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गर्व से कहो हम हिंदू हैं...

1987 में मुंबई में हुए एक विधानसभा उपचुनाव में शिवसेना ने हिंदू खतरे में हैं को मुद्दा बनाया था. ध्यान देने की बात यह है कि तब बीजेपी ने शिवसेना के खिलाफ जनता पार्टी के उम्मीदवार को समर्थन दिया था. लेकिन हिंदू या हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना ने कांग्रेस और बीजेपी समर्थित जनता पार्टी के उम्मीदवार को धूल चटाई थी.

कांग्रेस अब बदल रही है... कांग्रेस अब बदल रही है...

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने जयपुर में हुई रैली में जो कहा उसका असर महाराष्ट्र में भी देखने को मिल रहा है. राहुल ने कहा कि ये देश हिंदुओं का है, हिंदुत्ववादियों का नहीं. उनका कटाक्ष हिंदू कट्टरवादियों और खासकर बीजेपी की तरफ था. लेकिन इस बीच शिवसेना ने राहुल गाधी के बयान पर ताली बजाना शुरू कर दिया है. साथ ही उपदेश के कुछ घूंट भी पिला दिए हैं. शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादकीय का रुख देर आए दुरुस्त आ था.

शिवसेना ने क्या कहा?

शिवसेना ने राहुल को बधाई देते हुए कहा कि आखिरकार उन्हें ये बात समझ में आई जो शिवसेना सालों से कह रही थी कि देश हिंदुओं का है और बिना हिंदुओं को साथ लिए भारत में राजनीति नहीं हो सकती. शिवसेना ने यह भी तंज कसा कि कांग्रेस बेवजह ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर सालों से मुस्लिम और दलित तुष्टिकरण की राजनीति करती रही. जिसकी वजह से पार्टी की छवि ‘हिंदू विरोधी’ की बन गई. शिवसेना ने ये भी याद दिलाया कि कांग्रेस के पूर्वज जैसे महात्मा गांधी धार्मिक अध्यात्म की बात करते थे, लोकमान्य तिलक ने गणपति उत्सव का इस्तमाल लोगों को साथ लाने के लिए किया. लेकिन 1947 के बाद कांग्रेस ने यह रास्ता छोड़ दिया. कुल मिलाकर शिवसेना यह साबित कर रही थी कि कैसे कांग्रेस अब बदल रही है और शिवसेना की राह पकड़ रही है.

क्या कांग्रेस बदल गई है?

खास बात यह है कि कांग्रेस की छवि जो शिवसेना कह रही है और असलियत में फर्क है. आंकड़े देखें तो तमाम आरोपों के बावजूद कांग्रेस के टिकट पर जीते मुस्लिम सांसद हमेशा गिने चुने ही मिलेंगे. संसद का इतिहास देखें तो 2014 में देश में सबसे कम यानी 22 मुस्लिम सांसद जीत कर आए थे. सबसे ज्यादा मुस्लिम सांसद स्वतंत्र भारत के इतिहास में 1980 में जीते थे और वो भी सिर्फ 49. यानी कांग्रेस के सर्वोत्तम कार्यकाल में भी जब पार्टी का देश की राजनीति पर एकतरफा दबदबा था तब भी देश में मुस्लिम सांसदों की संख्या लोकसभा में 50 के ऊपर नहीं जा पाई थी.

 

इतिहास गवाह है कि 1980 में जब सबसे ज्यादा मुस्लिम सांसद चुने गए थे तब महाराष्ट्र में कांग्रेस और शिवसेना का अंदरुनी समझौता था. कांग्रेस के उम्मीदवारों को शिवसेना का समर्थन हासिल था. भारत में हमेशा बहुसंख्यकों की ही राजनीति चली है. कम से कम आंकड़े तो यही दिखाते हैं. लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस की छवि हिंदू विरोधी अगर बनी तो वो शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में दखलअंदाजी करने के राजीव गांधी सरकार के फैसले से बनी. यही कारण रहा जिससे हिंदू और मुस्लिम दोनों तरफ कट्टरवादी राजनीति करने वालों को बल मिला. कांग्रेस ने आजतक नहीं माना है कि ये गलत हुआ. यही वक्त था जब महाराष्ट्र में शिवसेना मराठीवाद से हिंदुत्ववाद का सफर तय कर रही थी.

