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कैसा है गीतांजलि श्री का उपन्यास रेत समाधि, जिसे मिला है बुकर पुरस्कार, पढ़ें-पुस्तक अंश

जानी मानी लेखिका गीतांजलि श्री के उपन्यास रेत समाधि की जबरदस्त चर्चा है. रेत समाधि दिग्गज लेखिका गीतांजलि श्री का पांचवां उपन्यास है. पाठकों से लिए पेश है उपन्यास रेत समाधि का पुस्तक अंश.

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रेत समाधि उपन्यास रेत समाधि उपन्यास

साहित्यकार गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ को इस साल के बुकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. ये पहली बार है जब हिंदी की किसी रचना को प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार हासिल हुआ है. इस खबर के सामने आने के बाद लोग ‘रेत समाधि’ और उसकी विषय वस्तु को जानने के लिए उत्सुक हैं. ऐसे ही पाठकों से लिए प्रस्तुत है राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास का पुस्तक अंशः-

एक झोंका और पृथ्वी घूमी. बीज अखुआया और पेड़ की तरफ चढ़ा. पक्षियों के गोल हरी दूब पर उतर गए और अपने को कमल का फूल समझने लगे, दूब को पानी. इस तरह पानी का दूब-हरा हो जाना. हवा लायी रात को रात में. सूरज को ले गयी बरसात की ओट में. हवा ने गुदगुदाया कि सूरज और ओट हुआ, बादल हंसी से लोटपोट होके मोटे हो गए और बरसात बन के टूटे. और ये मां-समय हो गया कि हर झोंके पे उई उई करे, खुश हो के हवा से बनते निशानों को देखे, दर्द पे जुनून सा आंखों में चढ़े, तन पे सांस और जान की फुर्कियां लुढ़कें.

कोई सोचता नहीं पर सोचें तो सोचेंगे कि हवा तन के भीतर के द्रव को छेड़ दे तो क्या नहीं होता. विमान 27 हज़ार फीट की ऊंचाई से जब 7 हज़ार पे ढुलक आता है तो हवा कान पे ढक्कन लगा देती है. हर जुम्बिश पर ढक्कन को हल्का सा हिलाती है कि थोड़ी हवा पीछे घुस जाए और अगले झटके पे धीमे धीमे दर्द की सीटी देती निकले. कभी देर तक ढक्कन लगाये रखती है कि निकलने का रास्ता न पाए, तब सीटी अन्दर ही अन्दर मार ऊधम मचाती है, कहीं कान से नीचे कूदाफांदी करती, कहीं गाल में नस बन फड़फड़ाती, कहीं आंखों के पपोटों के पीछे छुक छुक चलती, कहीं भवों के नीचे पंख बन फड़ फड़ करती. डर के डॉक्टर हकीम वैद्य बुलाओ जो बताते हैं द्रव का सन्तुलन गड़बड़ाया है. मगर गड़बड़ाया किसने अगर हवा ने नहीं? सदियों से स्थिर द्रव ठोस जमा नहीं रह सकता. हवा उसे हिला देती है, उसकी मुर्दान हिला देती है और फिर वो नन्ही नन्ही फुरकें मारने लगता है.स्मृति कल्पना दर्द भर्त्सना फिरते हैं जब मां हवा का कतरा बन सारे में फिरती है?

तन भी घर है. हवा के जो कारनामे घर में, वही तन में. हवा की राह में जो आता है उसे लांघ कर कि घेरकर पार करने में वो कहीं टकराती है, कहीं सुरंग बना के सीटी बजाती है, कहीं और ऊधम करती है. अटक मटक बलखाएगी.

खिड़कियों के खुलने बंद होने पे हवा की सिम्त बदलती है और नए नए अन्दाज़ से हवाएं नए नए राग छेड़ देती हैं. दीवारें वाद्य बनके बजती हैं जैसे हम्पी में.

