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बुक रिव्यू: मनमोहन सरकार को हिलाने वाले शख्स का अकाउंट है ये किताब 'नॉट जस्ट एन अकाउंटेंट'

लोकसभा चुनाव के बाद किताब जारी करने के फैसले के चलते भले ही भूतपूर्व सीएजी विनोद राय की 'Not Just an Accountant' प्राइम टाइम टीवी पर सुर्खियों में नहीं रही, पर कोई शख्स जो प्राइम टाइम पर छाए रहने वाले घोटालों के बारे में जानना चाहता है, उसके लिए इस किताब को पढ़ना बेहद जरूरी है.

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बुक रिव्यू- नॉट जस्ट एन एकाउंटेंट
बुक रिव्यू- नॉट जस्ट एन एकाउंटेंट

किताब: नॉट जस्ट एन एकाउंटेंट- द डायरी ऑफ नेशंस कॉन्सेंस कीपर (इंग्लिश)
लेखकः विनोद राय
पब्लिशरः रूपा पब्लिकेशंस
एडिशन: हार्ड बाउंड (288 पेज)
कीमतः 500 रुपये
लोकसभा चुनाव के बाद किताब जारी करने के फैसले के चलते भले ही भूतपूर्व सीएजी विनोद राय की 'Not Just an Accountant' प्राइम टाइम टीवी पर सुर्खियों में नहीं रही, पर कोई शख्स जो प्राइम टाइम पर छाए रहने वाले घोटालों के बारे में जानना चाहता है, उसके लिए इस किताब को पढ़ना बेहद जरूरी है.

किताब के तीन हिस्से हैं- पहला हिस्सा लेखक और उनकी संस्था के बारे में पाठकों को अवगत कराता है. दूसरा हिस्सा 2जी, कॉमनवेल्थ, कोलगेट, हाइड्रोकार्बन (रिलायंस) और एयर इंडिया में हुए घोटालों का पोस्टमॉर्टम करता है. किताब का आखिरी हिस्सा विनोद राय के निजी विचारों को बयान करता है.

किताब के बारे में सबसे खास इसको लिखने की वजह है. किताब लिखने की वजह कांग्रेस या डॉक्टर मनमोहन सिंह के खिलाफ लग रहे आरोपों की बहती गंगा में हाथ धोना नहीं है. हालांकि किताब के दूसरे हिस्से में तकरीबन सारे घोटालों के बारे में यह कहा गया कि प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय ने जानबूझ कर चीजों को अनदेखा किया या सरसरी तौर पर संसद और देश को गुमराह करने का प्रयास किया.

केरल कैडर के अधिकारी रहे विनोद राय के स्थानीय नेताओं के साथ के अनुभव हों या तत्कालीन रक्षा मंत्री मुलायम सिंह यादव से एक वायु सेना सार्जेंट के तबादले को लेकर हुई नोंक-झोंक, किताब और ऑडिट रिपोर्ट में जो फर्क होना चाहिए, वो इस किताब में है. लेकिन दूसरे हिस्से में, जहां लेखक भूतपूर्व सीएजी की कलम से बड़े घोटालों को पाठकों के सामने रख रहे हैं, एक इंच भी आत्मगत भाव या कोरी गप को जगह नहीं दी गई है. जो भी कहा गया है तथ्यों के आधार पर कहा गया है.

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उच्चतम स्तर पर सरकारी संलिप्तता या भ्रष्टाचार रोकने में उदासीनता के ठोस प्रमाणों के अलावा किताब को पढ़ कर ऐसा महसूस होता है, जैसे नए साल की पूर्वसंध्या पर साल भर सुर्खियों में रही खबरों की तरह ही सारे महत्वपूर्ण घोटालों को एक साथ सुना दिया गया हो. शायद विनोद के लिए किताब लिखने का कारण भी यही रहा हो.

