वो जन्म और चेहरे से बनारसी थे और अपनी विशेषताओं और संतापों से भी. एक निर्धन परिवार में जन्मा हिंदी का वो कवि जिसने मोचीराम की तरह जनपक्षधरता और आमजन को रांपी की तरह अपने हाथों में संभाले रखा. हम बात कर रहे हैं जनकवि धूमिल की. दस्तावेज उन्हें सुदामा पांडेय के नाम से जानते हैं.
हिंदी का साहित्य ऐसे अद्भुत कवियों, लेखकों से भरा है जिन्हें उनके जीते-जी न तो पहचाना गया और न सम्मान मिला. अभावों और जीवन की जटिलताओं से लड़ते वो हमारे बीच से चले गए. उनके साहित्य को पहचानने में ये देरी हिंदी का दुर्भाग्य है.
लेकिन इससे भी बड़ा दुर्भाग्य है उनको, उनके काम को पहचानने के बाद भी अनदेखा करना. धूमिल हिंदी के ऐसे ही अभिशप्त दधीचि हैं जिन्हें न तो उनके काम के अनुरूप स्थान मिला और न ही प्रचार-प्रसार.
पिछले महीनों में राजकमल प्रकाशन की ओर से पेपरबैक में धूमिल समग्र आया. पढ़ने और समझने में इतने हफ्ते बीत गए कि सहज ही इसे कोई देर से प्रकाशित पुस्तक समीक्षा कह सकता है. लेकिन देरी शायद धूमिल के साथ एक अनुप्रासित सच जैसा चिपकी हुई चीज़ है. हमेशा देर कर देते हैं हम....
और इसीलिए इस लेख को समीक्षा न समझा जाए. एक साधुवाद का प्रकटीकरण, पाठकों का आह्वान और हिंदी वालों के लिए घोषणा कहा जाना ज्यादा समीचीन होगा. राजकमल प्रकाशन को सुदामा पांडेय धूमिल की रचनाकृतियों को एक समग्र ग्रंथ के रूप में छापने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद, साधुवाद और शुभकामनाएं. यकीन मानिए, हिंदी के पाठक वर्ग को, खासकर युवाओं को इसका लंबे अरसे से इंतज़ार था.
मात्र 39 वर्ष के जीवनकाल में धूमिल इतना लिख-गढ़ गए हैं कि धूमिल समग्र को तीन खंडों में प्रकाशित किया गया है. डॉ रत्नाकर पांडेय ने इसका शानदार संपादन किया है. पहला खंड धूमिल की प्रकाशित और अप्रकाशित कविताओं को समेटे हुए है. दूसरे खंड में गीत हैं, लोकगीत हैं, निबंध हैं, नाटक हैं, कहानियां हैं और अनुदित कविताएं हैं. और तीसरा खंड डायरी और पत्रों को संजोए हुए है.
धूमिल से पहले से परिचित पाठकों के लिए अगर पहला खंड धूमिल से प्रेम का है तो दूसरा और तीसरा खंड आश्चर्य और आकर्षण का है. क्योंकि बहुलक पाठक धूमिल की कवि वाली छवि से आगे नहीं बढ़ सके. उनकी कहानियों और निबंधों से गुज़रते हुए, गीतों को गुनगुनाते हुए जब हम डायरी और पत्रों तक पहुंचते हैं तो धूमिल मंच से उतरकर हमारे एकदम बगल बैठे मालूम देते हैं. कविता को जानने से ज्यादा जिज्ञासा कवि को जानने की हो जाती है और तीसरा खंड उसे बखूबी पूरा करता है.
तीनों ही खंडों में धूमिल के हस्तलिखित पत्र हैं और कुछ तस्वीरें हैं. धूमिल के समय के वरिष्ठ, गरिष्ठ कवियों-साहित्यकारों को देख पाने का लाभ भी इन छवियों से गुजरते हुए मिलता है.
धूमिल को क्यों पढ़ें
दरअसल, धूमिल हिंदी के उन उत्कृष्ठ जनकवियों में हैं तो समाज को एब्सट्रैक्ट की तरह नहीं, एक सजीव कोलाज की तरह कविता के कैनवस पर उतार देते हैं. धूमिल को पढ़ते हुए हिंदी का पाठक खुद को खुद के समय में खुद की सच्चाइयों से घिरा हुआ पाता है. धूमिल की यही विशेषता उन्हें एक सच्चा जनकवि बनाती है.
धूमिल स्वांग और औपचारिकता से मुक्त कवि हैं जो कठिन बातों को सच्चाई से कहने का साहस रखते हैं. धूमिल क्योंकि खुद भी अभावों की अनंतकथा के पात्र रहे हैं, उन्हें आमजन के दर्द को देखने और पकड़ने के लिए कोई अतिरिक्त जतन नहीं करना पड़ता. धूमिल की कविता में सच सहजता से आता है, प्रयास से नहीं.
सबसे सुंदर बात यह है कि धूमिल दर्द बताते हुए भी दर्द को हावी नहीं होने देते. न कविता को इस स्तर तो दर्दनाक बनाते हैं कि दर्द निराशा में परिवर्तित हो जाए. इसीलिए धूमिल के दर्द में, संघर्ष में और कठिनाइयों में वो लड़ता, जीता इंसान भी मिलता ही है जो जीवन की छोटी-छोटी खूबसूरतियों को सीने से लगाए है, उनका एहसास उसकी सांसों में है.
धूमिल को पढ़ना दरअसल एक निहायत सीमित परिधि में पल-बढ़कर भी एक अनंत तक फैले कविता के क्षितिज को नाप लेना है. धूमिल को पढ़ना आमजन को पढ़ना है. धूमिल को पढ़ना हिंदी के तमाम पाठकों के लिए सत्य से साक्षात्कार है.
इसलिए धूमिल को पढ़ें. राजकमल ने इस काम को आसान कर दिया है. हिंदी का पाठक किताब खरीदने जाता है तो हमेशा जेब और पुस्तक के बीच एक द्वंद्व से ग्रस्त रहता है. इस असमंजस को पेपरबैक संस्करण ने कम किया है. सोचें न, खरीद लें और पढ़ें. क्योंकि ये लाख टके का समग्र है. आपकी चेतना और अध्ययन के समग्र होने के लिए एक अनिवार्य सोपान.