बिहार की राजनीति का जब भी इतिहास लिखा जाएगा, उसमें नीतीश कुमार का नाम किसी एक अध्याय तक सीमित नहीं रहेगा. वे पूरी किताब की जिल्द की तरह हैं, जो पिछले दो दशकों से बिहार के बिखरे हुए पन्नों को समेटे हुए हैं. 'सुशासन बाबू' से लेकर 'चाणक्य' और ‘पलटूराम’ तक की उपमाएं उनके व्यक्तित्व के अलग-अलग रंग से जुड़ती हैं. अब जब वे मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जा रहे हैं, तो यह केवल एक नेता का नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति के एक बड़े ध्रुव का ट्रांसफर है.
नीतीश कुमार की राजनीति की जड़ें 1974 के जेपी आंदोलन की तपती जमीन में हैं. राम मनोहर लोहिया और कर्पूरी ठाकुर के सिद्धांतों को उन्होंने न केवल पढ़ा, बल्कि जिया भी. शुरुआती दिनों में उनके भीतर सत्ता की लालसा से अधिक सामाजिक न्याय की छटपटाहट थी. इमरजेंसी के बाद 1977 में उन्होंने दलगत राजनीति की शुरुआत जनता पार्टी से की. लालू और नीतीश समाजवाद की एक ही कक्षा के छात्र थे. जिसमें लालू की छवि एक क्राउड पुलर की थी, तो नीतीश गहराई में जाकर संपर्क बनाने में माहिर थे. 80 के दशक में लालू के उभार में नीतीश ने भी हाथ लगाया. लेकिन, 90 के दशक में जब बिहार लालू के राज में जातिवाद और अराजकता के दौर से गुजर रहा था, नीतीश ने एक अलग राह चुनी. उन्होंने समझा कि समाजवाद का असली अर्थ केवल पिछड़ों को आवाज देना नहीं, बल्कि उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ना भी है. यहीं से उनकी राजनीति 'न्याय के साथ विकास' के ढांचे में ढली. 1996 में वे बीजेपी के सहयोगी हो गए. यहीं से भारतीय राजनीति के दोनों खेमा में नीतीश की चहलकदमी का दौर शुरू होता है. अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार के जिम्मेदार मंत्री के रूप में उनकी गुडविल ऐसी बनी, कि बिहार में वे सहज विकल्प बन गए.
सुशासन: खंडहरों पर खड़ी की गई उम्मीद
2005 में जब नीतीश ने बिहार की कमान संभाली, तो चुनौतियां पहाड़ जैसी थीं. सड़कों का नामोनिशान नहीं था और अपराधी समानांतर सरकार चला रहे थे. नीतीश ने सबसे पहले 'इकबाल' यानी शासन की धमक बहाल की. उन्होंने पुलिस और प्रशासन को स्वतंत्र किया और 'स्पीडी ट्रायल' के जरिए अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजा. बिहार में 'सुशासन' केवल एक नारा नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में महसूस होने वाला बदलाव बना. सड़कों का जाल बिछाना और स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती करना उनकी प्राथमिकता रही.

प्रो-वुमन पॉलिटिक्स: एक खामोश इंकलाब
नीतीश कुमार की राजनीति का सबसे सशक्त और जादुई पहलू उनका 'साइलेंट वोटर' बेस है- बिहार की महिलाएं. नीतीश ने समय रहते भांप लिया था कि आधी आबादी को साथ लिए बिना सत्ता पर पकड़ मजबूत नहीं की जा सकती. सिर्फ जाति के बल पर तो कतई नहीं.
साइकिल योजना: स्कूल जाने वाली लड़कियों को साइकिल देना एक मास्टरस्ट्रोक था. इसने न केवल शिक्षा का स्तर सुधारा, बल्कि लड़कियों के आत्मविश्वास में भी पंख लगा दिए.
पंचायती राज में आरक्षण: 50 प्रतिशत आरक्षण देकर उन्होंने गांव की सत्ता की चाबी महिलाओं के हाथ में थमा दी.
शराबबंदी: भारी रेवेन्यू लॉस के बावजूद उन्होंने बिहार में शराबबंदी लागू की. यह एक ऐसा सामाजिक प्रयोग था, जिसने उन्हें गरीब तबके की महिलाओं का मसीहा बना दिया.
