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'उल्लंघन' तो कवि का स्वभाव हैः राजेश जोशी के नए संकलन पर एक नज़र

राजेश जोशी एक कवि के रूप में यह ध्‍यान रखते हैं कि उनकी कविता विचारधारा की जड़ मशीनरी से निकली युक्ति या उक्ति न बन जाए. तभी तो कुछ कविताएं यहां ऐसी हैं जो शब्द में नए अर्थ का संधान करती हैं. अर्थविस्तार करती हैं. अपने अभिप्रायों में खिलती हैं.

राजेश जोशी के काव्य संकलन 'उल्लंघन' का आवरण चित्र राजेश जोशी के काव्य संकलन 'उल्लंघन' का आवरण चित्र

आजादी का अमृत महोत्स‍व मनाया जा रहा है और एक कवि कह रहा है:  
'इतना अंधेरा तो पहले कभी नही था कि मुंह खोल कर अंधेरे को कोई अंधेरा न कह सके
कि हाथ को हाथ न सूझे
कि आंख के सामने घटे अपराध की कोई गवाही न दे सके... यह आज का परिदृश्य है जहां उजाले का अंधेरा इतना सघन है कि वह नजर नहीं आता. 'पृथ्वी का कृष्ण पक्ष' तो कोई कवि ही देख सकता है. 'उल्लंघन' में राजेश जोशी ने इस अंधेरे को लक्ष्य किया है जैसे कभी मुक्तिबोध ने इसे अपनी लंबी चर्चित कविता 'अंधेरे में' के पाठ-विन्यास में देखा था. यह कवि का अपना प्रति-संसार है- अपारे काव्यसंसारे. कवि एक ऐसा प्रजापति है जिससे कुछ भी तो छिपा नहीं. चाहे धब्बों को ढंकने के लिए कितने ही रंगरेज लग जाएं. कवि अंतत: देख ही लेता है और कह ही देता है. वह जानता है कि भटक भटक कर कवि को खुद ही खोजने पड़ते हैं अपने सच. कवि की कविताएं इसी सच की खोज हैं. यदि कोई कवि कविता में किसी सच की खोज में नहीं है तो उसकी कविता का हेतु भला क्या होगा. इसीलिए राजेश जोशी का कवि सदियों पुरानी इस कहावत को नए सिरे से वैधता देता हुआ कहता है:

पैरों को भटकने दो, खोजने दो नए रास्तेा
दिमाग को गढ़ने दो एक और अधिक सुंदर प्रति-संसार
कि वह एक प्रजापति का मस्तिष्क है. (प्रति-संसार, पृष्ठ 19)
***

हिंदी के सुधी कवि राजेश जोशी पेशे से बैंककर्मी रहे. कविताएं लिखीं, नाटक लिखे, आलोचना लिखी, बाल साहित्य और कथेतर भी. 'कविता और शहर'  पर एक तरह का शोध भी जिस पर उन्हें पीएचडी की उपाधि मिल सकती थी. एक बहुत ही प्रतिबद्ध किस्म का उनका लेखन रहा है. हाल में आया उनका कविता संग्रह 'उल्लंघन' मेरे सिरहाने है. उनकी कविताओं का शुरू से मुरीद रहा जब से कविता में होश सम्हाला. 'उल्लंघन' की कविताएं पढ़ते हुए अच्छा लगा कि यह कवि जाग रहा है. राजनीतिक उजाले की चकाचौंध से भी परिचित है और फासिस्ट किस्म के अंधेरे से भी. वह 'जागै अरु रोवै' का वंशज लगता है. वह बैंक में कार्यरत रहा पर किसी एनपीए व्यवस्था से जुड़ कर देश को चूना नहीं लगाया बल्कि डूबते बैकों की व्याधियों और कॉरपोरेट के मिले-जुले खेल को देखता रहा. इसी संग्रह में बैंक पर लिखी कविता नायाब है.