शिवसेना की मजबूरी

महाराष्ट्र में परिस्थिति कुछ ऐसी बनी कि सालों कांग्रेस विरोधी राजनीति करने के बाद शिवसेना को कांग्रेस के साथ सरकार चलानी पड़ रही है. कांग्रेस की भी दूसरी तरफ यही मजबूरी है. 1980 तक क्षेत्रीयता के आधार पर बनाया गया शिवसेना का कैडर 1987 के बाद गर्व से कहो हम हिंदू हैं के नारे देने लगा. 1987 में मुंबई में हुए एक विधानसभा उपचुनाव में शिवसेना ने हिंदू खतरे में हैं को मुद्दा बनाया था. ध्यान देने की बात यह है कि तब बीजेपी ने शिवसेना के खिलाफ जनता पार्टी के उम्मीदवार को समर्थन दिया था. लेकिन हिंदू या हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना ने कांग्रेस और बीजेपी समर्थित जनता पार्टी के उम्मीदवार को धूल चटाई थी.

इस उपचुनाव के नतीजे शिवसेना के लिए ऐतिहासिक थे. मेरी याद में यह अकेला ऐसा चुनाव होगा जिसमें कांग्रेस के उम्मीदवार ने नतीजों के बाद चुनाव रद्द करने की जो याचिका की थी वो अदालत ने मंजूर की थी और शिवसेना के जीते विधायक को अपना पद इसलिये खोना पड़ा था क्योंकि उसने धर्म के नाम पर चुनाव प्रचार किया था. बहरहाल, शिवसेना को अपना रास्ता मिल गया था. और जब 2019 में कांग्रेस के साथ सरकार बनाने की बारी आई तो सबसे बड़ी हिचकिचाहट इसी बात को लेकर रही कि अब अपने कैडर को कैसे समझाएं कि पार्टी ‘हिंदू विरोधी’ कांग्रेस के साथ क्यों जा रही है.
 



हालांकि राजनीतिक मजबूरियां नेताओं को तुरंत मना लेती हैं लेकिन कार्यकर्ता को इस मजबूरी के लिए अपनी सालों की धारणा को बदलना मुश्किल होता है. ऐसे में राहुल गांधी के बयान के बाद शिवसेना को ये मौका मिल गया. पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को समझा रही है कि देखिए आखिरकार कांग्रेस को भी हिंदू राजनीति समझ में आने लगी है और वह भी उनकी ही तरह हिंदुओं की अहमियत समझती है. हालांकि होशियारी से राहुल गांधी के हिंदुत्ववादियों पर कटाक्ष को शिवसेना ने नजरअंदाज कर दिया है.

कांग्रेस का रियलिटी चेक

कांग्रेस को भी समझ में आया है कि मुंबई जैसे शहर में जहां शिवसेना के दबदबे के बावजूद कांग्रेस का अपना एक बेस था वो अब सिर्फ मुस्लिम बहुल पॉकेट्स में सीमित हो गया है. मुंबई से कांग्रेस के जीते सारे विधायक मुस्लिम बहुल इलाके से जीते हैं. असल तौर पर शाहबानो मामले और राम मंदिर आंदोलन के बाद कांग्रेस की छवि बहुसंख्यक विरोधी बनती गई. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में यह भावना चरम पर पहुंची. इसलिये अब हिंदू और हिंदुत्व का फर्क बताना राहुल गांधी की भी मजबूरी है.

कभी-कभी कांग्रेस भूल जाती है कि तर्कवादी होने के बावजूद जवाहरलाल नेहरू के देश की जनता ‘पंडित’ नेहरू के नाम से जानती है और नेहरू ने भी इससे कभी परहेज नहीं किया. ऐसे में हिंदुत्ववादी शिवसेना का गर्व से कहो हम हिंदू हैं ये बीजेपी के गर्व से कहो हम हिंदू हैं से अलग मानकर हिंदू और हिंदुत्ववादियों का फर्क बताकर शिवसेना और कांग्रेस को आगे की राजनीति कम से कम महाराष्ट्र में करनी पड़ेगी.

 

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