तो कथा अब बेटी के घर के आसपास आ जुटी। जो यहां आ जाए वो कलम को रास आ जाए. पर बड़े के फोन आते, वे नहीं. तो बड़े पर कैसे जाए कलम?

वो ऐसे. पुराना रिवाज़ है परिवार के मामलों का कि बड़े बेटे के पास सब आते हैं. मगर इसका मतलब सब नहीं भांपते. मतलब कि जो जहां मिले बड़े से, वो ही आया गया है उनसे मिलने. जैसे तहसीलों से दौरे से लौटते में कोई दरोगा, टाइप बाबू, कोई पंचायत बाबू बड़े सरकार को 'कुछ घंटे हमारे यहां रुक लीजिये और भोजन नाश्ता करिए के लिए तैयार कर लेता तो बड़े नहीं उसके पास गए होते, वो ही अभी भी बड़े के पास गया होता और हाथ बांधे, अनुगृहीत मुस्कान लपेटे सत्कार कर रहा होता.

बड़े के संग रहने वालों की कहें तो वो भी इसी किस्म की बात. बड़े के संग रहने वाले, जहां भी जाएं, जितने भी अरसे को, बड़े के संग ही रहते हैं और अवकाश पूरा करके लौट आते हैं. अम्मा उन्हीं के संग रह रही है, रह कहीं भी रही हो. उसके पैसे का बंदोबस्त, उसकी देखरेख का, उसके जीवन मरण का उन्हीं का जिम्मा है, कहा जाए या नहीं, सोचा जाए या नहीं.

तो बड़े पर कलम अभी भी चल सकती है क्योंकि जहां हो परिवार, वृद्धा मां, दरवाजा, बड़े होंगे ही होंगे चाहे हों या न हों. दीवारों को साथ जोत के दरवाजा, दूसरे मकान, पोस्ट-रिटायरमेंट फ्लैट, में चला आया है. अलग दिखता मगर वही. और मां अभी वहां नहीं दिखती मगर है वहीं. छोटी मोटी यात्रा पर निकली हुई जैसे. जहां बड़े फोन करके उसकी खोज खबर रखते.

गीतांजलि श्री बोलीं- बुकर पुरस्कार पाकर अभिभूत हूं, साहित्य और स्वयं के प्रति जिम्मेदारी बढ़ गई है
 

आया फोन बड़े का

कम बड़े बेटे हैं जिन्हें घरवालों से बात करनी आती है. अगर हाल चाल लेना, दिल की कहना, अन्तरंग बातों पे खुस फुस करने को बात करना कहा जाए. आदेश देना, तरीके सुझाना और ये नहीं तो छेड़छाड़ करना, इस तरह बड़े बेटे बतियाते हैं. बाप की सख्त शख्सियत पहने हुए, चाहे दिल अपना हो और नर्म. बड़े की आवाज़ बदतमीज़ अकड़ू व्यंगाती चिन्ताती इधर उधर की करती. क्योंकि बड़े बेटों को आता कहां है सीधे सादे प्रेम के दो लफ्ज़ बोलना.

(बाहर वालों से बात की बात अलग है. वहां राजनैतिक बहसें, कविता शायरी फिल्में और एक दूसरे से एक दूसरे का साझा चलता है.)

अम्मा, वो पापा की गाड़ी का क्या नम्बर था?

पापा की गाड़ी? मां फोन पकड़े झूलने लगीं. झूले पर.

अरे वही जो फतेहपुर में ली थी.

हां, फतेहपुर में ली थी.

उसका नम्बर क्या था?

गुलाबी फ़िएट थी. अब तो देखने को नहीं मिलती.

मैं नम्बर पूछ रहा हूं.

उसी में ड्राइव करके लखनऊ जाते गौतम साब से मिलने. उनकी लड़की का भी क्या खूब नाम था। एक चीज़.

अम्मा मैं नम्बर पूछ रहा हूं.

उससे क्या? कानपूर भी गए थे. स्वरुप नगर. तुम्हे कुत्ते ने काट लिया था. मोटे मोटे इंजेक्शन लगे थे. पर पालतू कुत्ता था.

