राजनीति में जो दिखता है, उसका बड़ा महत्व होता है. इसलिए जब 47 सदस्यों वाली अन्नाद्रमुक (AIADMK) विधायक दल की टीम नई विधानसभा के पहले सत्र के लिए अलग-अलग गुटों में पहुंची, तो उनके बीच की फूट सबके सामने आ गई. यह साफ है कि 2019 के बाद लगातार चौथी हार झेलने के बाद पार्टी महासचिव एडप्पादी पलानीस्वामी (EPS) के नेतृत्व के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी है.
अन्नाद्रमुक के एक बड़े धड़े के भीतर यह राय बन रही है कि इस हार की पूरी जिम्मेदारी पलानीस्वामी की है और उन्हें अब पद छोड़ देना चाहिए या तो वे पार्टी महासचिव का पद छोड़ें या विधायक दल के नेता के रूप में किसी और को आगे आने दें. यदि एसपी वेलुमणि और सीवी शनमुगम के नेतृत्व में 32 विधायक बगावत का फैसला करते हैं, तो यह 'ब्रांड अन्नाद्रमुक' पर एक तरह का राजनीतिक कब्जा होगा.
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सवाल यह उठता है कि 1972 में अपने गठन के बाद से द्रमुक (DMK) की चार जीतों के मुकाबले सात विधानसभा चुनाव जीतने वाली अन्नाद्रमुक की आज ऐसी हालत क्यों हो गई?
हार की पहली बड़ी वजह थी एक प्रभावी नैरेटिव या विमर्श की कमी. जहां एक ओर विजय ने 2026 के चुनाव को अपने और एम.के. स्टालिन के बीच की सीधी जंग के रूप में पेश किया, वहीं पलानीस्वामी अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए संघर्ष करते दिखे. जहां विजय ने 'मातरम' का वादा किया, वहीं पलानीस्वामी मुख्यमंत्री के तौर पर अपने पुराने कामों का हवाला देकर 'पुरानी शराब को नई बोतल' में पेश करते रहे.
विजय ने जहां Gen-Z से उनकी अपनी भाषा में बात करके उन्हें आकर्षित किया, वहीं ईपीएस (EPS) ने यह याद दिलाकर वोट मांगे कि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने कोविड के दौरान छात्रों को 'ऑल-पास' दिया था. 'पेबैक टाइम' (वोट के रूप में कर्ज चुकाने) की उनकी इस अपील में हताशा साफ झलक रही थी.
हार की दूसरी बड़ी वजह थी पलानीस्वामी की प्राथमिकताओं का गलत होना. उनकी टीम ने ईपीएस (EPS) को एक 'शक्तिशाली नेता' के रूप में पेश करने की कोशिश की, जिसका आधार यह बताया गया कि उन्होंने एनडीए (NDA) के भीतर अपने विरोधियों को कैसे किनारे किया. इसमें अन्नाद्रमुक से ओ पनीरसेल्वम, केए सेंगोट्टइयन, टीटीवी दिनाकरण और वीके शशिकला जैसे वरिष्ठ नेताओं को बाहर करना और के. अन्नामलाई को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटवाना शामिल था. लेकिन पलानीस्वामी की टीम यह समझने में नाकाम रही कि इन कदमों ने अंततः उनकी असुरक्षा और सबको साथ लेकर चलने में उनकी अक्षमता को ही उजागर किया.
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हार की तीसरी बड़ी वजह भाजपा के साथ गठबंधन था, जिसने द्रमुक (DMK) को यह नैरेटिव फैलाने का मौका दे दिया कि अन्नाद्रमुक का शासन तमिलनाडु को केवल 'दिल्ली का गुलाम' बना देगा. स्टालिन और उदयनिधि स्टालिन के इस तीखे हमले ने ईपीएस (EPS) को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया और अन्नाद्रमुक प्रमुख को चुनावी रैलियों में अपना पक्ष समझाने और सफाई देने में ही बहुत अधिक समय खर्च करना पड़ा.
चौथी बड़ी वजह चुनाव को जाति के चश्मे से देखना था, जबकि इस बात को नज़रअंदाज़ कर दिया गया कि तमिलनाडु का युवा अब इन सबसे आगे निकल चुका है. पलानीस्वामी को लगा कि वह 'गौंडर' वोट ले आएंगे, रामदास 'वन्नियार' वोट और दिनाकरण 'थेवर' वोट बटोर लेंगे. लेकिन 2026 एक ऐसा चुनाव था जहां तमिलनाडु ने जाति और धर्म की परवाह किए बिना मतदान किया. यह जनादेश 'वोटबैंक की राजनीति' को सिरे से खारिज करने वाला फैसला था.
हार की पांचवीं बड़ी वजह विजय को संभालने में उनकी अनिर्णय की स्थिति थी. करूर त्रासदी के तुरंत बाद, ईपीएस का स्वर विजय के प्रति नरम और समर्थन भरा था. लेकिन इसके बाद जिस तरह से 'जन नायगन' को रोका गया, उससे यह संदेश गया कि विजय पर एनडीए के साथ हाथ मिलाने के लिए दबाव डाला जा रहा है. अपुष्ट खबरों के अनुसार, एनडीए का हिस्सा बनने के लिए टीवीके (TVK) ने जितनी सीटों की मांग की थी, वह पलानीस्वामी की देने की क्षमता से कहीं ज्यादा थी. यह एक ऐसा फैसला था, जिसका पछतावा पलानीस्वामी को 4 मई के बाद से हर दिन हो रहा होगा.
