कहानी - मेरे पति की एक्स गर्लफ्रैंड (एकदा एक्स)
राइटर - डॉ दुष्यंत
‘यार! तुम भी कमाल हो' सोनाली ने कल्याणी से फोन पर कहा 'कौन लड़की अपने पति की उसकी एक्स गर्लफ्रेंड से बात करवाती है ऐसे, जैसे तुम मेरी करवाती हो, अपने पति निखिल से’ कल्याणी ने जवाब में कहा ‘कमाल नही हूं। आई नो हाउ टु कीप माई लाइफ़ द वे इट शुड बी’
सोनाली बोली, ‘ऐसे? कैसे? ज़रा मैं भी सुनूँ!’
वो बोली ‘मैं जानती हूँ कि वो तुमसे बहुत प्यार करता ह। और मुझे भी करता है,मुझे उससे कोई शिकायत नही हं । और ये जानना असंभव है कि मुझे या तुम्हें किसे ज़्यादा प्यार करता है। जब बहुत उदास होता है,और ऐसा साल में कभी दो-चार बार होता है, उससे पूछती हूँ, “क्या सोनाली की याद रही है?” उस वक्त मैं उसकी आँखें पढ़ लेती हूँ और तुम्हें फोन मिला देती हूँ।’ (बाकी की कहानी पढ़ने के लिए नीचे स्क्रॉल करें। या इसे जमशेद क़मर सिद्दीक़ी से SPOTIFY या APPLE PODCAST पर सुनने के लिए ठीक नीचे दिये लिंक पर क्लिक करें)
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‘डर नहीं लगता?’
‘किस से? तुम्हारे पति से थोड़ा-सा लगता है इसलिए मैं ही फोन मिलाती हूँ कि कहीं तुम्हारा पति फोन ना उठा ले। फिर तुम्हारे हैलो बोलने पर निखिल को पकड़ा देती हूँ।’
‘बस इतना ही डर लगता है?
'मतलब? और किस चीज़ का डर हो सकता है?'
‘कि कहीं मेरा और उसका प्रेम फिर उसी तरह जाग जाए’ सोनाली ने ये बात कही तो कल्याणी थोड़ी देर के लिए खामोश हो गयी, फिर बोली
‘नही, मुझे ख़ुद पर, निखिल पर और तुम पर यकीन है। और मुझे पता है, मैं जानती हूँ कि उसे कहाँ तक ख़ुशी देने से मेरी खुशी दांव पर नही लगती।’
‘ओह! देट्स रियली ग्रेट! एं ड डेंजरसली करेजियस टू!’
‘हाहाहा!’
‘एनीवेज, बाय। आई हेव टु रश फॉर जिम!’
कल्याणी ने कॉल डिस्कनेक्ट करके मोबाइल को सोफे पर रख दिया। उसे अपनी तारीफ और खिलखिलाती हँसी में शिष्टाचार में आख़िरी ‘बाय’ बोलना भी याद नही रहा। और वो टहलते हुए पाँचवें फ्लोर के अपने लिफ्ट की बाल्कनी में आकर दाईं दीवार से पीठ सटाकर खड़ी हो गई। उसने सिगरेट सुलगाई, पहला कश लिया, फिर अन्दर आकर एश्रे उठाई और वापिस बाल्कनी में आकर सिगरेट के साथ नवंबर के घने काले बादलों को निहारने का मज़ा लेने लगी। बादलो के झुरमुटों का आना-जाना उसके अपने मन में ख्यालों की आवाजाही-सा ही था।
‘आई डोट फील इट स्ट्रेंज’ उसने बुदबुदाते हुए ख़ुद से पूछा और सिगरेट की राख की पहली खेप एशट्रे में उतार दी। एक सिहरन उसके शरीर में उभरी और उसने सिगरेट का एक तेज़ कश लिया तभी ठंडी हवा का एक झोंका आया और उससे लिपट गया। वो मास्टर बेडरूम की ओर भागी और तकिए के बगल में रखा मेहरून शॉल लपेटकर वापस बाल्कनी में आकर रेलिग के पास के चेयर-खीच कर बैठ गयी। उसने ख़ुद को देखा वो आज निखिल की पसंद–यू आकार के गले की सफ़ेद टी-शर्ट और बेसिक ब्लू-डेनिम में थी। बारिश की पहली फुहार ने उसे चौंका दिया। वो वैसे ही बैठी रही। बरसती बारिश में हल्के-हल्के भीगने दिया। जैसे ख़ुद को कुदरत के हवाले कर दिया हो। उसे याद आया कि कैसे सोनाली से फोन पर बात करके निखिल भीगी आँखें लिए उससे लिपट गया था एक छोटे बच्चे की तरह। इस याद ने कल्याणी की गोल-गोल, बड़ी-बड़ी काजल से सजी आँखों को भी भिगो दिया। उसने गालों पर बहकर काजल फैलने की परवाह नहीं की। अब वह बाहर-भीतर भीग रही थी। निखिल जिस दुनिया का था, सो नाली उस दुनिया की नहीं थी। कल्याणी निखिल की दनिया की ही थी, या दोनों मिलकर अपनी-अपनी दनिया खोजने को तैयार हो गए थे। खोजने के इस मिले-जुले प्रयास को उन्होंने प्रेम का नाम दिया था। आपसी समझ के जिन क्षितिजो की कल्पना की जा सके.. उससे आगे की समझ वाले। रिश्तों की उम्र आपसी समझ ही तय करती है। यह दोनों की पारस्परिक समझ थी। दोनों नई सदी के लोग थे। जिनकी परवरिश पिछली सदी में हुई थी। दोनों ने अपनी समझ के दायरे का विस्तार कुछ तो ठोकरें खाकर किया, कुछ बादाम खाकर। किसने ठोकरें ज़्यादा खाईं, किसने बादाम ज़्यादा, इसका ठीक-ठीक हिसाब दोनों को ही पता नहीं था। पर दोंनो को लगता था कि लगभग बराबर ही खाई होगी तभी कुदरत ने दोनों को मिलवाया है, कुदरत का तराजू उन्नीस-बीस थोड़े ही तौलेगा। पहला झटका कल्याणी ने निखिल से पहली मुलाकात में यह कहते हुए दिया था कि ‘तुम छोटे शहर में पले-बढ़े हो, आई एम श्योर, तुम्हारे घर पर कोई लड़की या लेडी स्मोक नहीं करती होगी। लेकिन मैं पीती हूं। सोच लो, हम अभी इस मीटिंग को यहीं छोड़ सकते हैं। या थोड़ी देर बात कर लें, यह सोचकर कि यह पहली और आखिरी मुलाकात ह, तब तक सिगरेट नहीं पियूँगी, इतना तो कर ही सकती हूँ।’ निखिल ने शालीन डिफेंस खेला और अपनी जेब से लाइटर निकालकर कहा था, ‘मे आई लाइट योर सिगरेट मैडम, मी टू पर कभी-कभी।’ कल्याणी ने कहा कि ‘बट, आई एम रेगुलर, माइंड इट।’
दूसरी मुलाकात के दिन कल्याणी ने कहा था कि सुनो... मेरे कई दोस्त हैं, जिनसे मेरी लंबी बात होती है वो मेरे इंटिलेक्चुअल संसार को आइडियाज और फैक्टस दोनो तरह से एनहांस करते हैं, नए-नए पॉइंट ऑफ व्यू देते हैं, कई बार यह म्युचुअल भी होता है ।’
निखिल ने कहा था, ‘सो वॉट, इट्स सिपल एंड ओब्वियस, एंड ब्लेसिंग टू हैव सच फ्रेंड्स।’
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