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जयंती विशेषः सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' की कालजयी कहानी - युद्ध

ज्ञान को एक रात सोते समय भगवान ने स्वप्न में दर्शन दिये और कहा, 'ज्ञान, मैंने तुम्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर संसार में भेजा है. उठो, संसार का पुनर्निर्माण करो.'  अज्ञेय की कहानी 'युद्ध' अपनी कथा-वस्तु के चलते अप्रतिम है. इसमें इनसान के अंतर्द्वंद्व की बानगी बखूबी दिखती है. साहित्य आजतक के पाठकों के लिए 1935 में लाहौर में लिखी गई यह कहानी-

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प्रतीकात्मक इमेज
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हमारे दौर के अद्भुत शब्द-शिल्पी अज्ञेय भावचितेरे थे. कवि के रूप में तो उन्होंने वैश्विक प्रसिद्धि हासिल की ही उनका कथा संसार भी बेहद विराट था. उनकी बहुतेरी कहानियों में स्व-कथ्य या वार्तालाप शैली में समाज का ऐसा यथार्थ मिलता है, जो इनसानी जीवन को एक नई दिशा देता है. कुछ- कुछ दर्शन की शक्ल में. हालांकि हिंदी साहित्य के बहुतेरे लोगों को अज्ञेय को कथा-शिल्पी कहने पर ऐतराज हो सकता है, पर सच तो यही है कि अज्ञेय ने कथा सहित शब्द-सृजन की हर विधा में साधिकार अपनी पैठ बनाए रखा.

अज्ञेय की कहानियों का फलक इतना विशाल, समय और काल से परे है कि आप उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते... हालांकि वह एक कवि के रूप में ही चर्चित रहे. अज्ञेय ने कालांतर में कहानी लिखना कम कर दिया था, पर जो कुछ भी लिखा उतने में ही उनके कथानक, पात्र और पाठक हमेशा जीवंत रहे. इसकी वजह थी विषय-वस्तु. अज्ञेय अपनी कहानियों में दर्शन और कथानक को शब्द कौशल से वह रूप देते कि पाठक चमत्कृत रह जाता. इसके पीछे उनका अथाह अध्ययन और विशद जीवनानुभव शामिल था

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कहानी संकलन 'छोड़ा हुआ रास्ता' - खंड: एक और दो की भूमिका के आखिर में खुद अज्ञेय ने लिखा था, "मेरी प्रस्तुत कहानियाँ बीस वर्ष या उससे अधिक पुरानी हैं; इन बीस वर्षों में विधा आगे न बढ़ी होती तो ही आश्चर्य की बात होती. मैं कहानी लिखता कहीं रहा पर सतर्क पाठक के नाते देखता-समझता रहा हूँ कि कहानी की प्रगति किधर है और उसके प्रेरक कारण क्या हैं. अब फिर कभी अगर कहानियाँ लिखूँगा तो निश्चय ही वे इन कहानियों से भिन्न होंगी और वह भिन्नता सकारण होगी, और यह कहना आवश्यक नहीं होगा कि ये कहानियाँ किसी नये अर्थ में नयी हैं, क्योंकि वे विधा के विकास में से ही निकली हुई होंगी. पर सम्भाव्य अपनी जगह पर रहे; वे कहानियाँ जहाँ थीं वहीं रखकर पढ़ी जाएँ. अभी वे पाठ्य नहीं हुई हैं ऐसा मुझे लगता है. साधारण पाठक के लिए भी नहीं, कहानीकार के लिए भी नहीं. यों ग़लतफ़हमी किसे नहीं होती!

तो आज अज्ञेय की जयंती पर साहित्य आजतक के पाठकों के लिए उनकी एक कालजयी कहानीः

शत्रु

                                                                                                                              - अज्ञेय

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ज्ञान को एक रात सोते समय भगवान ने स्वप्न में दर्शन दिये और कहा, 'ज्ञान, मैंने तुम्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर संसार में भेजा है. उठो, संसार का पुनर्निर्माण करो.'

