नरेन्द्र मोदी के अबूझ मन को पढ़ना हमेशा से एक जोखिम भरा काम रहा है. यही कारण है कि अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि मोदी सरकार ने 2023 में बड़े धूमधाम से जो महिला आरक्षण कानून पास किया, उसे फिर से बहस में लाने के लिए इसी समय को क्यों चुना गया. क्या इसका लक्ष्य महज पश्चिम बंगाल चुनाव में फायदा लेना था? या, ईरान वॉर से उपजी आर्थिक चिंताओं से ध्यान भटकाने की कोशिश? या, फिर यह नैरेटिव पर कब्जा करने और मोदी को 'नारी शक्ति' के मसीहा के रूप में पेश करने का एक प्रयास था?
इरादा जो भी हो, इसके राजनीतिक परिणाम काफी महत्वपूर्ण रहे हैं. जो बहस महिलाओं के प्रतिनिधित्व से शुरू हुई थी, उसने जल्द ही एक कहीं अधिक विवादास्पद प्रश्न को जन्म दे दिया. वो सवाल था परिसीमन (Delimitation) को लेकर. और इसके साथ ही उत्तर-दक्षिण विभाजन का वह डर, जिसे भारत लंबे समय से दबाने की कोशिश करता रहा है.
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने चेतावनी दी है कि दक्षिणी राज्यों को नुकसान पहुंचाने वाला कोई भी कदम ’अभूतपूर्व आंदोलन’ शुरू कर सकता है. तमिलनाडु के एमके स्टालिन ने भी इसी तरह की बात कही है. क्या यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी है? या किसी गहरी चिंता का इशारा?
इसका असहज करने वाला जवाब है- दोनों.
आंकड़ों से शुरुआत करते हैं. पिछले पांच दशकों में उत्तरी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दक्षिण की तुलना में बहुत तेज रही है. तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक ने सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवार नियोजन में बहुत पहले निवेश किया था, जिससे हिंदी भाषी राज्यों की तुलना में वहां जनसंख्या बहुत पहले स्थिर हो गई थी. यदि निर्वाचन क्षेत्रों (Constituencies) को संविधान की परिकल्पना के मुताबिक पूरी तरह से जनसंख्या के आधार पर फिर से तैयार किया जाता है तो 2026 की जनगणना के बाद लोकसभा सीटों में दक्षिण की हिस्सेदारी निश्चित रूप से कम हो जाएगी.
यही है डेमोग्राफी की रियलिटी.
लेकिन परिसीमन अपने आप में गलत नहीं है. यह 'एक व्यक्ति, एक वोट' के लोकतांत्रिक सिद्धांत पर आधारित है. संसदीय सीटों की संख्या को फ्रीज करके रखना हमेशा से एक अस्थायी राजनीतिक समझौता था. स्थायी व्यवस्था नहीं. देर-सवेर, प्रतिनिधित्व के सवाल को जनसंख्या में आए बदलावों के साथ तालमेल बिठाना ही था.
असली समस्या कहीं और है- राजनीति में, और भरोसे में.
जब गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा सीटों में राज्यों के बीच 50 प्रतिशत की समान वृद्धि का प्रस्ताव रखा, तो यह एक व्यावहारिक समझौते का आधार हो सकता था. यानी सीटों को इतना बढ़ा देना कि किसी भी क्षेत्र को नुकसान न हो. लेकिन यह प्रस्ताव देर से आया और ऐसा लगा जैसे केवल प्रतिक्रिया में दिया गया हो. इतने बड़े रिफॉर्म के लिए इससे जुड़े सभी पक्षों के बीच व्यापक चर्चा के बाद 'आम सहमति' और 'विश्वसनीयता' बहुत मायने रखती है.
यहीं पर मोदी सरकार से चूक हुई और उसका टाइमिंग गलत हो गया. बेहतर होता कि सभी मुख्यमंत्रियों को बुलाया जाता. सर्वदलीय परामर्श होते. इससे भरोसा और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना पैदा हो सकती थी. इसके बजाय, सही या गलत धारणा ये बनी कि निर्णय पहले लिए जाते हैं और स्पष्टीकरण बाद में दिया जाता है. एक फेडरल सिस्टम में पावर इसी बात में है कि धारणा कैसी बन रही है. और वन-साइडेड डिसीजन की धारणा साउथ की एक गहरी चिंता को जन्म देती है. नंबर्स में ज्यादा होकर उत्तर भारत, समय के साथ, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को बदल सकता है.
फिर भी, इसे केवल 'नॉर्थ बनाम साउथ' के रूप में देखना सतही और भ्रामक होगा.
भले ही दक्षिण भारत राजनीतिक रूप से हाशिए पर जाने से डरता हो, लेकिन उसने अन्य क्षेत्रों में चुपचाप अपना प्रभाव मजबूत किया है. आर्थिक रूप से, दक्षिणी राज्य भारत की प्रगति के इंजन हैं, जो जीडीपी, निर्यात और टैक्स रेवेन्यू में बहुत बड़ा योगदान देते हैं. बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहर ग्लोबल इनोवेशन नेटवर्क का हिस्सा हैं. यदि संसद जनसंख्या को दर्शाती है, तो इकोनॉमी परफॉर्मेंस को दर्शाती है. और यहां साउथ आगे है.
