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रेवंत रेड्डी का 'मिशन दिल्ली', चुनौती या खुद के लिए राजनीतिक जोखिम!

तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का साल 2034 तक 'मिशन दिल्ली' का खुला ऐलान भारतीय राजनीति में एक बेहद साहसिक और बड़ा दांव माना जा रहा है. अपनी इस दूरगामी महत्वाकांक्षा को सार्वजनिक कर उन्होंने न सिर्फ विपक्ष को बैकफुट पर धकेला है, बल्कि कांग्रेस आलाकमान को भी अपनी ताकत का सीधा एहसास कराया है.

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: रेवंत रेड्डी के बड़े दांव में छिपा है चुनौती और जोखिम का खेल (Photo-ITG)
: रेवंत रेड्डी के बड़े दांव में छिपा है चुनौती और जोखिम का खेल (Photo-ITG)

रेवंत रेड्डी ने अक्सर पत्रकारों के साथ निजी बातचीत में अपनी 2034 की योजना का जिक्र किया है, लेकिन अब से आठ साल बाद राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखने की अपनी इस योजना को सार्वजनिक करने का उनका फैसला, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के बारे में बहुत कुछ बयां करता है, इसे आप चाहे अति-आत्मविश्वास कहें या उद्देश्य की स्पष्टता, 56 वर्षीय रेड्डी ने एक बड़ा राजनीतिक दांव खेलते हुए साफ संकेत दे दिए हैं,

ज्यादातर राजनेता इस तरह खुलकर अपनी बात रखने से कतराते हैं. लेकिन रेड्डी अलग हैं. उन्होंने न केवल यह संकेत दिया कि "दिल्ली अब दूर नहीं" बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि वह 2034 तक तेलंगाना की राजनीति की कमान संभाले रखेंगे. तेलंगाना कांग्रेस में मुख्यमंत्री की कुर्सी के कई दावेदारों की मौजूदगी को देखते हुए, खुद के लिए सीएम के रूप में दो कार्यकालों की समय-सीमा तय करना एक बेहद साहसिक कदम है. इसके साथ ही, वह विपक्षी पार्टी बीआरएस (BRS) की तेलंगाना में वापसी की किसी भी उम्मीद पर पानी फेरने की कोशिश भी कर रहे हैं.

उनके 'मिशन दिल्ली' का यह खुलासा एक सोची-समझी रणनीतिक चाल है, यह घोषणा करके कि 2034 तक उन्हें कोई हिला नहीं पाएगा, रेड्डी पूरी तरह से स्थिरता का प्रदर्शन कर रहे हैं. यह एक जोखिम भी है और एक चुनौती भी, क्योंकि कांग्रेस की व्यवस्था के भीतर किसी भी क्षेत्रीय क्षत्रप के लिए सबसे बड़ा खतरा आंतरिक गुटबाजी और आलाकमान तक प्रतिद्वंद्वियों द्वारा पहुंचाई जाने वाली शिकायतें होती हैं.

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रेड्डी का क्या संदेश

रेड्डी असल में अपनी नौकरशाही, तेलंगाना के निवेशकों और स्थानीय राजनेताओं को यह संदेश दे रहे हैं कि वह लंबे समय तक टिकने का मन बना चुके हैं. अन्य चीजों के अलावा, यह संकेत देता है कि हैदराबाद के दक्षिण में बनने वाला 'फ्यूचर सिटी' प्रोजेक्ट जो रेवंत रेड्डी का ड्रीम प्रोजेक्ट है, महज एक हवाई किला बनकर नहीं रहेगा. उनका यह दावा या तो हर किसी को उनके सामने झुकने पर मजबूर कर देगा, या फिर अंदर ही अंदर किसी 'ब्रूटस' को सिर उठाने की योजना बनाने पर उकसाएगा. 