ज्ञान जाग पड़ा. उसने देखा, संसार अंधकार में पड़ा है. और मानव-जाति उस अंधकार में पथ-भ्रष्ट होकर विनाश की ओर बढ़ती चली जा रही है. वह ईश्वर का प्रतिनिधि है, तो उसे मानव-जाति को पथ पर लाना होगा, अंधकार से बाहर खींचना होगा, उसका नेता बनकर उसके शत्रु से युद्ध करना होगा.

और वह जाकर चौराहे पर खड़ा हो गया और सबको सुनाकर कहने लगा, 'मैं मसीह हूं, पैग़म्बर हूं, भगवान का प्रतिनिधि हूं. मेरे पास तुम्हारे उद्धार के लिए एक सन्देश है!

लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी. कुछ उसकी ओर देखकर हंस पड़ते, कुछ कहते, पागल है; अधिकांश कहते, यह हमारे धर्म के विरुद्ध शिक्षा देता है, नास्तिक है, इसे मारो! और बच्चे उसे पत्थर मारा करते.

आख़िर तंग आकर वह एक अँधेरी गली में छिपकर बैठ गया, और सोचने लगा. उसने निश्चय किया कि मानव-जाति का सबसे बड़ा शत्रु है धर्म, उसी से लड़ना होगा.

तभी पास कहीं से उसने स्त्री के करुण क्रन्दन की आवाज़ सुनी. उसने देखा, एक स्त्री भूमि पर लेटी है, उसके पास एक छोटा-सा बच्चा पड़ा है, जो या तो बेहोश है, या मर चुका है, क्योंकि उसके शरीर में किसी प्रकार की गति नहीं है.

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ज्ञान ने पूछा, 'बहिन, क्यों रोती हो?'

उस स्त्री ने कहा, 'मैंने एक विधर्मी से विवाह किया था. जब लोगों को इसका पता चला, तब उन्होंने उसे मार डाला और मुझे निकाल दिया. मेरा बच्चा भी भूख से मर रहा है.

ज्ञान का निश्चय और दृढ़ हो गया. उसने कहा, 'तुम मेरे साथ आओ, मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा.' और उसे अपने साथ ले गया.

ज्ञान ने धर्म के विरुद्ध प्रचार करना शुरू किया. उसने कहा, 'धर्म झूठा बन्धन है. परमात्मा एक है, अबाध है, और धर्म से परे है. धर्म हमें सीमा में रखता है, रोकता है, परमात्मा से अलग करता है, अतः हमारा शत्रु है.'

लेकिन किसी ने कहा, 'जो व्यक्ति परायी और बहिष्कृत औरत को अपने पास रखता है, उसकी बात हम क्यों सुनें! वह समाज से पतित है, नीच है.'

तब लोगों ने उसे समाज-च्युत करके बाहर निकाल दिया.

ज्ञान ने देखा कि धर्म से लड़ने से पहले समाज से लड़ना है. जब तक समाज पर विजय नहीं मिलती, तब तक धर्म का खंडन नहीं हो सकता.

तब वह इसी प्रकार का प्रचार करने लगा. वह कहने लगा, 'ये धर्मध्वजी, ये पोंगे-पुरोहित-मुल्ला, ये कौन हैं? इन्हें क्या अधिकार है हमारे जीवन को बाँध रखने का? आओ, हम इन्हें दूर कर दें, एक स्वतन्त्र समाज की रचना करें, ताकि हम उन्नति के पथ पर बढ़ सकें.'

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तब एक दिन विदेशी सरकार के दो सिपाही आकर उसे पकड़ ले गये, क्योंकि वह वर्गों में परस्पर विरोध जगा रहा था.

ज्ञान जब जेल काटकर बाहर निकला, तब उसकी छाती में इन विदेशियों के प्रति विद्रोह धधक रहा था. ये ही तो हमारी क्षुद्रताओं को स्थायी बनाए रखते हैं, और उससे लाभ उठाते हैं! पहले अपने को विदेशी प्रभुत्व से मुक्त करना होगा, तब समाज को तोड़ना होगा, तब...

