scorecardresearch
 

कैसे एक कार्टून के दम पर बाल ठाकरे ने 60 के दशक में 'मराठी मानुस' वोट बैंक खड़ा कर दिया

उद्धव ठाकरे अब राज ठाकरे के साथ मिलकर बाल ठाकरे की खोई विरासत हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं. बीएमसी चुनाव से पहले मराठी मानुस को मुद्दा बनाने की कोशिश है, जिसमें बीजेपी को निशाना बनाने के लिए तमिल नेता के. अन्नामलाई को बहाना बनाया जा रहा है. लेकिन, यह मुद्दा वैसा जोर नहीं पकड़ रहा है जैसा बाल ठाकरे के दौर में हुआ था.

Advertisement
X
उद्धव ठाकरे अब राज ठाकरे के साथ मिलकर बाल ठाकरे की विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. (Photo: ITG/PTI)
उद्धव ठाकरे अब राज ठाकरे के साथ मिलकर बाल ठाकरे की विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. (Photo: ITG/PTI)

बीएमसी चुनाव से पहले ठाकरे बंधुओं ने मुंबई के बहाने वैसा ही नैरेटिव चलाने की कोशिश की है, 60 के दशक में जिसकी शुरुआत सीनियर ठाकरे ने की थी. बालासाहेब ठाकरे ने तब मराठी मानुस के नाम पर ही राजनीतिक आंदोलन शुरू किया था, और मराठी के मुद्दे पर ही उद्धव ठाकरे और बाल ठाकरे मिलकर बीएमसी का चुनाव लड़ रहे हैं. लेकिन, ये मुद्दा वैसी आग नहीं पकड़ रहा है, जैसी बाल ठाकरे के दौर में.

तमिलनाडु के बीजेपी नेता के. अन्नामलाई बीएमसी चुनाव कैंपेन के लिए मुंबई आए थे. मुंबई की अहमियत समझाते हुए अन्नामलाई ने सिर्फ महाराष्ट्र का एक शहर नहीं, बल्कि इंटरनेशनल सिटी बताने की कोशिश की - और ठाकरे बंधुओं को एक बड़ा मुद्दा थमा दिया. 

उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे चुनाव में लोगों को समझा रहे हैं कि बीजेपी मुंबई का नाम बदलने की कोशिश कर रही है. ये भी आरोप लगा रहे हैं कि बीजेपी मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की कोशिश कर रही है - और कैंपेन के लिए अन्नामलाई के बयान को ही आधार बनाया जा रहा है. असल में, अन्नामलाई ने मुंबई न बोलकर बॉम्बे शब्द का इस्तेमाल किया था, और इसीलिए ठाकरे बंधुओं को मौका मिल गया है. 

MNS नेता राज ठाकरे ने कहा है, 'एक रसमलाई तमिलनाडु से मुंबई आई है... तुम्हारा यहां क्या कनेक्शन है, जो आए? हटाओ लुंगी बजाओ पुंगी.' बाकी कसर उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' ने पूरी कर दी. जिसमें अन्‍नामलाई को 'नामर्द' तक कह दिया गया. इस भाषायी हल्‍केपन ने ठाकरे परिवार की दो पीढि़यों की राजनीतिक समझ के अंतर को स्‍पष्‍ट कर दिया. तेज और आक्रामक भाषा तो बाल ठाकरे की भी थी, लेकिन उसका एक लेवल था. उनके तंज पैने होते थे. आक्रोश भी मर्यादा के दायरे में रहता था.

Advertisement

उद्धव और राज के लिए कारगर है बाल ठाकरे का इतिहास

बाल ठाकरे ने फ्री प्रेस जर्नल से कार्टूनिस्ट के रूप में करियर की शुरुआत की थी, लेकिन 34 साल की उम्र में नौकरी छोड़कर अपनी पत्रिका मार्मिक शुरू की. अपने कार्टूनों के माध्यम से बाल ठाकरे ने राजनीतिक पाखंड, नौकरशाही के अतिरेक और पावर पॉलिटिक्स का अपने तीखे व्यंग्य और हास्य के पुट के साथ प्रहार करना, मजाक उड़ाना शुरू किया. मार्मिक के जरिए बाल ठाकरे ने ऐसी मुहिम चलाई कि तब उसकी प्रसार संख्या 40 हजार तक पहुंच गई.

1. बाल ठाकरे की पहली दशहरा रैली 30 अक्टूबर 1966 को हुई थी. शिवाजी पार्क में जुटी भीड़ को सबसे पहले बाल ठाकरे के पिता केशव सीताराम ठाकरे ने संबोधित किया. और, महाराष्ट्र की सांस्कृतिक शुद्धता की पुनर्स्थापना का आह्वान किया. रैली को कई वक्ताओं ने संबोधित किया, और अंत में बाल ठाकरे ने मंच संभाला. बाल ठाकरे तब तक कोई अच्छे वक्ता नहीं थी, लेकिन अपनी वाक्पटुता और कार्टूनों की तरह व्यंग्य बाण से भीड़ को अपने प्रभाव में ले लिया था.  

2. बाल ठाकरे ने कहा, शिवसेना कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है, बल्कि नाम के अनुरूप ये शिवाजी से प्रेरित एक सेना है. बाल ठाकरे ने समझाया, कि शिवसेना का मकसद मराठी मानुस के हित को आगे बढ़ाना है. ऐसे में जबकि मराठी मानुस के साथ लगातार राजनीतिक साजिशें रची जा रही हैं. बाल ठाकरे ने न तो बड़ी बड़ी बातें की, न ही कोई राजनीतिक दर्शन. लेकिन मराठी अस्मिता को लेकर उनकी अपील का लोगों पर गहरा असर हुआ. 