'पलटूराम' या कुशल रणनीतिकार? रिस्क लेने का हुनर
नीतीश कुमार की आलोचना का सबसे बड़ा केंद्र उनका बार-बार सियासी पाला बदलना रहा है. उनके विरोधी उन्हें 'पलटूराम' कहते हैं, लेकिन राजनीति के चश्मे से देखें तो यह उनकी अद्भुत सर्वाइवल टेक्नीक रही. नीतीश ने सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए कभी भी गठबंधन बदलने में गुरेज नहीं किया. उन्होंने भाजपा के साथ रहकर हिंदुत्व की राजनीति के बीच अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि बचाई, और राजद के साथ जाकर 'जंगलराज' के आरोपों के बीच अपना सुशासन कायम रखा.
वे राजनीतिक रिस्क लेने वाले नेता हैं. चाहे 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने पर एनडीए छोड़ना हो, या 2017 में अचानक राजद का साथ छोड़कर वापस भाजपा के साथ आना. 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले वे विपक्ष की इंडिया अलायंस मुहिम के अुगवा थे, लेकिन इससे पहले की इस अलायंस में कुछ तय हो पाता वे दोबारा एनडीए में लौट आए. हर बार उन्होंने अपनी शर्तों पर समझौता किया. वे जानते हैं कि कब झुकना है और कब झटकना है. यही कारण है कि तमाम बदलावों के बावजूद बिहार की सत्ता की धुरी हमेशा उनके इर्द-गिर्द ही घूमती रही. वे एक ऐसे खिलाड़ी हैं जो हर चाल में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखते हैं.

क्यों नीतीश कुमार एक बिरले नेता हैं?
नीतीश कुमार भारतीय राजनीति के एक 'अनूठे' चरित्र हैं. उनकी सादगी, प्रशासनिक पकड़ और भ्रष्टाचार के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' उन्हें अन्य क्षेत्रीय क्षत्रपों से अलग खड़ा करती है. उनके पास अपनी कोई बड़ी जाति का वोट बैंक नहीं है. कुर्मी समाज की आबादी सीमित है. फिर भी वे दो दशकों तक मुख्यमंत्री रहे. उनकी ताकत उनका काम, महिलाओं का भरोसा और उनकी कूटनीतिक चतुराई रही है. वे एक ऐसे समाजवादी हैं जो तकनीक और आधुनिक प्रशासन के साथ कदम मिलाकर चलते हैं.
राज्यसभा गमन: दिल्ली की नई बिसात?
नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना और मुख्यमंत्री पद त्यागना कोई साधारण रिटायरमेंट नहीं है. इसके पीछे एक गहरी रणनीतिक बिसात है, जो केंद्र और राज्य दोनों की राजनीति को प्रभावित करेगी. नीतीश कुमार वह राजनीतिज्ञ हैं जो खामोशी से तूफान लाने का हुनर जानते हैं. उनके हर कदम के पीछे एक बड़ा 'क्यों' छिपा होता है. इसीलिए सवाल पूछा जा रहा है कि बिहार जैसे राज्य का सीएम पद छोड़कर नीतीश कुमार राज्यसभा क्यों जा रहे हैं? एक तरफ कयास ये है कि राज्यसभा जाना उनकी राजनीति की 'अंतिम पारी' नहीं, बल्कि एक नई और शायद अधिक प्रभावशाली शुरुआत है.
केंद्र की मौजूदा एनडीए सरकार में जेडीयू एक अनिवार्य स्तंभ है. नीतीश के दिल्ली आने से पार्टी का कद राष्ट्रीय स्तर पर और बढ़ेगा. अब तक नीतीश पटना से अपनी पार्टी को नियंत्रित करते थे, लेकिन दिल्ली में उनकी मौजूदगी पार्टी को गठबंधन के भीतर अधिक सौदेबाजी की शक्ति देगी. वे सीधे तौर पर गठबंधन की नीतियों और भविष्य के फैसलों को प्रभावित कर सकेंगे. दूसरी ओर, ये भी कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार को जल्द ही किसी राज्य में राज्यपाल बनाकर भेजा जा सकता है. या हो सकता है कि वे अगले वर्ष राष्ट्रपति बना दिए जाएं.
अतीत में नीतीश एक विद्रोही नेता थे, वर्तमान में वे एक परिपक्व और समझू शासक. भविष्य में वे एक राष्ट्रीय मार्गदर्शक की भूमिका में दिख रहे हैं. दूसरी ओर बिहार की राजनीति अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां 'नीतीश युग' का ससम्मान अंत हो रहा है.