देश की अर्थव्यवस्था की धड़कन कही जाने वाली बैकिंग प्रणाली जिस तरह से पिछले दो दशकों से रूग्ण बनाई जा रही थी उसके परिणाम हमारे सामने हैं. करोड़ों के कर्ज और उस पर लाखों में समझौते! आपस में समामेलित हो कर भी बैंकों की सेहत खतरे में है और हो सकता है निजी हाथों में जाने के बाद जनता की जमा पूंजी, एक झटके में बैंक को डुबो कर हड़प ली जाए. बैंकों में आए सूक्ष्म से सूक्ष्म परिवर्तनों की दास्तान सुनाता लेजर और बहियों के जमाने का यह कवि इस डिजिटल मोड़ पर आकर नई प्रौद्योगिकी के इस अध्यात्मवाद से चकित है. संग्रह की दो बड़ी कविताओं में एक तो यह; और दूसरी है: 'बचपन की कहानी के तीन खो गए पात्रों की तलाश में भटकते हुए'- जहां वह इस उठते हुए शोर और निरर्थक होते समय में भाषा से उठते भरोसे पर क्षोभ प्रकट करता है. यहां तक कि वह कह उठता है:
ताकत और अहंकार से गंदी हो चुकी इस भाषा का मैं क्या करूं?
इस भाषा में नहीं लिख सकता मैं कोई कविता
या दोस्त को कोई पत्र!
पर ताकत और अहंकार के इस युग में स्वयंसेवकों की भाषा जितना संहारक और अपमानकारी होती जा रही है उसके प्रति राजेश जोशी के कवि ने क्षोभ प्रकट करने में संकोच नहीं किया है. बल्कि पिछले दिनों नागरिकता कानून को लेकर जिस तरह का प्रदर्शन व्यवस्था का रहा है, कवि ने इस बात पर हैरत जताई है कि किसी को अपनी नागरिकता का प्रमाण देना पड़े जो कि किन्हीं हालात में बहुत आसान काम नहीं है.

नागरिकता कानून की पेचीदगियों पर राजेश जोशी की दो कविताएं 'एक अलग अर्थ' और 'एक भुलक्कड़ नागरिक का बयान' हमारे वक्त की सबसे प्रासंगिक कविताएं हैं. नागरिकता के सवालों से टकराती ये दोनों कविताएं कठघरे में खड़ी की जाती नागरिकता के विरुद्ध कवि का हस्तक्षेप हैं. कवि कहता है:

मैं कहां तलाश करूं अपनी नागरिकता के प्रमाण
मैं इसी देश की मिट्टी में घूमा हूं नंगे पांव
पर कहां कहां छिपे हैं मेरे पांव के निशान
मुझे याद नहीं. (पृष्ठ 42, एक भुलक्कड़ नागरिक का बयान )

और फिर यह प्रार्थना की बुदबुदाहट कि :--

ओ सूर्य
कुछ करो, कुछ ऐसा करो
कि एक और पृथ्वी बनाओ
जिसे मुल्कों में तकसीम न किया जा सके
जो हर बेवतन का वतन हो
जहां हर गणतंत्र में निष्काषित कवि के लिए
अपना एक घर हो. (पृष्ठ 28, एक अलग पृथ्वी )

एक ऐसे समय जब पूरी राजनीति का धर्म, जाति, अगड़े-पिछड़े समीकरणों के आधार पर ध्रुवीकरण हो रहा हो, कविताएं अपने बिम्बों और प्रतीकों में ही खिल रही हों, एक कवि अभिधा की फटकार के साथ कविता में पेश आ रहा है, यह कहते हुए कि उल्लंघन तो कवि का स्वभाव है, कविता के लिए मौजूं बात है यह. यह उसकी अविनय-सविनय अवज्ञा है. वह यह कहने से हिचकता नहीं कि

मैं एक कवि हूं
और कविता तो हमेशा से ही एक हुक्मउदूली है
हुकूमत के हर फरमान को ठेंगा दिखाती  
कविता उल्लंघन की एक सतत् प्रक्रिया है. (पृष्ठ 9, उल्लंघन)

