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असम की लेखिका ने बताया NRC का मतलब, कहा- बाहरी बनाम असमिया की लड़ाई

असम आंदोलन और बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ पर भी असमिया लेखकों ने अपनी राय रखी. असम आंदोलन का हिस्सा रहीं रीता चौधरी ने कहा कि असम आंदोलन जब शुरू हुआ था तो हम लोग बहुत नए थे. इस आंदोलन को लेकर बहुत बड़े सपने थे.

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साहित्य आजतक के मंच पर असमिया लेखक कुला सैकिया, युवा असमिया लेखिका बिपाशा बोरा और रीता चौधरी
साहित्य आजतक के मंच पर असमिया लेखक कुला सैकिया, युवा असमिया लेखिका बिपाशा बोरा और रीता चौधरी

  • एनआरसी को हिंदू-मुस्लिम के चश्मे देखा जा रहा
  • असम आंदोलन के बाद समाज में बंटवारा दिखा-रीता चौधरी

साहित्य आजतक के तीसरे दिन यानी रविवार को जलसा में विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों ने शिरकत की. 'बिस्तार है अपार...असमिया साहित्य के उसत्व' नामक सत्र में असम के जाने-माने लेखक और राज्य के पुलिस महानिदेशक कुला सैकिया, युवा असमिया लेखिका बिपाशा बोरा और रीता चौधरी ने असमिया साहित्य से लेकर मौजूदा राजनीतिक वातावरण पर अपनी राय साझा की.

असम आंदोलन और बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ पर भी इन लेखकों ने अपनी राय रखी. असम आंदोलन का हिस्सा रहीं रीता चौधरी ने कहा कि असम आंदोलन जब शुरू हुआ था तो हम लोग बहुत नए थे. इस आंदोलन को लेकर बहुत बड़े सपने थे. असम में नेताओं पर बहुत भरोसा था. हम अपनी पहचान को बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे.

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रीता चौधरी बताती हैं कि इस दौरान चीजें बहुत बदली हैं. इनके बारे में बताना बहुत जटिल है. मैंने इस पर एक किताब भी लिखी है. इसे दो लाइन में नहीं बताया जा सकता है. असम मूवमेंट में सभी समुदायों के लोग शामिल हुए. असम गण परिषद की सरकार बनी बनी, लेकिन उसके बाद बहुत बदलाव देखने को मिला. समाज में डिवाइडेशन देखने को मिला. असम में विभिन्न समुदायों ने अपनी पहचान को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया. बोडोलैंड जैसे आंदोलन इसके हिस्से हैं.

रीता चौधरी ने एक दिलचस्प बात बताई. उन्होंने बताया कि असम आंदोलन के बाद वहां के समाज में बंटवारा बढ़ा. दरअसल 1990 के दशक में सब अपनी जड़ तलाश रहे थे, इसलिए शायद असम में भी ऐसे आंदोलन उपजे. लेकिन उसके बाद असमिया नागरिकों को बाहरी लोगों से संकट महसूस हुआ तो असम में फिर लोग एकजुट होने लगे. शायद का मसला तभी सामने आया.



एनआरसी के मुद्दे पर जब बिपाशा बोरा से पूछा गया कि क्या इसे हिंदू-मुस्लिम के चश्मे देखा जा रहा है. बिपाशा बोरा ने कहा कि लोगों को एनआरसी के बारे में सझाना मुश्किल काम है. असल में, यह असमिया बनाम बांग्लादेशी की लड़ाई है. लेकिन इसे खांचे बांधकर रख दिया गया है. हमें एनआरसी की जरूरत है. असम में एनआरसी का मतलब बाहरी बनाम असमिया की लड़ाई है. लेकिन इस मुद्दे को उलझा दिया गया है.

पूर्वोत्तर और अखिल भारतीय सोच का अंतर

रीता चौधरी जिस समय किताबें लिख रही थीं, उस समय असम में आंदोलन चल रहा था. कभी जेल में तो कभी अंडरग्राउंड होकर रीता चौधरी लिख रही थीं. वह राष्ट्रीय पुस्तक न्यास(NBT) की चेयरमैन भी रहीं. का चेयरमैन रहने के दौरान रीता चौधरी ने अनुभव साझा किया. उन्होंने बताया कि जब एनबीटी ज्वॉइन किया था, तब बताया गया कि दिमाग से नॉर्थ-ईस्ट को दिमाग से निकालो. य़े मेरे लिए हैरानी वाली बात थी कि ऐसे क्यों बोला जा रहा है. हमें चीजों को पैन इंडिया की तरह सोचना चाहिए लेकिन उत्तर भारत में बंटी हुई नजर से देखा जा रहा था.

कनफ्लिक्ट जोन में पुलिस और साहित्य

असम के पुलिस महानिदेशक और साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कुला सैकिया से पूछा गया कि आप NRC के मुद्दे को कैसे देखते हैं, क्योंकि वो साहित्य और पुलिस दोनों से जुड़े हुए हैं. कुला सैकिया ने कहा कि अभी मैं चीजों को साहित्य की नजर से देख रहा हूं. कनफ्लिक्ट जोन में बहुत संकट होता है. उसे साहित्य में लाए जाने की जरूरत है.

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पुलिसिंग पर कहानी के असर पर सैकिया ने कहा कि यह बताना मुश्किल है. लेकिन कनफ्लिक्ट जोन में पुलिस को बहुत कुछ सामना करना पड़ता है. एक घटना के बारे में बताते हुए कहा कि मुठभेड़ में एक उग्रवादी घायल हो गया था और पुलिसकर्मी उसे अस्पताल लेकर गए. जहां डॉक्टर इस दुविधा में फंस गया कि वह उग्रवादी का इलाज करे या नहीं क्योंकि डॉक्टर का बेटा आतंकी गोलीबारी का शिकार हो गया था. कुला सैकिया कहते हैं कि ऐसी घटनाओं को साहित्य में दर्ज किए जाने की जरूरत है.

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