दिलचस्प बात यह है कि उनकी यह टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं, जब कांग्रेस नेतृत्व को केरल के मुख्यमंत्री का फैसला करने में 10 दिन का समय लग गया. इस बात को देखते हुए कि ताकतवर कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल जिन्हें राहुल गांधी का बेहद करीबी माना जाता है से कड़ी टक्कर मिलने के बावजूद वीडी सतीशन ने अपना दावा नहीं छोड़ा, यह इस बात की गवाही देता है कि मजबूत क्षेत्रीय नेता क्या कुछ हासिल कर सकते हैं.

इसलिए, तेलंगाना की कमान अपने हाथों में बनाए रखने का रेड्डी का यह दावा दिल्ली आलाकमान को भी एक सीधा संदेश है कि वह हाईकमान के फरमानों के रहमों-करम पर नहीं हैं. यह बेहद आत्मविश्वास से भरा दावा उन लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को दरकिनार करता है, जिनका पालन करना पार्टी पसंद करती है. भले ही वह केवल जनता को दिखाने के लिए हो, क्योंकि अंतिम फैसला तो आखिरकार गांधी परिवार के पास ही होता है. रेड्डी अनिवार्य रूप से खुद को तेलंगाना और बड़े पैमाने पर दक्षिण भारत में पार्टी की किस्मत के लिए अपरिहार्य  के रूप में पेश कर रहे हैं.

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केरल चुनाव ने रेड्डी को तेलंगाना की सीमाओं से बाहर अपनी पैठ आज़माने का मौका दिया. जब उन्होंने केरल में कांग्रेस के लिए प्रचार किया, तो उन्होंने LDF के 'केरल मॉडल' के विकल्प के तौर पर 'तेलंगाना मॉडल' को पेश किया. इस दौरान उनकी पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन से तीखी बहस हो गई, जब विजयन ने तेलंगाना की आर्थिक स्थिति में मौजूद दबाव की ओर इशारा किया. इस बहस का अंत रेड्डी द्वारा मोहनलाल की मशहूर फ़िल्म 'नरसिम्हम' के एक मशहूर डायलॉग - "नी पो मोने दिनेश" (जिसका मोटा-मोटा मतलब है - "दफ़ा हो जाओ, बच्चे") को दोहराने के साथ हुआ. इस डायलॉग के ज़रिए रेड्डी ने यह संदेश दिया कि विजयन का मुख्यमंत्री के तौर पर कार्यकाल अब समाप्त हो चुका है.

रेड्डी का क्या है प्लान?

दिल्ली पर अपनी नजरें टिकाने का रेड्डी का यह ऐलान कोई हवाई किला बनाना नहीं है. तेलंगाना के मुख्यमंत्री 2034 तक तेलंगाना को 1 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था में बदलने के वादे के साथ अपना 'सीवी' तैयार कर रहे हैं. जब भी वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिन्हें उन्होंने "बड़े भाई" कहा था, के साथ मंच पर होते हैं, तो वे अपने 'तेलंगाना मॉडल' के विजन की बात करते हैं. रेड्डी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि अगर दक्षिण के राज्यों में चुनाव जीतना है, तो सुशासन ही एकमात्र मंत्र है. इसलिए, वे राज्य के विकास के रोडमैप पर ध्यान केंद्रित करते हुए अपनी 'तेलंगाना फर्स्ट' की छवि को और मजबूत कर रहे हैं.

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रेड्डी से पहले, उनके पूर्ववर्ती के. चंद्रशेखर राव ने भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने की इच्छा रखी थी. इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए उन्होंने अपनी पार्टी का नाम तेलंगाना राष्ट्र समिति से बदलकर भारत राष्ट्र समिति कर दिया था, लेकिन 2023 में KCR की हार का मतलब था कि यह योजना समय से पहले ही खत्म हो गई.

