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किताबेंः एक चेहरा जो पूरे आदमी का है

नामवर सिंह आलोचना पत्रिका के संपादक थे और विष्णु खरे सह संपादक. खरे के कहने पर ही मैंने ये सारी चिट्ठियां एक छोटे-से नोट के साथ छपने के लिए दे दी थीं.

धूमिल ग्रंथावली धूमिल ग्रंथावली

विनोद भारद्वाज

इस ग्रंथावली पर लिखते हुए मुझे इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि मेरा सुदामा पांडेय धूमिल से अच्छा-खासा परिचय सिर्फ अट्ठारह साल की उम्र में हो गया था. वे मुझसे बारह साल बड़े थे पर उन दिनों वे सहारनपुर से अपना ट्रांसफर कराने के लिए बेचैन थे. वे इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट (आइटीआइ) में सुपरवाइजर के रूप में काम करते थे.

बनारस उनका घर था. ट्रांसफर कराने के लिए वे उन दिनों बहुत परेशान थे. यह 1967 की बात है. मैं अपने समय की चर्चित लघु पत्रिका आरंभ का एक संपादक था. नरेश सक्सेना और जयकृष्ण जैसे वरिष्ठ साहित्यकार और कलाकार पत्रिका के अन्य संपादक थे. यह कहना गलत न होगा कि धूमिल की अनेक सर्वश्रेष्ठ कविताओं के कारण भी आरंभ को इतनी चर्चा मिली. खास तौर पर मोची राम और उस औरत की बग़ल में लेट कर धूमिल की ट्रेंडसेटिंग कविताएं हैं. ये आरंभ में ही छपी थीं.

आरंभ का पहला अंक अकाल पर केंद्रित था. उसमें धूमिल की अकाल दर्शन और गांव ये दो कविताएं छपी थीं. ठाकुर प्रसाद सिंह से मुझे जानकारी मिली थी कि सहारनपुर में धूमिल नाम के एक कवि हैं जिन्होंने अकाल पर कुछ बहुत अच्छी कविताएं लिखी हैं. मैंने फौरन उनको खत लिखा. उनकी कविताएं उससे भी अधिक तेजी के साथ मुझे मिल गईं. संयोग से जिस दिन आरंभ का पहला अंक छप कर आया, उसके अगले दिन दोपहर लखनऊ के मेरे घर के गेट पर एक बड़ी-बड़ी शानदार मूंछों वाला व्यक्ति धोती-कुर्ते में अपने सामान के साथ खड़ा था.

वे पूछ रहे थे, 'क्या विनोद जी घर पर हैं? मैं धूमिल हूं.' उन्होंने अपने आने की कोई खबर नहीं दी थी. मेरे घर की छत पर दो कमरे थे. मैंने वहीं धूमिल के रहने की व्यवस्था की. कुछ मैं घबराया हुआ भी था. नरेश जी ने गांव कविता की कुछ पंक्तियां काट दी थीं. उस कविता की अंतिम पंक्तियां बड़ी असरदार थीं. घर-बाहर अवसाद है/ लगता है यह गांव नर्क का भोजपुरी अनुवाद है.

मैंने कुछ डरते हुए धूमिल को आरंभ का वह अंक दिया. वे पन्ने पलटते रहे. मैंने कटी हुई पंक्तियों का भी धीरे से जिक्र किया. धूमिल उदारता से बोले, 'मैं तो इसे प्रिंटिंग मिस्टेक ही समझ रहा हूं.' मेरी घबराहट तब जा कर कम हुई. मालूम पड़ा, वे लखनऊ  अपने ट्रांसफर के सिलसिले में आए हैं. बनारस यानी घर जाने के लिए वे परेशान थे.

मेरे घर की काम करने वाली लड़की शीला ने मेरी मां से कहा, 'ये साहेब विनोद के दोस्त कैसे हो सकते हैं? देखने में तो उसके चाचा लगते हैं.' धूमिल सब को खुश रखने की कला जानते थे. वे कई बार मेरे घर रहे. 1967-69 के समय में सहारनपुर और बनारस से उन्होंने मुझे करीब तीस चिट्ठियां लिखीं. ग्रंथावली के तीसरे खंड में धूमिल की 60 के आसपास चिट्ठियां शामिल हैं जिनमें से आधी मेरे नाम हैं. पर उन चिट्ठियों की एक छोटी-सी भूमिका जरूरी थी. 1975 में धूमिल का ब्रेन कैंसर से 39 साल की उम्र में असमय निधन हो गया था.

नामवर सिंह आलोचना पत्रिका के संपादक थे और विष्णु खरे सह संपादक. खरे के कहने पर ही मैंने ये सारी चिट्ठियां एक छोटे-से नोट के साथ छपने के लिए दे दी थीं. उस दौर में हिंदी लेखक महानगरों की कॉफी कल्चर के धुएं में खोया था. धूमिल इस संस्कृति के खिलाफ थे. वे साइकिल चलाने वाली गांव की संस्कृति में रचे-बसे थे. जब मैं साइकिल पर सवार होता हूं, मेरा दिमाग साइकिल की तीलियों की तरह चलता है.

रत्नशंकर धूमिल के सुपुत्र हैं, उनके निधन के समय वे छोटे थे. ग्रंथावली कई साल पहले ही छपने वाली थी. इसका प्रकाशन एक महत्वपूर्ण घटना है. मैं डायरी, पत्र लेखन को काफी महत्व देता हूं. डायरी में एक जगह अशोक वाजपेयी और विष्णु खरे की आलोचक के रूप में तुलना भी की गयी है.

आरंभ के जनवरी-अप्रैल 1968 के अंक में मोची राम कविता का प्रकाशन एक बड़ी साहित्यिक घटना थी. उस कविता के साथ धूमिल की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी छपी थी: ''प्रयत्न यह रहा है कि भीड़ से अलग, आदमी के रोजमर्रा के कामों, और पेशे के आधार पर बनी हुई भाषा की मान्यता के खिलाफ कुछ लिखूं. मुझे अक्सर लगा है कि सही आदमी वे हैं, जो अस्तित्व में नहीं हैं. (एक चेहरा, जो कि पूरे आदमी का है, किंतु वह मेरा नहीं, मेरी कमी का है.)

आज लिखते समय बरसों पुरानी याद आ रही है जब धूमिल चौकड़ी मार कर बैठे मोची राम का पाठ करने से पहले बोले, 'त्रिलोचन को बनारस में यह कविता सुनाने के बाद तुम मेरे दूसरे श्रोता हो. एक खत में उन्होंने लिखा है, आरंभ से जुड़ कर मुझे लग रहा है कि पहली बार सही लोगों से जुड़ा हूं.’

मैं एक बार लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में भी धूमिल से उनके अंतिम दिनों में मिला था. एक ताकतवर आवाज धीमी और कमजोर हो गई थी. हिंदी का यह बहुत बड़ा नुकसान था.

धूमिल ग्रंथावली
(तीन खंड)
संकलन-संपादन: रत्नशंकर पांडेय
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन, नईदिल्ली
कीमत: 999 रुपए

 

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