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मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की बात कहां से निकली? ठाकरे बंधुओं के लिए क्या कारगर है ये मुद्दा

मुंबई को अलग करने की बात बीएमसी चुनावों में कहां से उठ गई? यह मुद्दा मराठी वोटरों को एकजुट करने की रणनीति है, लेकिन सवाल यह है कि इसका प्रभाव कितना होने वाला है?

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राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे मराठी मानुष के नाम पर आखिरी जंग लड़ रहे हैं. (Photo: PTI)
राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे मराठी मानुष के नाम पर आखिरी जंग लड़ रहे हैं. (Photo: PTI)

मुंबई भारत की आर्थिक राजधानी है. हमेशा से राजनीतिक बहसों का केंद्र रही है. पर इस बार मामला कुछ और है. मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की हवा फैला दी गई है. हालांकि किसी ने भी ऐसा नहीं कहा कि मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की कोई योजना है पर मुंबई में अब यह मुद्दा बन चुका है. पूरे मुंबई में कौवा कान लेकर उड़ रहा है. दरअसल 15 मार्च को मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनावों के संदर्भ में यह विषय अब मुद्दा बन चुका है.

जाहिर है कि मराठी मानुष की बात करने वाले को चुनावों में इस मुद्दे से लाभ मिल सकता हैं. इसी सिलसिले में तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष अन्नामलाई के एक बयान को ठाकरे बंधुओं ने पकड़ लिया. जाहिर है कि मुद्दा और गरम हो गया है. यहां तक कि महायुति के सहयोगी एकनाथ शिंदे को भी अन्नामलाई का मुंबई को सभी का और एक अंतरराष्ट्रीय शहर बताना रास नहीं आया. अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह मुद्दा कहां से उठा और कैसे सबसे प्रमुख मुद्दा बन गया?

शिवसेना (यूबीटी ) कर रही अपने पुनर्जन्म की कोशिश

राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे दोनों ही भाई अपने राजनीतिक दुर्दिन के दिनों से जूझ रहे हैं. फिलहाल अपनी राजनीतिक पहचान बचाने के लिए ही ही दोनों भाई सारे गिले शिकवे भूलाकर एक हो गए है. दोनों ही मिलकर एक मंच से 1960 के 'संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन' की दुहाई दे रहे हैं. पहली नजर में यह केवल एक ऐतिहासिक जिक्र लग सकता है, लेकिन अगर गहराई से देखें तो यह शिवसेना के उस 'मूल विचार' की ओर वापसी है, जिसने 66 साल पहले मुंबई की सड़कों पर संघर्ष की इबारत लिखी थी.

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1960 उस दौर में जब मोरारजी देसाई का दौर था, यह हवा उड़ी कि मुंबई को महाराष्ट्र से अलग कर दिया जाएगा. आज, राज और उद्धव इसी डर को नए स्वरूप में पेश कर रहे हैं. ठाकरे बंधुओं का कहना है मुंबई को भौगोलिक रूप से अलग करना तो नामुमकिन है पर मुंबई में कुछ ऐसा किया जा रहा है कि यहां मराठियों का प्रभुत्व खत्म हो जाए. इसी नैरेटिव के साथ वे मराठी मानुष को यह संदेश दे रहे हैं कि 1960 की तरह ही आज भी 'अस्तित्व की लड़ाई' शुरू हो चुकी है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि वर्तमान पर इतिहास की छाया होती है. 1960 के आंदोलन के परिणाम स्वरूप ही बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना का उदय हुआ था, ठीक वैसे ही 2026 में राज और उद्धव की 'एकजुटता' को एक नई शुरुआत के तौर पर पेश किया जा रहा है. शिवसेना शुरू से ही  मुंबई पर बाहरियों के खतरे से बचाने के नाम पर राजनीति करती रही है. यही कारण है कि उनका शिकार आम तौर पर गरीब तबके हिंदी भाषी या तमिल भाषी ही रहे हैं.

ठाकरे बंधुओं का तर्क1960 के दौरान महाराष्ट्र और गुजरात एक ही राज्य थे. मोरारजी देसाई एक शक्तिशाली गुजराती चेहरा थे, जो मुंबई के भविष्य का फैसला कर रहे थे. आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में फिर से एक शक्तिशाली गुजराती नेतृत्व केंद्र में है. राज और उद्धव को लगता है कि मोदी के बहाने मराठियों को एक बार फिर एकजुट किया जाए. सबसे पहले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के नेता राज ठाकरे ने कहा है कि एक बार फिर मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की साजिश रची जा रही है. मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने का बीजेपी का पुराना सपना रहा है. उन्होंने दावा करते हुए कहा कि ठाकरे परिवार उसके इस सपने को कभी पूरा नहीं होने देगा. बाद में ठाकरे बंधुओं ने सामना की एक रिपोर्ट में भी इस प्रकार की बातें की. 