और वह गुप्त रूप से विदेशियों के विरुद्ध लड़ाई का आयोजन करने लगा. एक दिन उसके पास एक विदेशी आदमी आया. वह मैले-कुचैले, फटे-पुराने, ख़ाकी कपड़े पहने हुए था. मुख पर झुरियाँ पड़ी थीं, आँखों में एक तीखा दर्द था. उसने ज्ञान से कहा, 'आप मुझे कुछ काम दें ताकि मैं अपनी रोज़ी कमा सकूँ. मैं विदेशी हूँ, आपके देश में भूखा मर रहा हूँ. कोई भी काम आप मुझे दें, मैं करूँगा. आप परीक्षा लें. मेरे पास रोटी का टुकड़ा भी नहीं है.'

ज्ञान ने खिन्न होकर कहा, 'मेरी दशा तुमसे कुछ अच्छी नहीं है, मैं भी भूखा हूँ.'

वह विदेशी एकाएक पिघल-सा गया. बोला, 'अच्छा! मैं आपके दुख से बहुत दुखी हूँ. मुझे अपना भाई समझें. यदि आपस में सहानुभूति हो, तो भूखे मरना मामूली बात है. परमात्मा आपकी रक्षा करे. मैं आपके लिए कुछ कर सकता हूँ?'

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ज्ञान ने देखा कि देशी-विदेशी का प्रश्न तब उठता है, जब पेट भरा हो. सबसे पहला शत्रु तो यह भूख ही है. पहले भूख को जीतना होगा, तभी आगे कुछ सोचा जा सकेगा...

और उसने भूखे लड़कों का एक दल बनाना शुरू किया, जिसका उद्देश्य था अमीरों से धन छीनकर सबमें समान रूप से वितरण करना, भूखों को रोटी देना, इत्यादि; लेकिन जब धनिकों को इस बात का पता चला, तब उन्होंने एक दिन चुपचाप अपने चरों द्वारा उसे पकड़ मँगवाया और एक पहाड़ी क़िले में क़ैद कर दिया. वहाँ एकान्त में उसे सताने के लिए नित्य एक मुट्ठी चबैना और एक लोटा पानी दे देते, बस.

धीरे-धीरे ज्ञान का हृदय ग्लानि से भरने लगा. जीवन उसे बोझ जान पड़ने लगा. निरन्तर यह भाव उसके भीतर जगा करता कि मैं, ज्ञान, परमात्मा का प्रतिनिधि, इतना विवश हूँ कि पेट-भर रोटी का प्रबन्ध मेरे लिए असम्भव है! यदि ऐसा है, तो कितना व्यर्थ है यह जीवन, कितना छूँछा, कितना बेमानी!

एक दिन वह क़िले की दीवार पर चढ़ गया। बाहर खाई में भरा हुआ पानी देखते-देखते उसे एकदम से विचार आया और उसने निश्चय कर लिया कि वह उसमें कूद कर प्राण खो देगा. परमात्मा के पास लौटकर प्रार्थना करेगा कि मुझे इस भार से मुक्त करो; मैं तुम्हारा प्रतिनिधि तो हूँ, लेकिन ऐसे संसार में मेरा स्थान नहीं है.

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वह स्थिर, मुग्ध दृष्टि से खाई के पानी में देखने लगा. वह कूदने को ही था कि एकाएक उसने देखा, पानी में उसका प्रतिबिम्ब झलक रहा है और मानो कह रहा है, 'बस, अपने-आपसे लड़ चुके?'

ज्ञान सहमकर रुक गया, फिर धीरे-धीरे दीवार पर से नीचे उतर आया और क़िले में चक्कर काटने लगा.

और उसने जान लिया कि जीवन की सबसे बड़ी कठिनाई यही है कि हम निरन्तर आसानी की ओर आकृष्ट होते हैं.

(लाहौर, जून 1935)

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