मुंबई, भारत की आर्थिक राजधानी और दुनिया का सबसे घनी आबादी वाला शहर होने के साथ सबसे अमीर शहर भी है. देश की आर्थिक राजधानी बोली जानी वाली यह सिटी देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों का निवास स्थान भी है. बॉलिवुड इस शहर को ग्लैमरस बनाता है. आर्थिक गतिविधियों के अधिकता के चलते ही यहां का नगर निगम जिसे बीएमसी के नाम से जाना जाता है देश के सबसे अमीर निकाय है. करीब 75000 करोड़ के बजट वाले इस शहर के पास पैसे की कोई कमी नहीं है, पर सिविक समस्याओं की भी यहां कोई कमी नहीं है. किसी भी दूसरे शहर के मुकाबले यहां रोजमर्रा की जरूरत वाली सुविधाओं की कमी आम मुंबईकरों को खलती हैं.
आम मुंबईकरों के साथ मुश्किल यह है कि हर चुनाव में राजनीतिक पार्टियां मराठी अस्मिता, मुफ्त सुविधाओं की बात तो करती हैं पर मूलभूत सुविधाओं में सुधार का वादा कोई नहीं कर रहा है. इस बार भी चुनाव में मुख्य मुद्दे गायब हैं. मतलब कि चाहे बीएमसी का चुनाव कोई भी जीते मुंबई की सनातन समस्याएं जस की तस बनी रहेंगी.
बाढ़/वॉटरलॉगिंग, ट्रैफिक जाम और सड़कों पर गढ्डे, कचरा प्रबंधन और सफाई, पानी की कमी, और हवा प्रदूषण. ये समस्याएं मुंबई ही नहीं पूरे देश के शहरों के लिए सनातन हैं. पर बीएमसी के पास चूंकि फंड की कमी नहीं है इसलिए शोचनीय हो जाता है. 2005 की महाबाढ़ के बाद मुंबई में करोड़ों खर्च होने के बावजूद स्थिति नहीं सुधरी. आइए 5 ऐसी समस्याओं का विस्तार से विश्लेषण करें जो कि किसी भी पार्टी या गठबंधन के जीतने के बाद भी हल नहीं वाली है, पर उम्मीद है कि इस बार जो भी बीएमसी का चुनाव जीतेगा वह
1. बाढ़ आपदा: हर मॉनसून का आतंक
मुंबई की सबसे पुरानी और जानलेवा समस्या वॉटरलॉगिंग है. 2025 में BMC ने 386 फ्लडिंग स्पॉट्स पहचाने, और हर साल औसतन 65 नए स्पॉट्स जुड़ रहे हैं. हिंदमाता, किंग्स सर्कल, अंधेरी सबवे, मालाड सबवे, और साउथ मुंबई के कई इलाके हर बार डूब जाते हैं. 2025 के मॉनसून में हिंदमाता पर करोड़ों की अंडरग्राउंड टैंक (2021 में 140 करोड़ खर्च) के बावजूद पानी जमा रहा.
पुरानी कोलोनियल-एरा ड्रेनेज सिस्टम जिसके बने हुए करीब 100 साल हो चुके हैं. आज तक नया नहीं बन सका. मिठी नदी में अनट्रीटेड सीवेज (309 MLD रोजाना) डालने से पूरी नदी जहरीला नाला बन गई है. इसके साथ ही नदी एरिया मैनग्रोव्स के विनाश, अतिक्रमण, और अवैध निर्माण से भी त्रस्त है. हर साल बारिश बढ़ती ही जा रही है. सी लेवल भी लगातार राइज हो रहा है. आशंका है कि 2050 तक साउथ मुंबई के 70-80% हिस्से के डूबने का खतरा है.
BMC हर साल डिसिल्टिंग और पंपिंग स्टेशन्स पर करोड़ खर्च करती है, लेकिन स्थाई समाधान ढूढ़ने की कोशिश नहीं हो रही है. चुनाव में पार्टियां फ्लड-फ्री मुंबई का वादा करती हैं, लेकिन रियलिटी में पॉलिटिकल विल और कोऑर्डिनेशन की कमी से ये समस्या जस की तस रहने की उम्मीद है. 2005 की बाढ़ एक हजार से अधिक मौतें होने के बाद Mithi River Development Authority बनी, लेकिन प्रोजेक्ट्स रुके पड़े हैं.
2- ट्रैफिक जाम और खराब सड़कें
मुंबई में ट्रैफिक जाम और सड़कों पर गड्डों की समस्या सनातन है. पॉटहोल्स से हर साल मौतें होती हैं . दरअसल यूटिलिटी डिगिंग (मेट्रो, पानी, बिजली) के बाद अधूरी कंक्रीटिंग इस समस्या की जड़ में है. पर इसका स्थाई समाधान अभी तक नहीं ढूंढ़ा जा सका है.