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बाद में तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष अन्नामलाई की बातों को टार्गेट किया जाने लगा. अन्ना को मुंबई आने पर उनका पैर काटने की धमकी दी गई. अन्नामलाई के बयान कि मुंबई सबकी है और एक अंतरराष्ट्रीय शहर है को लेकर भी ठाकरे बंधुओं ने नाराजगी जताई. दूसरी तरफ उत्तर भारतियों पर मराठी न बोलने के नाम पर हमले पिछले कई महीनों से जारी हैं. राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि मुंबई से बड़े प्रोजेक्ट्स और बिजनेस हेडक्वार्टर गुजरात में जा रहे हैं. मुंबईकरों को यह समझाने की कोशिश हो रही है कि आर्थिक रूप से कमजोर करने की साजिश है, ठीक वैसे ही जैसे 1960 में राजनीतिक रूप से अलग करने की कोशिश हुई थी. 

मुंबई में मराठी वोट

सवाल उठता है कि क्या ठाकरे बंधु मु्ंबई को अलग करने की साजिश को मुद्दा बनाकर मराठी वोटर बेस में सेंध लगा सकेंगे. दिक्कत यह है कि मुंबई के मराठियों के एक और नेता एकनाथ शिंदे महायुति के साथ हैं. शायद यही कारण है कि अन्नामलाई के बयान से एकनाथ शिंदे ने अपनी नाराजगी जताई है ताकि मराठियों को साथ वो खुद को खड़ा दिखा सकें.

दूसरे मुंबई में मराठियों के डेमोग्रेफी भी बदल चुकी है. 1960 के दशक में मुंबई मराठी आबादी लगभग 46% थी, जो आज सिमटकर 35 से 40% के बीच रह गई है. लेकिन इसके बावजूद भी मुंबई की 131 सीटों पर आज भी मराठी वोटर्स का ही बोलबाला है. ठाकरे बंधुओं का भरोसा इन्हीं सीटों पर है.पर क्या आज का मराठी ठाकरे बंधुओं की बातों पर भरोसा करेगा?

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इतिहास में मुंबई को अलग करने की मांग

मुंबई को अलग करने की बात कोई नई नहीं है; इसकी जड़ें भारत की आजादी के बाद के राज्य पुनर्गठन में हैं. 1947 में आजादी के बाद, बॉम्बे प्रांत जिसमें वर्तमान महाराष्ट्र, गुजरात और कुछ अन्य क्षेत्र शामिल थे. यह एक बहुभाषी राज्य था. 1950 के दशक में, भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग जोर पकड़ने लगी. संयुक्त महाराष्ट्र समिति नामक संगठन ने मराठी-भाषी राज्य की मांग की, जिसमें मुंबई को शामिल करने पर जोर दिया. इस संगठन ने हिंसक आंदोलनों के माध्यम से इस मांग को आगे बढ़ाया, क्योंकि मुंबई तब आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण थी और इसमें मराठी, गुजराती, हिंदी और अन्य भाषाओं के लोग रहते थे.

1955 में, कांग्रेस पार्टी ने मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने का प्रयास किया. केंद्र सरकार ने तीन-राज्यों का प्रस्ताव रखा . महाराष्ट्र और गुजरात अलग-अलग राज्य, जबकि मुंबई को यूनियन टेरिटरी बनाने की तैयारी थी. इस प्रस्ताव के विरोध में मुंबई के मराठी लोगों ने कांग्रेस के खिलाफ वोट दिया, यहां तक कि कम्युनिस्ट पार्टी को समर्थन दिया.

 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग ने सिफारिश की कि बॉम्बे राज्य को भाषाई आधार पर विभाजित किया जाए, लेकिन मुंबई का मुद्दा विवादास्पद रहा. अंततः, 1960 में बॉम्बे पुनर्गठन अधिनियम के तहत गुजरात और महाराष्ट्र अलग राज्य बने, और मुंबई को महाराष्ट्र की राजधानी बनाया गया. 

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 इस दौरान, 105 से अधिक लोग आंदोलनों में मारे गए, और यह घटना 'संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन' के नाम से जानी जाती है. 21 नवंबर 1955 को मुंबई के हुतात्मा चौक, जिसे उस समय फ्लोरा फाउंटेन कहा जाता था, वहां हजारों लोग संयुक्त महाराष्ट्र की मांग को लेकर शांतिपूर्ण मार्च कर रहे थे. लेकिन हालात बिगड़ गए और पुलिस ने आंसू गैस और गोलीबारी की. इस घटना में 15 लोगों की जान चली गई. इसी तरह अहमदाबाद में 8 अगस्त 1956 को महागुजरात आंदोलन के तहत कॉलेज छात्रों ने प्रदर्शन किया. यहां भी पुलिस फायरिंग में 5 से 8 छात्रों की मौत हो गई.

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