हालांकि NDA ने EPS, अन्नामलाई, अंबुमणि रामदास और TTV दिनाकरन के जोरदार प्रचार के ज़रिए हारती हुई बाजी को पलटने की पूरी कोशिश की, लेकिन 23 अप्रैल को वोट पड़ने से काफी पहले ही AIADMK के नेतृत्व वाले गठबंधन की हार साफ़ नज़र आने लगी थी. चुनावी विश्लेषकों ने सोशल मीडिया पर एक ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की, जिससे लोगों को यह यकीन हो जाए कि AIADMK अभी भी दौड़ में बनी हुई है और यहां तक कि जीत भी रही है.
4 मई को, जब AIADMK बेहद खराब प्रदर्शन करते हुए तीसरे स्थान पर रही, तो इन विश्लेषकों को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा. AIADMK की सहयोगी पार्टी, BJP का प्रदर्शन तो और भी खराब रहा, उसने जिन 27 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उनमें से उसे सिर्फ़ एक सीट पर जीत मिली वह भी महज़ 900 वोटों के बहुत कम अंतर से.
अगर हार बुरी थी, तो हार के बाद जो कुछ हुआ, उसी की वजह से पलानीस्वामी के ख़िलाफ तलवारें खिंच गई हैं. जहां पार्टी के भीतर कई लोग TVK का समर्थन करने और सरकार में मंत्री पदों के लिए सौदेबाजी करने के पक्ष में थे, वहीं ईपीएस द्रमुक के साथ राजनीतिक संबंध बनाने के विचार के प्रति उदार दिखे.
अन्नाद्रमुक के भीतर कई लोगों के लिए यह विचार किसी 'कलंक' से कम नहीं था, क्योंकि इसका सीधा मतलब एम.जी. रामचंद्रन और जे. जयललिता के आदर्शों और सिद्धांतों के साथ समझौता करना था. खबर तो यहां तक थी कि प्रस्ताव यह था कि पलानीस्वामी मुख्यमंत्री बनेंगे और द्रमुक उन्हें बाहर से समर्थन देगी. हालांकि, अंत में इसका कोई नतीजा नहीं निकला, क्योंकि गठबंधन के लिए जरूरी आंकड़े नहीं जुट पाए.
अगर अन्नाद्रमुक (AIADMK) टूटती है, तो क्या होगा?
ऐसी स्थिति में 'टीवीके' (TVK) नई अन्नाद्रमुक बनकर उभरेगी. विजय ने पहले ही 'एमजीआर 2.0' का चोला ओढ़कर अन्नाद्रमुक के संस्थापक की ब्रांड वैल्यू और साख को हथिया लिया है. पार्टी में विभाजन तमिलनाडु की राजनीति में दशकों से चले आ रहे द्रमुक-अन्नाद्रमुक के एकाधिकार के अंत पर औपचारिक मुहर लगा देगा.
पारंपरिक रूप से अन्नाद्रमुक महिला वोटों और द्रमुक विरोधी लहर के ध्रुवीकरण के सहारे चुनाव जीतती रही है. लेकिन इस चुनाव में विजय ने ये दोनों ही आधार उनसे छीन लिए हैं. विभाजन के बाद अन्नाद्रमुक केवल जिला स्तर के क्षत्रपों की पार्टी बनकर रह जाएगी, जिन्हें या तो टीवीके के साथ 'जूनियर पार्टनर' बनकर संतोष करना होगा या फिर ओ. पनीरसेल्वम की तरह द्रमुक का दामन थामना होगा.
क्या AIADMK में फूट पड़ने की स्थिति में, विजय को उसके समर्थन के बदले कैबिनेट में जगह देनी चाहिए? इस विचार का जनता की ओर से विरोध होगा, क्योंकि विजय ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को अपने शासन के मुख्य मुद्दों में से एक बनाया है, और AIADMK के कई पूर्व मंत्री पूरी तरह से बेदाग नहीं हैं. ऐसे में, उस दाग का कुछ हिस्सा निश्चित रूप से विजय की छवि और प्रतिष्ठा को भी धूमिल कर देगा.
रविवार को कर्नाटक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नतीजे घोषित होने के तुरंत बाद द्रमुक (DMK) का साथ छोड़ने के लिए कांग्रेस की आलोचना की और इस बात पर जोर दिया कि यह राष्ट्रीय पार्टी एक अविश्वसनीय सहयोगी है. क्या वह उस समय 'सद्भावना' की संभावना टटोल रहे थे, जब स्टालिन खुद को सहयोगियों के बिना पा रहे हैं?
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चूंकि टीवीके (TVK) अब कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुकी है, ऐसे में द्रमुक और भाजपा के बीच के समीकरण किस ओर मुड़ते हैं, यह देखना काफी दिलचस्प होगा. लेकिन, अगर इस मेल-मिलाप से कुछ सार्थक निकलना है, तो दोनों पक्षों को जबरदस्त 'शब्दों की बाजीगरी' करनी होगी, क्योंकि अधिकांश मुद्दों पर दोनों पार्टियों के विचार एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं और अतीत में उन्होंने एक-दूसरे पर बेहद कड़वे आरोप लगाए हैं.
दूसरी ओर, पलानीस्वामी अभी भी टिके हुए हैं. उन्हें उम्मीद है कि टीवीके का यह 'हनीमून पीरियड' खत्म होते ही वह अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता फिर से हासिल कर लेंगे. हालांकि, उनके सहयोगी अब पार्टी के 'दो पत्तों' की देखभाल के लिए किसी नए 'माली' को नियुक्त करने के पक्ष में हैं.