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क्या ‘शापित’ है कर्नाटक सीएम की कुर्सी? न कांग्रेसी चैन से बैठे और न भाजपाई

सुनने-पढ़ने में ‘शापित’ भले अंधविश्वास से भरा लगे, लेकिन कर्नाटक के नेताओं को इसका डर सताता रहा है. नतीजा ये है कि कुर्सी पर खतरा मंडराता देख नेताओं ने अपने-अपने तरीके से इस डर का ‘उपचार’ किया है.

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कर्नाटक सीएम पद के इर्द-गिर्द अलग-अलग मान्यताओं की दिलचस्प कहानी है. (फोटो- AI generated)
कर्नाटक सीएम पद के इर्द-गिर्द अलग-अलग मान्यताओं की दिलचस्प कहानी है. (फोटो- AI generated)

कर्नाटक की सियासत में ‘नाटक’ शब्द सहज ही जड़ गया है. अगर तीन-चार महीने तक मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर कोई सिरफुटव्वल सामने न आए, असहज लगने लगता है. लिहाजा, परंपरा निभाते हुए एक बार फिर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार मैदान में हैं. अखाड़ा सजा है कांग्रेस हाईकमान के दरबार में. कहा जाता रहा है कि यह कलह इसलिए है, क्योंकि तीन साल पहले कांग्रेस की सरकार बनने पर दोनों नेताओं के बीच ढाई-ढाई साल सत्ता संभालने का जो समझौता हुआ था. वो अमल में नहीं लाया गया. इसलिए पिछले छह महीने से खींचतान चल रही है. अब चर्चा यह भी है कि सिद्धारमैया और डीकेएस के झगड़े में किसी तीसरे नेता का ‘भाग्य’ खुल सकता है. और वो ‘किस्मत’ वाले मल्लिकार्जुन खड़गे भी हो सकते हैं.

चलिए, इस ‘भाग्य’ और ‘किस्मत’ को कर्नाटक सीएम की कुर्सी के मद्देनजर गहराई से समझते हैं. क्योंकि, इसी से जुड़ा है किसी का फायदा, तो किसी का नुकसान. क्योंकि, कर्नाटक के नेताओं की नजर में मुख्यमंत्री की कुर्सी ‘शापित’ लगती है. इसे अंधविश्वास कहकर खारिज किया जा सकता है, लेकिन इसके डर से कर्नाटक के बड़े-बड़े दिग्गजों के पसीने छूटते रहे हैं. सूबे का राजनीतिक इतिहास गवाह है कि जब-जब सीएम की कुर्सी पर खतरा मंडराया, तब-तब नेताओं ने जनता के बीच जाने के बजाय टोटकों और अंधविश्वासों की शरण ली. कुर्सी बचाने के लिए 'माननीय' मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों ने अपने-अपने तरीके से इस डर का 'उपचार' यानी जुगाड़ निकाला है.

विधानसभा का 'मनहूस' दक्षिणी दरवाजा

बेंगलुरु स्थित विधानसभा भवन यानी 'विधान सौदा' में मुख्यमंत्री के आधिकारिक चैंबर का एक दरवाजा सालों तक सिर्फ इसलिए बंद रहा क्योंकि वह 'दक्षिण' की तरफ खुलता था. वास्तु विशेषज्ञों ने नेताओं के कान भर दिए थे कि इस दरवाजे का इस्तेमाल करने से राजनीतिक करियर तबाह हो जाएगा.

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साल 1998 में जेएच पटेल के चुनाव हारने के बाद इस दरवाजे पर जो ताला लटका, वह सालों-साल लटका ही रहा. इसके बाद चाहे एसएम कृष्णा हों, येदियुरप्पा हों या कुमारस्वामी, सबने इस दरवाजे के आगे बड़ी सी अलमारी या पर्दा लगवा दिया ताकि गलती से भी किसी की नजर उधर न जाए. मुख्यमंत्री एक पतली सी घुमावदार गैलरी से लंबा चक्कर काटकर दफ्तर आते-जाते रहे.

जब कौआ सीएम की कार पर बैठ गया!

साल 2016 में एक बेहद मजेदार वाकया हुआ. तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की चमचमाती फॉर्च्यूनर कार के बोनट पर एक काला कौआ आकर बैठ गया. ज्योतिषियों और विरोधी नेताओं ने इसे 'शनि का प्रकोप' बताकर हल्ला मचा दिया कि अब सीएम साहब की कुर्सी खतरे में है.

