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कूनो नेशनल पार्क के अंदर की अनसुनी कहानी: 45 डिग्री गर्मी और उफनती नदियां लांघ रही 'गुमनाम टीम', ऐसे होती है 49 चीतों की निगरानी

Kuno National Park: कूनो नेशनल पार्क में चीता प्रोजेक्ट की सफलता के गुमनाम नायकों का खुलासा. 45 डिग्री तापमान और उफनती नदियों के बीच 49 चीतों की 24 घंटे निगरानी कर रही है फील्ड टीम. पढ़ें पूरी रिपोर्ट...

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दो राज्यों के 12 जिलों में घूम रहे हैं 20 आजाद चीते.(Photo:ITG)
दो राज्यों के 12 जिलों में घूम रहे हैं 20 आजाद चीते.(Photo:ITG)

मध्यप्रदेश के श्योपुर स्थित कूनो नेशनल पार्क में चल रहे प्रोजेक्ट चीता की चर्चा अक्सर चीतों की रफ्तार और उनकी सफल वापसी को लेकर होती है. लेकिन इस सफलता के पीछे दिन-रात काम करने वाली वन अधिकारियों, पशु चिकित्सकों, ट्रैकर्स और फ्रंटलाइन कर्मचारियों की टीम शायद ही कभी सुर्खियों में आती है. अब कूनो नेशनल पार्क प्रबंधन के ताजा न्यूजलेटर ने इस अनदेखी दुनिया की झलक पेश की है.

न्यूजलेटर के मुताबिक, फिलहाल कूनो और उसके आसपास 49 चीतों का प्रबंधन किया जा रहा है. इनमें से 30 चीतों के गले में सैटेलाइट कॉलर लगे हैं, जिनकी लगातार निगरानी की जाती है. वहीं 20 चीते मध्यप्रदेश और राजस्थान के 12 जिलों में खुले जंगलों में विचरण कर रहे हैं, जबकि अन्य बड़े बाड़ों में रखे गए हैं.

45 डिग्री तापमान और बारिश में भी नहीं रुकती निगरानी

कूनो की फील्ड टीमें हर दिन जंगल, पहाड़, नदी किनारे और कृषि क्षेत्रों में चीतों की लोकेशन ट्रैक करती हैं. गर्मियों में 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान और मानसून में उफनती नदियों के बावजूद निगरानी का काम लगातार जारी रहता है.

टीम के सदस्य कई-कई घंटे वाहनों में सफर करते हैं या फिर मीलों पैदल चलकर हर चीते तक पहुंचते हैं, ताकि उनकी गतिविधियों और स्वास्थ्य पर नजर रखी जा सके.

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रेस्क्यू से लेकर मेडिकल केयर तक बड़ी जिम्मेदारी

न्यूजलेटर में बताया गया है कि वन्यजीव पशु चिकित्सकों की भूमिका सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं है. उन्हें चीतों का स्वास्थ्य परीक्षण, रेस्क्यू ऑपरेशन, जरूरत पड़ने पर बेहोश करना और मादा चीतों व शावकों की विशेष देखभाल भी करनी होती है.

कई बार बचाव अभियान के लिए दो राज्यों में सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है. भारी बारिश के दौरान बेहोश चीतों को सुरक्षित रखना और ऑक्सीजन सिलेंडर, ड्रिप तथा मेडिकल उपकरणों का संचालन करना भी टीम की जिम्मेदारी होती है.

सिर्फ चीते नहीं, पूरे इकोसिस्टम को समझने की चुनौती

प्रोजेक्ट चीता केवल चीतों को जंगल में छोड़ने तक सीमित नहीं है. हर चीते को भारत की जलवायु, शिकार, वनस्पति, परजीवी, अन्य शिकारी जीवों और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व वाले वातावरण के अनुरूप ढालना पड़ता है. इसी प्रक्रिया के साथ वन विभाग की टीम भी हर नए अनुभव से सीखते हुए रणनीति में बदलाव करती रहती है.

टीमवर्क बना सफलता की सबसे बड़ी ताकत

कूनो प्रबंधन के अनुसार, इस परियोजना की सफलता किसी एक अधिकारी या विभाग की नहीं, बल्कि पूरी टीम के सामूहिक प्रयास का परिणाम है. ऑपरेशन की योजना बनाने वाले अधिकारी, लॉजिस्टिक्स संभालने वाले कर्मचारी, पशु चिकित्सक, ट्रैकर्स और फ्रंटलाइन स्टाफ सभी एक साथ काम करते हैं और हर चुनौती का मिलकर सामना करते हैं.

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इस संरक्षण अभियान का नेतृत्व प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स (वाइल्डलाइफ) डॉ. समीता राजोरा कर रही हैं. उनके साथ फील्ड डायरेक्टर उत्तम कुमार शर्मा और डीएफओ थिरुकुरल आर. समन्वय की जिम्मेदारी निभा रहे हैं.

प्रोजेक्ट चीता की सबसे बड़ी विरासत

भारत में चीते की वापसी को दुनिया का पहला अंतरमहाद्वीपीय चीता पुनर्वास अभियान माना जाता है. कूनो का कहना है कि इस परियोजना की असली सफलता सिर्फ चीतों की वापसी नहीं, बल्कि उन गुमनाम वनकर्मियों, ट्रैकर्स और पशु चिकित्सकों का समर्पण है, जो बिना किसी चर्चा या पहचान की उम्मीद के जंगलों में दिन-रात इस ऐतिहासिक मिशन को सफल बनाने में जुटे हैं.

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