स्पष्ट है कि कविता एक स्थायी विपक्ष है- और जब विपक्ष है तो बाकी कवि क्या कर रहे हैं? क्या वे अपने विरोध के प्रत्ययों को अबूझ प्रतीकों बिम्बों की लड़ियों में गूंथ कर निश्चिंत हो जाना चाहते हैं या कविता उनके लिए एक कारगर लड़ाई रह गयी है? प्रगतिशील कवियों में समय को लेकर जो एक साफगोई है, अपनी अभिव्यक्ति को लेकर खतरे उठाने का जोखिम है, व्यवस्था द्वारा पहचान लिए जाने के खतरे हैं- उन सबसे रूबरू होते हुए वे उस हर आदत का उल्लंघन करने को तैयार दिखते हैं जिसे व्यावस्था ने अपने हित के लिए एक स्थायी स्वभाव में बदलने का काम किया है. राजनीतिक आर्थिक संकट और महामारी से गुजरते इस निर्मम समय में कविता की ओर जब जब हम लौटते हैं, वही है जो अपना दरवाजा खोल कर सबसे पहले आदमी का कुशल क्षेम पूछती है. पूछती है सब कुशल तो है- कविता में और समाज में भी?

अपने समय के लोकप्रियतावादी मुहावरे को गहरे स्वीकार के साथ अपनाने वाले राजेश जोशी की कविता इसीलिए नई कविता फार्मेट में एक मास अपील वाली कविता मानी जाती है कि वे कविता में बेलबूटे गढ़ने में समय नष्ट नहीं करते बल्कि समय-समय पर नक्कारखाने की आवाज को अपनी तूती से चुनौती देते रहते हैं.
***

राजेश जोशी कहते हैं, "कविता तो हमेशा से ही एक हुक्म उदूली है. यानी असहमति. अवज्ञा. सविनय या अविनय. उसे याद आता है किसी कवि का कहा कि स्वाधीनता घटना नहीं, प्रक्रिया है. उसे पाना होता है बार बार...लगातार." याद आए कैलाश वाजपेयी जो साठ के आसपास ही कह रहे थे: ''सिल सी गिरी है स्वतंत्रता और पिचक गया है पूरा देश.'' आज आजादी के अमृत महोत्सव और कवि के भी अमृत महोत्सव की इस समान वेला में आजादी की फलश्रुति इतनी है कि जितनी मुश्किल यह तब थी उससे मुश्किल मिली हुई आजादी को सहेजना है और यही हम पचहत्तर वर्षों में नहीं कर पाए हैं. आजादी का जो भी टुकड़ा जिसे हासिल हुआ वह उसे रुक्के की तरह भुना रहा है. लगभग वैसा ही कवि संताप है यह ...अब तक क्या किया जीवन क्या जिया! और मुक्तिबोध से लेकर राजेश जोशी तक यह सवाल आज भी उतना ही जीवित और प्रासंगिक है. आज भी कोई कवि इसी क्षोभ से भर कर कह उठता है: 'मेरी परछाईं धूप में जल रही है.' या 'यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है.' साये में धूप और अमृत महोत्सव के उजाले में अंधेरा. क्या विडंबना है!