रेड्डी एक अलग नाव में सवार हैं, क्योंकि वे पहले से ही एक राष्ट्रीय पार्टी के सदस्य हैं, इसके अलावा, वे खुद को एक चुनौती के रूप में पेश नहीं कर रहे हैं. वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि उनका अंतिम लक्ष्य राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना है. इस तरह शीर्ष नेतृत्व के प्रति अपनी वफादारी को असंदिग्ध बनाकर, रेड्डी खुद को भविष्य के नंबर दो के रूप में स्थापित कर रहे हैं.

यह रणनीति यह सुनिश्चित करेगी कि आलाकमान उन्हें वाई.एस. जगनमोहन रेड्डी या हिमंत बिस्वा सरमा की तरह एक अत्यधिक महत्वाकांक्षी क्षत्रप के रूप में न देखे, जो आगे चलकर पार्टी तोड़ सकते हैं. रेड्डी काफी समय पहले से ही नई दिल्ली के लिए एक पुल तैयार कर रहे हैं, और साथ ही यह भी संदेश दे रहे हैं कि वे इस पुल को तभी पार करेंगे जब इसका सही समय आएगा. हालांकि, इसमें जोखिम यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर नंबर दो की रेस में शामिल अन्य संभावित नेता उनकी इस बढ़ती महत्वाकांक्षा से सतर्क और चौकन्ने हो सकते हैं.

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तेलंगाना में सत्ता की कुर्सी के लिए होड़ में शामिल अन्य दावेदार इस दावे पर कैसी प्रतिक्रिया देंगे? उन्हें तो यह ऐसा लगेगा, मानो उनके लिए एक दशक तक दरवाज़ा ही बंद कर दिया गया हो, इससे यह आभास भी मिलता है कि यह किसी की निजी जागीर जैसा है, मानो कोई भी चुनावी झटका रेड्डी के आलोचकों और राजनीतिक विरोधियों के लिए उन्हें सत्ता से हटाने का हथियार बन ही न सकता हो.

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रेड्डी ने ये टिप्पणियां पूरी तरह से यह जानते हुए की हैं कि गैर-कांग्रेसी नेताओं के साथ उनकी दोस्ती पहले से ही जांच के दायरे में है. उनके युवा दिनों में एबीवीपी (ABVP) में रहने के उनके कार्यकाल का इस्तेमाल हमेशा उन्हें निशाना बनाने के लिए किया जाता रहा है, और खुद रेड्डी भी चंद्रबाबू नायडू के साथ अपने सौहार्दपूर्ण संबंधों को नहीं छिपाते हैं. नरेंद्र मोदी के साथ भी उनका काम करने का एक अच्छा तालमेल  है और जब राजनीति 'संभावनाओं की कला' है, तो विभिन्न दलों के साथ ऐसे संबंध एक बड़ी संपत्ति साबित होते हैं.

कई पक्के कांग्रेसी नेताओं की तुलना में कांग्रेस में नए होने और टीआरएस (TRS) से टीडीपी (TDP) और फिर कांग्रेस में पार्टियां बदलने के कारण, रेड्डी को हमेशा राजनीतिक और वैचारिक रूप से लचीला माना जाएगा. खासकर तब, जब मोदी ने इसी महीने एक सार्वजनिक मंच से रेड्डी को "मेरे साथ हाथ मिलाने" का एक परोक्ष निमंत्रण दिया, जिसके अलग-अलग अर्थ निकाले जा सकते हैं. इस टिप्पणी से होने वाले राजनीतिक नुकसान को भांपते हुए, रेड्डी ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा कि यह प्रधानमंत्री की ओर से तेलंगाना की मदद करने के मुख्यमंत्री के अनुरोध का जवाब था.

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रेड्डी ने जो किया है, वह यह है कि उन्होंने तेलंगाना के लिए एक आर्थिक रूपरेखा पेश करते हुए, अपने ही गढ़ में तत्काल अधिकार हासिल कर लिया है. राजनीतिक शतरंज के इस खेल में, उन्होंने अपनी अंतिम चाल का ऐलान कर दिया है उन्हें पूरा भरोसा है कि वे बीच के दांव-पेच से सुरक्षित निकल जाएंगे.

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