उससे क्या? नम्बर याद है?

नाम था अड़गड़ानन्द.

कुत्ते का? बड़े हंस पड़े.

नहीं जी, जिनका कुत्ता था उनका.

अम्मा मैं फ़िएट का नम्बर पूछ रहा हूं.

अरे वो मुझे क्यों याद रहे?

और अड़गड़ानन्द क्यों याद रहें?

अरे तुम्हे काटा था.

उन्होंने?

पता नहीं हैं अभी कि गए? भले आदमी थे.

काटते थे तब भी?

ऐ बाज़ नहीं आओगे. नम्बर पता करो. जल निगम में थे. एक बार चलें.

कब आयेंगी? तब तो चलें.

बड़े की बात इसी पर आने के लिए होती. कि मना ली छुट्टी, वापस आइये. बोले घर सेट हो गया है. बड़े बेडरूम में आप और डी रह सकती हैं, जो मियां बीवी का एक दूसरे को पुकारने का नाम था, शुरू में डार्लिंग का संक्षेप, बाद में डफर का. नहीं तो साइड का कमरा भी ठीक है, ज़रा ही छोटा और दोनों कमरे बाथरूम से जुड़े हैं, दोनों ओर दरवाज़ा.

क्यों, बहू तो कह रही थी अभी सब बक्से नहीं खोले हैं, बस खास खास चीजें, और उसमें भी आधी चीजें नहीं मिल रही हैं, कि सब जगह धूल बैठी है और बहू कह रही थी न सोने का न खाने का वक्त है तुम्हारा, नहाते भी नहीं हो और बनियान पहने घर के बाहर निकल आते हो, रिटायरमेंट का ये मतलब है, और शुगर चैक कराया, जिस पर बड़े बोले ओके बाय बाय और फोन रख दिया.

अपनी बात भी सहज तरह से बड़े को नहीं आती करनी. बस फोन करते हैं क्योंकि कचोट रहती है कि नए फ्लैट में चीजें अट रही हैं पर मां फ़िट नहीं हुई हैं और पहले सा न बड़ा है न पहले से सेवक सेविकाएँ, तो उन्हें कैसा लगेगा पर खैर तब तक बहन के संग चेंज से मन बहलाने दो, ऊलजुलूल जीवन शैली देख लें, वो भी वापसी के लिए मन चंगा कर देगा. कुछ कायदे का खिला पिला रही हैं, अच्छा है, और बहन की झोलाधारी ऊलजलूल मित्र मंडली को भी कोई कायदे की दीख रही हैं तो वो भी बढ़िया. सोसाइटी वाले भी जानेंगे उसके आगे पीछे नेक परिवार है, अच्छा है ना.

बड़े को कहां से भनक पड़े कि आजकल बहन की झोलाधारी टोली टली पड़ी थी. अम्मा की ही मंडली में एक झोलाधारी शामिल है. रोज़ी. पहली बार दरवाज़ा खोला, सामने बड़ा थैला लिए रोज़ी बुआ और बगल में गार्ड, जिज्ञासु, किंचित असहज. अब नहीं आता. पर और सारे आते हैं कचड़ा लेकर और मज़े से देखते हैं उनसे बनी चीज़ें. जिनसे रोज़ी दुकान खोल लेगी और ऑड्ज़ एन्ड एन्ड्ज़ नाम से इनका व्यापार करेगी. और गर्मी की शामों में आकर मां को नीचे उतारेगी और दोनों मज़ार पर बैठी दिखेंगी कभी तो बस चुप बैठी, किसी नयी कबूलियत में. कचड़ा कबूल, हिजड़ा कबूल, बड़े क्या, कोई भी क्या जाने, जीवन में क्या क्या कबूल?

उड़ते हुए रुई के फाये और डंठल कतरन से गनगनाता घर. हवा बहुत

चल रही थी और ईंट से ईंट बज उठी, अलग मुहावरा बनाते.