मैं कह चुका हूं और पुन: पुन: कहता हूं कि कवि अपने समय की गवाही देता है. समय से बेखबर कवि कालातीत नहीं होता. वह कालबद्ध भी नहीं होता. वह निरवधिकाल का कवि भी नहीं होता. राजेश जोशी ने 'चांद का वर्तनी' में संभवत: 'विलुप्त प्रजातियां' जैसी कविता लिखी थी. ज्ञानेंद्रपति ने 'विलुप्त प्रजातियों के अंतिम वंशधर.' प्राणि प्रजातियों के संकट पर और भी कविताएं लिखी गयी हैं किन्तु ज्ञानेंद्रपति की कविताएं जितना समय के आवेग से आक्रांत लगती हैं, कुछ कम लेकिन उतनी ही शिद्दत से राजेश जोशी की कविताएं अपने समय में विलोपन को पहचानती हैं. वे उस समय का प्रति-समय और इस संसार का प्रति-संसार रचने में अपने कवि की कृतार्थता पाती हैं. भाषा लुप्त हो रही है, यह सभी कह रहे. भाषा वैज्ञानिक, भाषाविद्, भाषातात्विक सब. कवि भी अपनी-अपनी तरह से. कुछ भाषाओं को तो लिपियां नहीं नसीब हुईं वे कंठों में ही अधिष्ठि्त रहीं और उस भाषा को बोलने वाली अंतिम बूढ़ी स्त्री के साथ चली गईं. जैसे मरणासन्न व्यक्ति कुछ बुदबुदाता हुआ कातर आवाजों हिचकियों के साथ विदा होता है, लुप्त होती हुई भाषा की हिचकी भी एक बूढ़ी स्त्री के साथ हवा में विलीन हो जाती है. खो जाती है भाषा, कंठ में उसका अधिवास और तब कवि लाख खोजे उस भाषा की प्रतिध्वनि भी लौट कर नहीं आती. वह खोती हुई भाषा, बोली को पुकारना चाहता है, वह कविता के उस मौलिक आस्वाद को महसूस करना चाहता है जिसके खिलाफ कान भर रही है नई प्रौद्योगिकी. केदारनाथ सिंह को शंख से आती भाषा की कोई प्रतिध्वनि सुनाई देती थी तो राजेश जोशी को चींटियों के पांवों की आवाज़ सुन पड़ती है. केदारनाथ सिंह के यहां भी चींटियों की रूलाई का प्रसंग आया है: मैं तो बस इस शहर की लाखों लाख चींटिंयों की मूक रुलाई का हिन्दी में अनुवाद करना चाहता हूं.' (तालस्‍ताय और साइकिल, चींटियों की रुलाई, पृष्ठ 91)  भाषा के लोप पर मरती हुई आखिरी बूढ़ी स्त्री के साथ जिस संताप की सहयात्रा में कवि शामिल होता है वह कितना क्षोभ जगाता है पाठक के मन में-

भाषा के लोप पर कविता
एक बूढ़ी स्त्री के दिवंगत होने के साथ खत्म़ होती भाषा
मैं एक ऐसे समय का नागरिक हूं
जहां हर दिन हमारी आंखों के सामने
आपस में बोलने बतियाने की भाषाएं
मर रही हैं (उस भाषा को बोलने वाली अंतिम बूढ़ी स्त्री, पृष्ठ 21)

पहले के दौर में राष्ट्रकवि हुआ करते थे जो राष्ट्रभक्ति में गाते थे. आज राजभक्ति में गाने वाले कवि बहुतेरे हैं, देश भक्ति वाले कम. देशभक्त और राष्ट्रभक्त कवि ही यह कह सकता है कि-

मूर्तियों के पेट में चला जाएगा देश का सारा धन
बंदरों के हाथ में उस्तरे होंगे
और लोग अपनी खोपड़ी बचाते भागते फिरेंगे. ( वही, पृष्ठ  47)
***

केदारनाथ सिंह अपने संग्रह 'तालस्‍ताय और साइकिल' की एक कविता में कहते हैं-
पूरी कर रहा हूं वह कविता
जिसे लिखना शुरू किया था किसी पुरखे कवि ने
शायद सदियों पहले
और देखता हूं कि नीमअंधेरे में
मैंने यही तो किया है
कि हटा दिया है कोई हलन्त्
लगा दी है कहीं बिन्दी
उलट दिया है कोई विशेषण
उड़ा दी है कोई तिथि
और तुर्रा यह- कि मैंने कविता की है!' (तालस्‍ताय और साइकिल, अपनी ख़बर, पृष्ठ 42)

