें विधानसभा और संसद में जाने से रोका गया, तो वे किसी को माफ नहीं करेंगी.

'इफ-बट' की राजनीति और पुराने पाप

प्रधानमंत्री ने विपक्ष के 'दोहरे मापदंड' पर भी चोट की. उन्होंने विपक्ष के बयानों पर तंज किया- 'वे कहते हैं हम समर्थन तो करते हैं लेकिन... हम इसके साथ हैं, लेकिन...'. ये किंतु-परंतु वाली राजनीति से महिलाओं के संसद में प्रवेश को अटकाने के लिए है. ये टेक्निकल बातों में अटकाने का वक्त नहीं है. मोदी ने इसे राजनीति के बजाय 'सांस्कृतिक कमिटमेंट' से जोड़कर एक बड़ा नैरेटिव सेट कर दिया.

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उनका यह कहना कि ’यह बिल पास करके हम पुराने पापों से मुक्ति पा सकते हैं,’ सीधे तौर पर कांग्रेस और अन्य दलों को कठघरे में खड़ा करने जैसा है. उन्होंने संदेश दिया कि जो काम 27 साल पहले हो जाना चाहिए था, उसे आज भी रोकने की कोशिश करना केवल महिलाओं का नहीं, बल्कि लोकतंत्र का अपमान है.

क्रेडिट का 'ब्लैंक चेक': एक मास्टरस्ट्रोक

अक्सर राजनीतिक लड़ाइयां 'क्रेडिट' (श्रेय) लेने के लिए होती हैं. मोदी जानते हैं कि विपक्ष को सबसे ज्यादा परेशानी इसी बात से है कि इस बिल का पूरा श्रेय भाजपा ले जाएगी. यहीं उन्होंने अपना सबसे बड़ा कार्ड खेला. उन्होंने सार्वजनिक मंच से विपक्ष को 'क्रेडिट का ब्लैंक चेक' थमा दिया.

’जिसको क्रेडिट लेना हो ले ले, मैं कल अखबारों में विज्ञापन देकर आपका धन्यवाद करूंगा.’ इस एक वाक्य ने विपक्ष के विरोध की जमीन छीन ली. ‘यदि आप विरोध करेंगे तो निश्चित ही मोदी को लाभ होगा, लेकिन आप समर्थन करेंगे तो किसी एक को फायदा नहीं होगा. सिर्फ महिलाओं को उनका हक मिलेगा’. अब अगर विपक्ष विरोध करता है, तो वह 'महिला विरोधी' कहलाएगा, और अगर समर्थन करता है, तो जीत तो अंततः मोदी की ही होगी.

परिसीमन का मुद्दा और 'मोदी की गारंटी'

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विपक्ष ने जनगणना और परिसीमन (Delimitation) को हथियार बनाकर इस बिल को लटकाने की कोशिश की, लेकिन मोदी के भाषण ने इन तकनीकी तर्कों को जनभावनाओं के नीचे दबा दिया. जब उन्होंने इसे 'मोदी की गारंटी' के रूप में पेश किया, तो जनता के बीच यह संदेश गया कि इरादे नेक हों तो रास्ते निकल आते हैं. उन्होंने कहा- ‘ये प्रक्रिया किसी के साथ अन्याय नहीं करेगी. भूतकाल में जो सरकारें रहीं, जो उस समय से अनुपात चला आ रहा है, उसमें भी बदलाव नहीं होगा. इसकी मैं गारंटी देता हूं. यदि आपको गारंटी शब्द से दिक्कत है तो वादा. और यदि कोई अच्छा तमिल शब्द हो तो वो भी कहने को तैयार हूं’. तमिल का उल्लेख प्रधानमंत्री ने अलग से इसलिए किया, क्योंकि परिसीमन का सबसे ज्यादा विरोध तमिलनाडु में ही हो रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि हमें संविधान ने देश को टुकड़ों के रूप में सोचने का अधिकार ही नहीं दिया है. कश्मीर हो या कन्याकुमारी, हम एक देश के रूप में ही इसे सोच सकते हैं. कुल मिलाकर, मोदी ने स्पष्ट कर दिया कि परिसीमन कोई मुद्दा है ही नहीं. इसकी टेक्निकल बातें करके विपक्ष सिर्फ महिला आरक्षण से मुंह चुराना चाहता है.

नई संवेदना का उभार, और नजरबट्टू

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प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं का संसद में आना सिर्फ संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में 'नई संवेदना' लाना है. उनका यह भाषण केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि इसमें एक सामाजिक बदलाव की छटपटाहट भी दिखी.

लब्बोलुआब यह है कि मोदी ने महिला आरक्षण को एक संवैधानिक व्यवस्था या चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि एक 'सामाजिक मिशन' बना दिया है. पीएम मोदी ने अपने भाषण से विपक्ष के लिए 'किंतु-परंतु' करने की गुंजाइश खत्म कर दी है. या तो वे इस लहर के साथ चलें, या फिर इतिहास के पन्नों में महिला अधिकारों के 'अवरोधक' के रूप में दर्ज होने के लिए तैयार रहें. अब बॉल विपक्ष के कोर्ट में हैं. संसद के विशेष सत्र के दो दिन बाकी हैं. पिक्चर अभी बाकी है. महिलाएं देख रही हैं.

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