अकेला वाला घर बेटी के काम को समझ गया था. आदर से चुप बैठ रहता। बेटी देर तक पन्ना खोल झुकी रहती। कार्य देवी की उपासना में.किसी भी पल देवी प्रसन्न हो जातीं और धीरे से सरकी आतीं और उसके पास बैठ जातीं. अपने आप कलम उठ जाता और पन्ने पर चलने लगता. लेख, कहानी, किताब बनने लगती.

आजकल घर ढिठा गया है. हर ईंट अंगड़ाई लेती है. बातें चीतें होती हैं. कोई ज़्यादा हुड़दंगी आ जाए तो दीवारें और चुहल में. आनेवाले संग खेलती हैं. उसकी हल्की सी टीप पर दीवार बज उठती. जैसे उसमें हवा फूंक दी. मां के छूने पर तो निस्बतन धीमे से मगर जब रोज़ी बुआ का लहीम शहीम तन इधर उधर लहराता तो पता ही नहीं चलता किधर से खनक उठ के किधर बजी. गप्पबाज़ी में शिरकत करते खम्बे चौखट भी टुनटुना उठते. रोज़ी भी न, कभी हाथ ठोंकती, कभी पिछाड़ा चिपका के खुजलाती, और कभी माथा कहीं लगा के ठनक देती, जैसे खूब पता है मेरे छूने से दीवारें झंकृत होंगी.

माँ भी आज़माती है. उंगलियों की टीप पे सप्तस्वर निकलते हैं. पैर की थाप से पंचताल बजता है.इस ईंट में जलतरंग, उसमें तबला, इस खम्बे से वीणा, उससे मृदंगम, इन पायों से टकराव तो घटम, झूले की ज़ंजीर खड़काओ तो घंटी घंटा, स्लाइडिंग दरवाज़ा खींचो तो शहनाई, धूल फूँको तो शंख, गमला हिलाओ तो डमरू.

कार्य देवी झांकती है. डर जाती है. यहां तो बड़ा मौजोगुल है. हम तो वीरानों की देवी हैं. पतली गली से खिसक लेती है.

मां ने कहा काम करती नहीं, नींद लेती नहीं, आँखों के नीचे काला देखो,

तुम्ही गेस्ट रूम में सोना शुरू कर दो.

मां की मानकर नहीं, गर्मी से आजिज़ आकर बेटी मान गयी.

अम्मा कहती अब उतनी गर्मी नहीं रही, बरसात की तैयारी है. वो खिड़कियां खोल के खुश, पर बेटी नहीं. तो ए.सी. चलाकर मेहमान कमरे में लेटी. आखिर चूड़ियां जीत गयीं. बेटी को बाहर किया. उसने रोज़ी और अम्मा ऑड्ज़ एन्ड एन्ड्ज़ तामझाम खिसकाया और अपने दुखते अंग और थके स्नायु मेहमान पलंग पर ढेरा दिए.

गेस्टरूम में चूड़ियां नहीं बोलेंगी. टनटनाने वाला बांस का मोबाइल जो वो केके के संग बाली से लायी थी, उसे उसने उतार के, रोज़ी के टिन से पंख पंख काट के, धागों पे लटकाए मोबाइलों के पास लपेट कर रख दिया कि न बजे.

बीच बीच में चैक कर आऊंगी. वैसे अम्मा अब ठीक है. मेरे संग रहकर निखर आई है. घूमती है खाती पीती है हंसती है खूब बोलती है.

गर्मी खिसक ली तो एक दिन रात हुई. घंटों की वर्षा के बाद आसमान खुला था. चांद बादलों में उलझते सुलझते मां के गमलों के ऊपर झुके पेड़ की फुनगी पर बैठ गया. मां कुर्सी पर बैठी थी, उसी तरफ देखती और वो बातें करने लगी. अकेली. या चांद से.

बेटी की इच्छा हुई आगे बढ़ के चुप्पा चुप्पा सुने. पर नहीं उठी.


 

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