और राजेश जोशी भी बिल्कुल यही करते हैं. वे बात करते हैं. अपने समय की विडंबनाओं को पढ़ते हैं और देश दुनिया के मुद्दों को अपनी सोच के आलोक में पढ़ते हैं और बस कविता बन जाती है. पूछते हैं, क्या हुआ हमारे सपनों का. बड़े तूमार बांधे गए. गांधी के सपनों का देश. नेहरू के सपनों का देश. पर आजादी के बाद दुनिया दिनोंदिन चाकचिक्य के बावजूद बदरंग होती गयी. यह 'डि-नेशनलाइजेशन' और 'निजीकरण' का दौर है. बेचने का दौर है. पहाड़ों, जंगलों को काटने और पारिस्थितिकी को रौंदने का दौर है. बांधों के बाधावरोधों और नदियों के नालों में बदलने का दौर है. अतुल्य भारत, अतुल्य गंगा की दुंदुभि का दौर है. कभी कुंवर नारायण जी ने चिंता व्यक्त की थी, 'बचाना है नदियों को नाला हो जाने से'. मसले समान ही हैं जो इस दौर के कवियों को मथ रहे हैं. सभ्यता का संकट मुक्तिबोध के समय भी था, पूंजी का आच्छादन कम नहीं था और आज तो और भी ज्यादा. यह पूंजी ही अमीर को अमीर और गरीब को गरीब बनाने का संयंत्र है. यह रूग्ण सरकारी इकाइयों को औने-पौने खरीद कर मालामाल होने का समय है. इस समय के बदरंग होने की बहुतेरी गवाहियां राजेश जोशी की इन कविताओं में मिल जाएंगी.

प्रकृति के रहस्यों को कवि सदैव कौतुक से देखता आया है. एक ऐसी कविता यहां है प्रकृति के रहस्यों से भरी: बाहर जाने का कोई दरवाजा नहीं. वह प्रकृति को नाना रूपों में रूपांतरित देखने अभ्यस्त हो चुका है और कहता है:
'इस माया का क्या करें जहां तू ही महामारी है और तू ही दवा भी! हम अपने डर को लेकर कहां भागें, कहां जाएं तुझसे बाहर जाने का कोई दरवाज़ा नहीं! ''
इसी कुदरत में बीमारियां, इसी में इलाज के विकल्प भी! क्या जीवन साहचर्य है कि इस कुदरत से बाहर कुछ भी नहीं!

राजेश जोशी साधुकवि का अवतार नहीं हैं. वे उस कवि परंपरा से उपजे हैं जो मुक्तिबोध, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन और रघुवीर सहाय से मिल कर बनी है. वे जहां तहां से लोकप्रिय मुहावरे कच्चे माल की तरह उठा कर सहेजते और उसे अपनी कविता में बरतते आए हैं. यह प्रविधि अपने समय में तुलसी ने अपनाई है. उन्होंने जमाने में भोगे-भुगते मुहावरे और कहावतें इकट्ठा कीं और उन्हें अपने काव्य में व्यवहृत किया. पग-पग पर तुलसी और कबीर के यहां जीवन की सीख है. अनुभव की सीख है. शास्त्रों की सीख है. लोक की सीख है. राजेश जोशी इस लोक्रप्रियता का अर्थ समझते हैं. कविता उनके लिए कोई अबूझ इकाई नहीं कि उसे समझने के लिए किसी वैयाकरण का सहारा लेना पड़े. उनकी कविताएं नारे का परचम भी बन सकती हैं और एक संजीदा कवि की मिसाल भी. विचारधारा के स्तर पर वे प्रतिबद्ध जरूर हैं पर उन्हें ध्यान रहता है कि कविता इतनी विचारबहुल न हो जाए कि नारा ही बन जाए या इतनी कलावादी भी नहीं कि अपना कलात्मक संतुलन खो बैठे. कुछ हो जो मन को अपील करे. धैर्य के साथ बांची जा सके. विचारधारा की जड़ मशीनरी से निकली युक्ति या उक्ति न बन जाए. तभी तो कुछ कविताएं ऐसी यहां हैं जो शब्द में नए अर्थ का संधान करती हैं. अर्थविस्तार करती हैं. अपने अभिप्रायों में खिलती हैं. भूलने की भाषा में, चिड़िया, पुनश्च, अजीब मुश्किल, बौर आ गया है, छोटे पांव लंबी दूरियां ऐसी ही कुछ कविताएं हैं. इन्हें आप विचारधारा के आग्रह से मुक्त होकर पढ़ें. यहां विचारधारा का कवच कुंडल नहीं है. एक मुक्त ढांचा (ओपेन एंडेड स्ट्रक्चर) है. कवि की कंदुक क्रीड़ा है. शब्दों के साथ कविता का खेल.
भूलने की भाषा में- कविता को देखें -

पानी की भाषा में एक नदी
मेरे बहुत पास गुजरी.

