डेढ़ साल तक अंतरिम सरकार चलाने के बाद मोहम्मद यूनुस विदा हो गए. जाते-जाते वे सियासी बिसात ऐसी बिछा गए हैं कि नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान के लिए हर चाल जोखिम भरी हो गई है. ऊपर से जीत का ताज है, भीतर से कांटों का जाल. यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं है. यह सत्ता की शर्तों का जाल है. और वह जाल यूनुस के आखिरी फैसलों में छिपा है.
यह खबरें आम रहीं कि यूनुस चुनाव नहीं कराना चाहते थे. लेकिन घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दबाव के आगे उन्हें झुकना पड़ा. फिर उन्होंने चुनाव के साथ एक ऐसे रेफरेंडम का पेंच डाल दिया, जिसका बांग्लादेश के संविधान में कोई जिक्र नहीं था. संविधान सुधार और संसदीय प्रणाली दुरुस्त करने के नाम पर चुनाव के दौरान वोटरों ने जनमत संग्रह में भी हिस्सा लिया. ये रेफरेंडम जनता की ओर से एक ब्लैंक चेक की तरह था, जिसमें उन्हें सिर्फ हां या ना में जवाब देना था.
चूंकि फैसला हां के पक्ष में आया है, तो जिम्मेदारी सरकार की है कि वह बांग्लादेश के नए निजाम को कैसी सूरत देना चाहती है. और यहीं से यूनुस के मंसूबों का दायरा शुरू होता है. अब तारिक रहमान के सामने दुविधा रहेगी कि वे संविधान सुधार की दिशा में कदम उठाएं या न उठाएं.
इसी तरह चुनाव से ठीक पहले हुई बांग्लादेश-यूएस ट्रेड डील तारिक रहमान के गले की फांस बनने वाली है. क्योंकि, इसमें बांग्लादेश के लिए सबसे अहम टेक्सटाइल सेक्टर को लेकर ऐसे प्रावधान कर दिए गए हैं, जिसका बांग्लादेशी कारोबारियों पर विपरीत असर पड़ेगा. सवाल उठ रहे हैं कि एक अंतरिम सरकार चला रहे यूनुस ने ऐसे फैसले क्यों लिए जो चुनी हुई नई सरकार को लेने चाहिए थे.
संविधान रिफॉर्म या सत्ता पर साया
रहमान के लिए सबसे बड़ी उलझन संविधान रिफॉर्म को लेकर है. यूनुस सरकार ने चुनाव से पहले रेफरेंडम कराया. दलील दी गई कि देश को नई संसदीय व्यवस्था चाहिए. प्रधानमंत्री की शक्तियां सीमित हों. संस्थानों को मजबूत किया जाए. कागज पर यह लोकतांत्रिक सुधार लगता है. पर राजनीति कागज से नहीं चलती. रेफरेंडम के मुताबिक नई सरकार को पहले 180 दिन संविधान रिफॉर्म कमीशन के रूप में काम करना होगा. यानी मंत्रिमंडल की जगह सुधार आयोग.
बीएनपी सहज नहीं है. उसके सांसदों ने संविधान रिफॉर्म कमीशन के सदस्य के रूप में शपथ तक नहीं ली. संदेश साफ है कि वे चुनाव जीत कर आए हैं, किसी कमीशन का सदस्य बनकर नहीं. बीएनपी को डर है कि यह व्यवस्था असल में चुनी हुई सरकार के ऊपर एक परत बना देगी. एक ऐसा ढांचा, जो यूनुस की सोच से जन्मा है और उन्हीं के प्रभाव में रह सकता है. राजनीति में इरादा जितना मायने रखता है, उतना ही मायने रखता है संदेह. और यहां संदेह गहरा है.

जमात और छात्र राजनीति की चाल
विपक्षी गठबंधन, खासकर जमात ए इस्लामी और छात्र संगठन नेशनल सिटिजन्स पार्टी, रिफॉर्म के एजेंडे को हाथ से नहीं जाने देंगे. वे इसे जनादेश का हिस्सा बताएंगे. कहेंगे कि जनता ने सुधार के लिए वोट दिया. प्रधानमंत्री की शक्तियों पर अंकुश जरूरी है. वरना, नया प्रधानमंत्री भी शेख हसीना जैसा निरंकुश हो सकता है.
बांग्लादेश में लंबे समय तक कार्यपालिका मजबूत रही है. प्रधानमंत्री के पास नियुक्ति, सुरक्षा तंत्र और प्रशासनिक नियंत्रण रखने की ताकत भरपूर है. रिफॉर्म का मतलब होगा इन शक्तियों का विक्रेंद्रीकरण, यानी ये शक्तियां बांटना होंगी. यदि प्रधानमंत्री की शक्तियां कम होती हैं तो पावर सेंटर बदलेगा. संसदीय समितियां मजबूत होंगी. शायद राष्ट्रपति की भूमिका बढ़े. शायद न्यायपालिका को अधिक स्वायत्तता मिले. पर हर शक्ति का संतुलन राजनीतिक सौदे से गुजरता है. जमात और छात्र दल इस मौके को दबाव की राजनीति के लिए इस्तेमाल करेंगे.
बीएनपी यदि रिफॉर्म को लेकर आनाकानी करती है तो उसे जनादेश के खिलाफ बताया जाएगा. यदि तेजी दिखाती है तो अपनी ही ताकत काटेगी. यही यूनुस की चाल मानी जा रही है. एक ऐसा ढांचा छोड़ जाना, जिसमें नई सरकार या तो अपनी शक्ति कम करे या नैतिक दबाव झेले.