एक तरफ सीएजी की हैसियत से विनोद राय आंखों के सामने राष्ट्रीय सम्पदा और संसाधनों की लूट देख रहे थे और दूसरी तरफ सत्ता पक्ष का पूरा राजनीतिक तंत्र उनको खलनायक साबित करने में लगा था. विनोद राय ने एक बार कलम उठा लेने के बाद निश्चित तौर पर इस 'डायरी' के जरिए सिर्फ अपना बचाव करने के बजाय भविष्य के लिए कुछ मापदंड निर्धारित करने का भी काम किया है. दूसरे शब्दों में ये कहा जा सकता है कि इस किताब के जरिए वर्तमान सरकार पर यह नैतिक जिम्मेदारी छोड़ दी गई है कि पिछले दस साल में की गई गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदारी तय की जाए. जिसके दायरे में सिर्फ नेता नहीं बिजनेसमैन और नौकरशाह भी आएंगे.

राय ने किताब में ऐसी नीतियों को बदलने की जरूरत बताई है, जिनके चलते गड़बड़ी होने की संभावना रहती है. यह देखना पड़ेगा कि किसी रेडियो प्रसारण या विजयदशमी की भाषण में इन मापदंडों पर खरा उतरने के प्रयासों का हिसाब दिया जाता है या नहीं. राय इस उम्मीद के साथ अपनी बात खत्म करते हैं कि जो ऊर्जा 2012 के विरोध प्रदर्शन में दिल्ली के छात्र-नौजवानों ने दिखाई थी, वो कहीं न कहीं देश में सिस्टम के सड़ जाने के खिलाफ बगावत है और यही हमारी सबसे बड़ी उम्मीद है.

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राय ने किताब में इस बात का जिक्र किया कि उनकी नजर में शिक्षित और शहरी मध्य वर्ग का राजनीति में आना सबसे बड़ी उम्मीद है. जो देश को श्रेष्ठता की तरफ ले जाएगा. यही एक हिस्सा है, जहां लेखक के साथ बहस की गुंजाइश है. जिन जन-आंदोलनों का राय ने जिक्र किया, वो बेशक देश के इतिहास में मील का पत्थर साबित होंगे, लेकिन उससे यह उम्मीद करना कि हम भ्रष्टाचार या कॉर्पोरेट लूट पर जीत हासिल कर लेंगे, दूर की कौड़ी है.

किताब कुछ जरूरी मुद्दों से अछूती रही. घोटालों से या तो सरकारी खजाने को नुकसान होता है या आने वाले राजस्व का. इस पैसे की सबसे ज्यादा जरूरत जनसंख्या के सबसे निचले हिस्से को है जो भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि मूलभूत सुविधाओं के लिए भी मोहताज है. भ्रष्टाचार से सरकारी राजस्व को लगने वाली चपत का सबसे बड़ा खामियाजा इसी तबके को उठाना पड़ा है. विकास दर भले ही कई गुना बढ़ गई हो, सामाजिक खर्चे में कोई खास वृद्धि नहीं की गई है. शायद इसीलिए कभी भी सरकार को राजनीतिक तौर पर राजस्व की कमी की गर्माहट महसूस नहीं हुई. आज यह तबका संख्या में सबसे बड़ा है. पर राजनीतिक दबाब बना पाने में सबसे कमजोर.

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अमर्त्य सेन हों या चुनावी भाषण. यह बात अब जगजाहिर है कि पिछले दो दशकों में देश के दो हिस्से हो गए हैं, भारत और इंडिया. इंडिया जब तक बगावत करेगा, भारत तब तक खाट पकड़ चुका होगा. राय शेक्सपियर के 'हेमलेट' से अपनी बात खत्म करते हैं. तुलसीदास भी उतने ही प्रासंगिक हैं- भय बिन होय न प्रीत. इसी लाइन के संदर्भ में देश के सामने सवाल है कि क्या हम लोकतांत्रिक तरीके से सरकार चलाने वालों के दिमाग में जरूरी डर पैदा कर सकते हैं?

रौशन किशोर युवा अर्थशास्त्री हैं.

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