उड़ने की भाषा में बहुत सारे परिंदे
फड़फड़ाकर उड़े अचानक
आकाश में
बादलों से थोड़ा सा नीचे.

एक चित्रलिपि में लिखे पेड़ों पर
बहुत सारे पत्ते हिले एक साथ
पत्तों के हिलने में
सरसराने की भाषा थी.

लगा तुम जैसे
यहीं कहीं हो
देह की भाषा में अचानक कहीं से आई हुई.
भूलने की भाषा में
कुछ न भूले जा सकने वाले को
बुदबुदाती हुई. (वही, पृष्ठ 76)

यह कविता में ध्वन्यात्मकता और चित्रोपमता के उदाहरण हैं. जैसे चिड़िया कविता देखें-
जीवन का रेंगना
एक दिन अचानक
उड़ान में बदल गया
तभी भाषा में एक नया शब्द  
पैदा हुआ
चिड़िया! (वही, पृष्ठ 98)
***

मुक्तिबोध ने कहा ही है कि कविता कभी खत्म नहीं होती. वह एक अविच्छि़न्न कल्पना और रचना का विन्यास है. उसकी कविता कवि की ही कविता का पुनश्च  है. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो कवि अपनी ही कविता का पुनरवतरण है. अंतर्ध्वनियों का महाभाष्य है. एक महावाक्य का अंश है. सबद निंरतर की तरह कविता निरंतर रचे जाने की प्रक्रिया है. इसीलिए मुक्तिबोध जैसे कवि को देख कर लोग कहते हैं वे जैसे पूरे जीवन एक ही कविता लिखते रहे. जगूड़ी कहते हैं, हर कवि किसी न किसी पुराने कवि की कोख से पुनर्जन्म लेता है. आशुतोष दुबे की एक कविता में कहा गया है: नए कवि पुनर्जन्म लेते ही रहते हैं. इसी बात को राजेश जोशी अपने शब्दों में दुहराते हैं. यह 'दुहराना' भी अंग्रेजी का महज reiteration नहीं है, यह रिक्रियेशन है. पुनर्रचना. जैसे तुलसी शास्त्रों का अनुधावन कर सार को पुनरायत्त करते हैं. पुनर्स्थापित करते हैं. राजेश जोशी की ये पंक्तियां उस कहे का ही अनुधावन हैं-

दुनिया की सारी कविताएं पहले रची जा चुकीं

किसी न किसी कविता का पुनश्च हैं
सारी कविताएं मिल कर बन जाती हैं
एक महावाक्य!

लिखना ही पड़ता है, लिखते ही रहना पड़ता है बार बार
वह जो पिछली बार छूट गया
या कहा गया कुछ अलग तरह से
जिसको कह देने के बाद भी नहीं हुई पूरी तसल्ली़ अब तक.
हर कविता का हो सकता है एक ही शीर्षक- पुनश्च. (वही, पृष्ठ 100)

ये निराशा, हताशा भरे समय से गुजरते हुए कवि की कविताएं हैं, लिहाजा इनमें उसकी झलक और प्रतीति मिल सकती है. किन्तु यहां मंगलेशियत-मार्का हताशावाद नहीं है. यह अपने समय के खराब मुहूर्त से निकली महामारी और विपदाओं का उत्तरवर्ती चिंतन है. राजेश जोशी कविता में और जीवन में भी अपने वक्त के पाबंद हैं, जैसे वे अपने समय, प्रकृति और देश से आबद्ध एक सजग कवि हैं.

पुस्तकः उल्लंघन
रचनाकारः राजेश जोशी
विधाः कविता
भाषाः हिंदी
प्रकाशनः राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ संख्याः 128
मूल्यः ₹160.00
***
# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

 

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