यूएस ट्रेड डील की असली गांठ
दूसरी बड़ी उलझन अमेरिका के साथ हुआ व्यापार समझौता है. आलोचक कहते हैं कि बांग्लादेश-यूएस डील को चुनाव से ठीक पहले गति देना पॉलिटिकल था. 12 फरवरी को मतदान होना था. 9 फरवरी को ही यूएस ट्रेड डील की जानकारी सार्वजनिक हुई. सवाल उठता है. यदि समझौता पारदर्शी था तो उसे पहले क्यों नहीं बताया गया?
बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का इंजन टेक्सटाइल और रेडीमेड गारमेंट सेक्टर है. कुल निर्यात का लगभग 80 प्रतिशत इसी सेक्टर से आता है. लाखों मजदूर इसी पर निर्भर हैं. इनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है. अमेरिका बांग्लादेश का सबसे बड़ा निर्यात बाजार रहा है. रेडीमेड कपड़ों का बड़ा हिस्सा वहां जाता है.
अब जो संकेत बाहर आ रहे हैं, उनके मुताबिक डील में बांग्लादेशी हितों से समझौता करते हुए अमेरिका को कुछ खास छूट दी गई हैं. टैरिफ स्ट्रक्चर में बदलाव. निवेश नियमों में ढील. श्रम से जुड़ी शर्तों को लेकर सख्ती. बांग्लादेश में सबसे बड़ा विरोध डील में अमेरिका की ओर से डाले गए ‘कॉटन क्लॉज‘ को लेकर है. जिसके मुताबिक अमेरिका उसी कपड़े पर जीरो टैरिफ की छूट देगा, जिसका रॉ मटेरियल या कपास और अन्य यार्न अमेरिका से खरीदा गया होगा. माना जा रहा है कि यदि अमेरिकी कंपनियों को बांग्लादेश में खास एक्सेस मिलती है, तो स्थानीय उद्योग पर दबाव बढ़ेगा.
मान लीजिए, आयातित कच्चे माल पर शर्तें बदलती हैं. या अमेरिकी ब्रांड को सीधे उत्पादन नियंत्रण की सुविधा मिलती है. तब बांग्लादेशी मैन्युफैक्चरर मार्जिन में फंस जाएंगे. पहले ही वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कड़ी है. वियतनाम, कंबोडिया और भारत सस्ते उत्पादन के लिए आगे बढ़ रहे हैं. यूरोपीय बाजार में भी नियम सख्त हो रहे हैं. ऐसे में यदि अमेरिका के साथ समझौता स्थानीय उद्योग के लिए प्रतिकूल निकला, तो निर्यात की रफ्तार धीमी पड़ सकती है.
टेक्सटाइल सेक्टर की ग्रोथ बांग्लादेश के लिए केवल आंकड़ा नहीं है. यह सामाजिक स्थिरता का आधार है. लाखों परिवारों की आय और विदेशी मुद्रा भंडार की रीढ़. कुलमिलाकर, यही बांग्लादेश में शहरीकरण की धुरी है.

डील को लेकर रहमान तिराहे पर खड़े हैं
तारिक रहमान के सामने तीन रास्ते हैं...
पहला- डील को जस का तस स्वीकार कर लें. कहें कि अंतरिम सरकार का फैसला राष्ट्रीय हित में था. इससे अमेरिका के साथ संबंध सहज रहेंगे. पर घरेलू उद्योग नाराज होगा. बीएनपी का अपना कारोबारी आधार भी असहज होगा.
दूसरा- डील की समीक्षा का एलान करें. इसके लिए कोई कमेटी बनाएं. शर्तों पर पुनर्विचार की बात करें. यह घरेलू संदेश के लिहाज से मजबूत कदम होगा. पर अमेरिका इसे अनिश्चितता के रूप में देख सकता है. निवेशक सतर्क हो सकते हैं.
तीसरा- आंशिक संशोधन की कोशिश. यानी पूरी टकराहट नहीं, पर कुछ शर्तों पर बातचीत. यह रास्ता सबसे व्यवहारिक दिखता है. पर इसके लिए कूटनीतिक संतुलन चाहिए.
दोहरे मोर्चे पर रहमान की राजनीति
यदि रहमान संविधान के रिफॉर्म में पीछे हटते हैं, तो विपक्ष उन्हें सत्ता लालची बताएगा. यदि आगे बढ़ते हैं, तो खुद की ताकत सीमित करेंगे. यदि यूएस से हुई ट्रेड डील को चुनौती देते हैं, तो अमेरिका नाराज हो सकता है. यदि नहीं देते हैं तो उद्योगपति और मजदूर नाराज होंगे.
कुलमिलाकर, यूनुस चले गए हैं पर उनका बनाया ढांचा ढाका में ही है. तारिक रहमान के सामने असली सवाल यह नहीं है कि वे प्रधानमंत्री होने पर कितना संतोष जताएं, क्योंकि असली सवाल यह है कि वे प्रधानमंत्री की शक्ति को कितना बचा पाते हैं. यदि वे संतुलन साध लेते हैं, तो यह उनकी पॉलिटिकल मैच्योरिटी का सबूत होगा. यदि चूकते हैं, तो शुरुआती महीनों में ही उनकी सरकार घिर सकती है. बांग्लादेश की राजनीति फिर एक मोड़ पर है. इस बार दांव सिर्फ सत्ता नहीं, व्यवस्था और अर्थव्यवस्था दोनों है.