हालांकि सिद्धारमैया खुद को तर्कवादी (Rationalist) कहते हैं, लेकिन इस घटना के कुछ ही दिनों बाद सरकार ने मुख्यमंत्री के लिए 35 लाख रुपये की नई कार ऑर्डर कर दी. इसके अलावा, कर्नाटक के नेताओं में 'नींबू' हाथ में रखने का बड़ा क्रेज है. जेडीएस नेता एच.डी. रेवन्ना हमेशा अपने हाथ में हरा नींबू रखते हैं ताकि बुरी नजर और राजनीतिक दुश्मनों के टोटकों से बचा जा सके.

चामराजनगर का 'जिंक्स': जहां जाने से कांपते रहे मुख्यमंत्री

कर्नाटक की राजनीति में सबसे बड़ा खौफ 'चामराजनगर का जिंक्स' माना जाता है. वैसे ही जैसे यूपी के मुख्यमंत्री नोएडा को लेकर मानते थे. सीएम की कुर्सी पर रहते हुए जो नोएडा गया, वो सत्ता से ही चला गया. उसी तरह कर्नाटक के नेताओं में यह मान्यता रही कि जो भी मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल के दौरान चामराजनगर शहर का दौरा करेगा, उसकी कुर्सी कुछ ही महीनों में छिन जाएगी.

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नेताओं के पास इस डर के पीछे पूरी एक 'क्रोनोलॉजी' है:

डी. देवराज अर्स (1980): चामराजनगर गए और छह महीने के भीतर सत्ता से हाथ धोना पड़ा.

आर. गुंडू राव (1982): इन्होंने भी वहां जाने की हिम्मत दिखाई और सरकार समय से पहले गिर गई.

वीरेंद्र पाटिल (1991): चामराजनगर के दौरे के ठीक छह महीने बाद कांग्रेस ने इन्हें पद से हटा दिया.

इसके बाद तो मुख्यमंत्रियों में ऐसा खौफ बैठा कि एस. बंगारप्पा और एम. वीरप्पा मोइली जैसे मुख्यमंत्रियों ने इस जिले की तरफ रुख तक नहीं किया. हद तो तब हो गई जब 1997 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जेएच पटेल को चामराजनगर को नया जिला घोषित करना था, लेकिन वे खुद वहां नहीं गए. बल्कि 40 किलोमीटर दूर 'मले महादेश्वरा हिल्स' पर बैठकर ही रिमोट से नए जिले का उद्घाटन कर दिया!

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इन अंधविश्वासों को सीधी चुनौती दी. उन्होंने न सिर्फ रिकॉर्ड 20 से ज्यादा बार चामराजनगर का दौरा किया, बल्कि जून 2023 में दोबारा मुख्यमंत्री बनते ही विधानभा के उस 'मनहूस' दक्षिणी दरवाजे का ताला भी तुड़वा दिया. उन्होंने बकायदा उसी दरवाजे से एंट्री की और कहा कि असली चीज साफ दिल और ताजी हवा है.

ये और बात है कि उनके प्रतिद्वंद्वी डीके शिवकुमार ज्योतिष में बहुत विश्वास रखते हैं. और बड़े राजनीतिक फैसलों में उनकी राय भी लेते हैं. उनके लिए ज्योतिष की राय सिर्फ अपने तक ही नहीं, बल्कि अपने समर्थकों के लिए भी महत्वपूर्ण होती है. किसे, कहां से टिकट देना है, इसमें वे उम्मीदवार की योग्यता के अलावा उसके नक्षत्रों की जांच भी करवाते रहे हैं. ज्योतिषी बीपी आराध्या ने खुद बताया है कि कैसे उन्होंने समय-समय पर ‘राज-योग’ वाले उम्मीदवारों को ढूंढने में डीके शिवकुमार की मदद की है. 

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ज्योतिष में डीकेएस की ऐसी आस्था पर मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी एक बार कटाक्ष किया था. नेहरू जी की जयंती पर आयोजित एक कार्यक्रम में पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा था कि ‘न नेहरू को अंधविश्वास में भरोसा था, और न डीके शिवकुमार को’. डीकेएस का नाम सुनकर पत्रकार भी हंस पड़े.

बहरहाल, कर्नाटक का यह सियासी रंग दिखाता है कि लोकतंत्र में भले ही जनता जनार्दन सबसे बड़ी हो, लेकिन कुर्सी के मोह में नेताओं के दिल के किसी कोने में 'ग्रह-नक्षत्र' और 'अंधविश्वास' का डर हमेशा बना रहता है. यही कारण है कि तमिलनाडु में पहली बार सत्ता संभालते ही विजय ने अपने ज्योतिषी को ओएसडी बना दिया था. ये और बात है कि ज्योतिषी के नक्षत्रों ने ही उनका साथ नहीं दिया, और सहयोगियों और विपक्ष के विरोध के कारण ज्योतिषी जी का अपॉइंटमेंट रद्द करना पड़ा.

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