सोशल इंडिकेटर्स भी यही कहानी कहते हैं. साक्षरता, स्वास्थ्य सेवा और मानव विकास पर, दक्षिण भारत लगातार देश के अधिकांश हिस्सों से बेहतर प्रदर्शन करता है. अब वह एक विरोधाभास का सामना कर रहा है- अपने बेहतर प्रदर्शन के कारण राजनीतिक वजन खोने की संभावना, जहां बाकी पिछड़ गए. राजनीतिक रूप से इस तर्क को स्वीकार करना आसान नहीं है.
साथ ही, भारत की हकीकत क्षेत्रीय विभाजनों से परे है. सांस्कृतिक और सामाजिक एकीकरण जिन बातों से गहरा हो रहा है उन्हें राजनीति अक्सर नजरअंदाज कर देती है.
'चेन्नई सुपर किंग्स' के जरिए रांची के एमएस धोनी को लेकर चेन्नई की आस्था देखिए. या 'RRR' की देशव्यापी कामयाबी, जिसने भाषा की बाधाओं को तोड़कर एक साझा सांस्कृतिक पल बना दिया. इसके साथ ही पलायन- दक्षिणी टेक हब में उत्तर भारतीय का, और उत्तर की ओर जाने वाले साउथ के प्रोफेशनल्स का. ये सब मिलकर एक ऐसे भारत की तस्वीर पेश करते हैं जो अपनी राजनीति की तुलना में कहीं अधिक जुड़ा हुआ है.
लेकिन सांस्कृतिक एकजुटता राजनीतिक आश्वासन की जगह नहीं ले सकती.
बीजेपी को इस बात श्रेय दिया जाना चाहिए कि उसने दक्षिण में चुनावी और संगठनात्मक रूप से विस्तार करने का ठोस प्रयास किया है. फिर भी, दिखावे की एक सीमा होती है. प्रतीकात्मकता ही सही, फिर चाहे वह पहनावा हो या भाषण, भरोसे की कमी को दूर नहीं कर सकता. प्रधानमंत्री मोदी का पारंपरिक मुंडू पहनकर गुरुवयूर मंदिर जाना एक अच्छी फोटो हो सकती है, लेकिन गहरी आशंकाओं को दूर करने के लिए काफी नहीं है.
क्योंकि परिसीमन को लेकर बेचैनी सिर्फ सीटों के बारे में नहीं है. 'आवाज़' के खो जाने का भी डर है. कि वे राज्य जिन्होंने भारत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, इसके भविष्य को आकार देने में अपना प्रभाव बनाए रख पाएंगे?
यह प्रश्न केवल आश्वासन नहीं, बल्कि कल्पनाशीलता की मांग करता है.
क्या भारत प्रतिनिधित्व का कोई ऐसा हाइब्रिड मॉडल विकसित कर सकता है जो जनसंख्या पर आधारित तो हो ही, उसमें परफॉर्मेंस, फाइनेंशियल कंट्रीब्यूशन या ह्यूमन डेवलपमेंट को मान्यता दी जाए? हो सकता है कि ऐसे किसी भी विचार का विरोध हो. लेकिन इस सवाल से बचने का जोखिम विभाजन को गहरा कर सकता है.
अंततः, परिसीमन केवल सीमाओं को फिर से खींचने की टेक्निकल प्रैक्टिस नहीं है. यह भारत के संघीय ढांचे की परीक्षा है. यदि इसे गलत तरीके से हैंडल किया गया, तो यह क्षेत्रीय मतभेदों को राजनीतिक दरारों में बदल सकता है. यदि संवेदनाओं को समझकर इसका मैनेजमेंट किया गया, तो यह देश को अधिक समावेशी और परामर्शी बनाकर मजबूत कर सकता है.
महिला आरक्षण की बहस इसकी शुरुआत हो सकती है, लेकिन इसने कुछ गहरी बातों को उजागर किया है- जैसे इस बात की बढ़ती बेचैनी कि आने वाले वर्षों में पावर डिस्ट्रीब्यूशन कैसे होगा. यह सिर्फ गणित का खेल नहीं है. यह भरोसे के बारे में है. और भारत जैसे विविधता वाले देश में, एक बार भरोसा टूट जाए, तो कोई भी फॉर्मूला सिस्टम को जोड़कर नहीं रख सकता. फिर चाहे वह गणितीय रूप से कितना भी सही क्यों न हो.
पुनश्च: रेवंत रेड्डी ने एक वैकल्पिक परिसीमन मॉडल का सुझाव दिया है. संसद के बजाय राज्य और स्थानीय स्तरों पर प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाए. उनका तर्क है कि भारत को बेहतर शासन देने के लिए अधिक विधायकों (MLAs) और पार्षदों की आवश्यकता है, न कि सांसदों की. यह एक ऐसा विचार है जिस पर बहस होनी चाहिए. क्योंकि यह उतना भड़काऊ और ध्रुवीकरण करने वाला नहीं है, जितना नॉर्थ-साउथ की विभाजन रेखा को चौड़ा करना.