मॉनसून में ये पॉटहोल्स जानलेवा हो जाते हैं. इसके साथ ही सड़कों पर अतिक्रमण, अवैध पार्किंग, और ट्रैफिक मैनेजमेंट की कमी से लोगों का मूवमेंट दुरूह हो जाता है. अधूरे प्रोजेक्ट्स (मेट्रो, कोस्टल रोड, फ्लाईओवर) से भी जाम की स्थिति पैदा हो रही है. हर चुनाव में पॉटहोल-फ्री रोड्स का वादा होता है, पर सड़कें जस की तस ही दिखती हैं. लेकिन राजनीतिक पार्टियों का फोकस अस्मिता पर पर होता है. BMC का बजट बड़ा है, लेकिन फंड्स का इस्तेमाल गलत तरीके से होता है. कॉन्ट्रैक्टर्स को फायदा दिलाने के लिए खराब क्वालिटी का काम होता है. नई BMC कुछ सुधार कर पाएगी इसमें संदेह ही दिखता है.
3. कचरा कुप्रबंधन: मीठी नदी की गंदगी साफ न हो सकी
मुंबई रोजाना 8,000 से 9,000 मीट्रिक टन कचरा पैदा करती है. ओवरफ्लोइंग डस्टबिन, अनसेग्रिगेटेड वेस्ट और डीओनार डंपिंग ग्राउंड सैचुरेटेड, गार्बेज बर्निंग से प्रदूषण फैलता है. ब्लैक स्पॉट्स की संख्या लगातार बढ़ रही है, जहां कचरा जमा रहता है. स्लम एरिया में टॉयलेट्स की कमी , कुल टॉयलेट्स में महिलाओं के लिए सिर्फ चौथाई हिस्सा ही है. अनट्रीटेड कचरा मिठी नदी और समुद्र में जा रहा है. जिससे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है.
BMC हर साल वेस्ट मैनेजमेंट पर करोड़ खर्च करती है, लेकिन सॉलिड वेस्ट प्रोसेसिंग अधूरा है. चुनाव में फ्री वेस्ट मैनेजमेंट का वादा होता है, लेकिन कोई रेवेन्यू मॉडल नहीं सामने लाया जा सका है. लाखों डेली विजिटर्स (टूरिस्ट, कामगार) से बोझ बढ़ता है. ये समस्या इसलिए भी बड़ी हो गई है क्योंकि लैंडफिल स्पेस खत्म, रिसाइक्लिंग कम, और पॉलिटिकल विल बिल्कुल भी नहीं दिख रहा है. नई BMC भी पॉपुलिस्ट वादों में फंसेगी, लेकिन स्थायी समाधान (वेस्ट-टू-एनर्जी, सेग्रीगेशन) दूर की कौड़ी ही दिख रही है.
4. पेयजल संकट: रोजाना संघर्ष
मुंबई में रोजाना 400-500 मिलियन लीटर पानी की कमी है. पानी कट कई इलाकों में 24 घंटे तक का है. लो प्रेशर और कंटेमिनेटेड वॉटर (पाइपलाइन डैमेज से) की समस्या देश के दूसरे शहरों की तरह मुंबई का भी है. स्लम और हाई-राइज में सप्लाई अनियमित है. BMC टैरिफ नहीं बढ़ाती, लेकिन डिमांड बढ़ रही है. चुनाव में फ्री वॉटर का वादा, लेकिन सोर्स नहीं. क्लाइमेट चेंज और पॉपुलेशन ग्रोथ से समस्या बढ़ेगी.
5- वायु प्रदूषण: सांस लेना मुश्किल
मुंबई का AQI अक्सर अनहेल्दी या सीवियर श्रेणी में होता है. कंस्ट्रक्शन डस्ट (मेट्रो, रिडेवलपमेंट), ट्रैफिक, इंडस्ट्रियल यूनिट्स, गार्बेज बर्निंग और अनऑथराइज्ड फैक्ट्रीज और ग्रीन कवर कम होना इसका कारण है.मुंबई में ऐसी स्थिति नहीं है जैसे दिल्ली में है. मतलब कि दिल्ली में हवा को प्रदूषण से बचाने के लिए कई ऐसे कारक जिम्मेदार है जिसे चाहकर भी नहीं किया जा सकता है. पर मुंबई में समस्याओं को सुलझाया जा सकता है. पर अभी तक कोई गंभीर कोशिश नहीं हुई है.
BMC पॉल्यूशन कंट्रोल करती है, लेकिन एनफोर्समेंट कम है. चुनाव में पर्यावरण मुद्दा नहीं बनता है. ये समस्या इसलिए ही सनातन बन जाती है क्योंकि इंडस्ट्रियल ग्रोथ, ट्रैफिक बढ़ रहा है, और ग्रीन स्पेस घट रहे हैं.