Advertisement
marmik-cartoon
बाल ठाकरे का एक कार्टून, जिसमें सोए शेर रूपी मराठी मानुस को छत्रपति शिवाजी महाराज स्‍वयं जगा रहे हैं क‍ि 'उठ आदमी, कोई (कांग्रेस) तेरी पूंछ में गांठ लगा रहा है और तू सोया है?'

3. बाद के दिनों में शिवसेना की सभाओं में ऐसे माहौल बनाए जाते कि मौके पर मौजूद हर किसी का जोश हाई हो जाता. तालियों की गड़गड़ाहट और नारों से गुंजायमान मंच पर कुर्सी संभालते थे. मंच पर फूलों से आच्छादित छत्रपति शिवाजी की प्रतिमा रखी होती थी. मौजूदा दौर में एकनाथ शिंदे भी मंच से वैसी ही झलक दिखाने की कोशिश करते हैं. 

4. शिवसेना के कार्यक्रमों की शुरुआत जोशीले गीतों से होती, और धीरे-धीरे वो सामूहिक कोरस में बदल जाता. ऐसा माहौल बनाने की कोशिश होती कि लगे जैसे शिवाजी की सेना जंग के मैदान की तरफ बढ़ रही हो. 

5. बाल ठाकरे के भाषण में हर तरह के भाव देखने को मिलते. कभी प्यार तो कभी गुस्सा. कभी गुस्से में गरज रहे होते. बेबसी की बात करते. अधिकार और विशेषाधिकार की बात करते. और कहते, उनकी आंखों के सामने सब कुछ उनसे छीना जा रहा है. 

और फिर ऊंची आवाज में कहते, जागो, जागो इससे पहले कि बहुत देर हो जाए. देखते ही देखते लोग जोश से भर जाते. तालियां और नारे गूंजने लगते.

Advertisement

नए दौर में बाल ठाकरे स्टाइल पॉलिटिक्स क्‍या बेपटरी हो रही है?

के. अन्नामलाई के बहाने राज ठाकरे ने टार्गेट तो बीजेपी को किया है, लेकिन वो बाल ठाकरे के जमाने की राजनीति की याद भी दिला रहा है. बाल ठाकरे ने मराठी मानुस के पक्ष में बाहरी लोगों को निशाना बनाना शुरू किया. शुरुआत दक्षिण भारतीयों और कम्युनिस्टों के खिलाफ की, और बाद में मुसलमानों के खिलाफ मुहिम को आगे बढ़ाया. 

बाल ठाकरे के बाद जब कमान उद्धव ठाकरे के हाथ में आई तो वो शिवसेना को गरम दल से नरम दल बनाने में जुट गए. और, राज ठाकरे को विरोध के लिए दक्षिण भारतीय नहीं मिले, तो वो उत्तर भारतीय यूपी और बिहार के लोगों को निशाना बनाने लगे. उद्धव ठाकरे का उदारवाद इतना आगे बढ़ गया कि उनके हिंदुत्व की राजनीति पर सवाल उठने लगा, और शिवसेना ही टूट गई.

अब दोनों भाई मिलकर पुरानी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं, और पुराने तरीके से मराठी मानुस को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं. मुश्किल ये है कि मुंबई में न तो पहले जैसा राजनीतिक माहौल है, न ही ठाकरे बंधुओं का प्रभाव बाल ठाकरे जैसा रह गया है. 

आसान तो बाल ठाकरे के लिए भी नहीं था. बाल ठाकरे को भी ऐसे आरोपों का सामना करना पड़ा था कि उनकी राजनीति और शिवसेना गैर-मराठा लोगों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देती है. पूर्वांचल के लोगों के मामले में ऐसे ही आरोप राज ठाकरे पर भी लगते रहे हैं. लेकिन, अब ऐसी राजनीति का अब उनको कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है. 

Advertisement

तब ऐसे मौके भी आए जब बाल ठाकरे को भी सफाई देनी पड़ी कि उन पर लगाए जा रहे आरोप झूठे हैं. बाल ठाकरे को तब लोगों को ये समझाना पड़ता कि हमलों के पीछे दक्षिण भारतीय हैं, और वे शिवसेना को बदनाम करना चाहते हैं. क्योंकि वो स्थानीय मराठी लोगों के हक की बात करते हैं. हमेशा ही मराठी भाषा पर फोकस रहने वाले बाल ठाकरे को तब अंग्रेजी में बयान जारी करना पड़ा था.

तब हालत ये थी कि मराठी युवाओं को नौकरी मिलना तो दूर, इंटरव्यू तक का मौका नहीं मिल पाता था. क्योंकि बाल ठाकरे के मुताबिक, बाहरी लोगों ने सरकार और निजी कंपनियों में बड़े पदों के काबिज होने के साथ ही, क्लर्क जैसी नौकरियों में भी कब्जा जमा रखा था.  

बाल ठाकरे ने बड़ा मौका देखा और शिवसेना की 19 जून, 1966 को स्थापना की. बाल ठाकरे को पहली बार बड़ा जन समर्थन दशहरे के मौके पर शिवाजी पार्क में हुई रैली में मिली. अब जबकि शिवसेना दो टुकड़े हो चुकी है, दोनों पक्ष दशहरा रैली आयोजित करता है, और राजनीतिक विरोधियों के साथ साथ एक दूसरे के खिलाफ जोरदार हमला बोलता है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Advertisement