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जयंती विशेषः भूलने के विरुद्ध एक शख्सियत निर्मल वर्मा

हिंदी की दुनिया में निर्मल वर्मा ऐसे कथाकार उपन्‍यासकार और चिंतनशील गद्य लेखक हैं जो अपनी भाषा और मंथर गति से शांत धीर बहती हुई किस्‍सागोई से पहचाने जाते हैं. मनुष्‍य के चित्‍त और चैतन्‍य, नियति और प्रारब्‍ध के जटिल सूत्रों का उद्धाटन करने वाले निर्मल वर्मा की जयंती पर उनके लेखन व्‍यक्‍तित्‍व पर प्रकाश डाल रहे हैं समालोचक ओम निश्‍चल

लेखक निर्मल वर्मा लेखक निर्मल वर्मा

हमारी स्मृति में किसी भी लेखक की नहीं, उसके लिखे की छवि होती है. निर्मल वर्मा को जिन्होंने पढ़ा है, वे जानते हैं कि गद्य का वैभव क्या होता है. बिना किसी कोलाहल के शब्दों का असर क्या होता है. निर्मल वर्मा ऐसे ही लेखकों में रहे हैं, जिनके गद्य का जादू आज भी बोलता है तथा जिनके लिखे को आज भी लोग याद करते हैं. अपने उपन्यास, कहानी, रिपोर्ताज, निबंध, यात्रा-वृत्तांत और अनुवाद सबमें उनकी मेधा अद्वितीय थी. उनके गद्य की त्वरा कुछ ऐसी थी जैसे बच्चा अपने कोमल पग रखता हुआ पृथ्वी पर चलता है. उनकी कहानियां पढ़ते हुए हमें जीवन की तमाम अदृश्य तहों में लेखक की गहरी पैठ का पता चलता है. 'धुंध से उठती धुन' पढ़ते हुए हम उस धूमगंधी गैरिकवसना लोकोत्सवा छवि में डूब जाते हैं जिसे उन्होंने अपनी आंखों और संवेदना से रचा है. जिन्होंने 'रात का रिपोर्टर', 'एक चिथड़ा सुख' और 'अंतिम अरण्य' या 'परिंदे' सहित उनकी अन्य कहानियां पढ़ी हैं, वे उनके जादू और सम्मोहन से मुक्त नहीं हो सकते.
    
निर्मल वर्मा को संसार विदा हुए अधिक दिन नहीं हुए. दुनिया में प्रतिदिन हजारों-लाखों लोग जन्म लेते और मरते हैं. किन्तु जिनके जीने की कोई अर्थवत्ता-मूल्यवत्ता होती है, वे सदैव याद किये जाते हैं. नास्ति येषां यशः काये जरामरणजम् भयम्. निर्मल वर्मा न केवल हिंदी जगत की बल्कि भारतीय साहित्य की एक ऐसी पुरोधा शख्सियत हैं जिन्हें बिसरा कर हम हिंदी साहित्य के वाग्वैभव को नहीं समझ सकते. निर्मल के बारे में सोचते हुए अक़्सर यह लगता है कि हिंदी के कथा साहित्य को भाषा, अनुभव, विचार, रूप, रस और गंध की इतनी सारी रंगतें सौंपने वाला लेखक कोई दूसरा नहीं है. 'परिंदे' कहानी से कथा साहित्य में एक मजबूत उड़ान भरने वाले निर्मल वर्मा की कहानियों में घटना-बहुलता बेशक कम हो- किन्तु उसमें सन्निहित एक - एक ब्यौरे की बारीकियों, अनुभव और भाषा की सघनता, विचारों के दबावों से सर्वथा अप्रतिहत कथ्य की मौजूदगी चित्त को बाँध लेती है.
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निर्मल वर्मा का निर्मल गद्य

निर्मल वर्मा के रचना संसार को जिन तत्वों ने समॄद्ध किया है, उनमें उनकी अध्यवसायिता, देश- विदेश के जन-जीवन की जटिलताओं के गहरे अध्ययन और हर वॄत्तांत को पूरी निस्संगता से रचने का योगदान प्रमुख है. उनकी कॄति 'साहित्य का आत्मसत्य' पढ़ते हुए पहले ही निबंध में भाषा के बारे में कही गयी उनकी बातें भाषा के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता को संजीदगी से दर्ज़ करती हैं. वे कहते हैं, भाषा के बारे में कुछ भी कहना अपनी छाया को पकड़ना है. वे आत्मान्वेषण का सबसे कारगर आयुध भाषा को ही मानते हैं. इसे और स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं, भाषा मनुष्य की देह का अदृश्य अंग है, जो उसे आत्म-दृष्टि देता है. उनके इस कथन से गुजरते हुए मुझे गद्य के बारे कहा गया अमॄतलाल वेगड़ का एक कथन याद आता है. उन्होंने लिखा है- हमारे देश की महिलाएं खुले में इस तरह स्नान कर सकती हैं कि अपने तन का एक भी अंग दिखने नहीं देतीं. अच्छे गद्य में भी यही बात होती है. अपने भीतर की कविता को वह दिखने नहीं देता. निर्मल के गद्य में भी कविता इस तरह अनुस्यूत है कि वह उसकी संरचना में अलग से लक्ष्य नहीं किया जा सकता.

मैं समझता हूं, एक अच्छे गद्य की पहचान का वैशिष्टय यही हो सकता है, जिसे अमॄतलाल वेगड़ अपने तरीके से और निर्मल वर्मा अपने तरीके से स्पष्ट करते हैं. निर्मल के गद्य में- कथा संसार में फैली-बिखरी काव्‍यात्मक सघनता इसका साक्ष्य है. निर्मल ने अपने जीवन को याद करते हुए कहा भी है कि उनकी मित्र मंडली ज्यादातर कवियों की ही थी, जिनमें नरेश मेहता, रघुवीर सहाय और आगे चलकर कृष्‍ण बलदेव वैद व अशोक वाजपेयी जैसे लोग रहे हैं. अचरज नहीं कि इस साहचर्य ने उनकी कहानियों को कविता की सी प्रभावान्विति में रचने की प्रेरणा दी हो. आखिर एक व्‍याख्यान में उन्होंने हाइडेगर की इस उक़्ति का हवाला देते हुए कहा है कि शुद्ध गद्य उतना ही काव्‍यात्मक होता है, जितनी कविता. इसलिए निर्मल के गद्य में कविता की-सी पारदर्शिता और ऐन्द्रियता के जो लक्षण दिखाई देते हैं वे इस जिद के कारण नहीं कि कोई कविता जैसी युक़्ति अपनाते हुए उन्होंने अपनी कहानियां रची हों, बल्कि इसलिए कि अच्छे गद्य में काव्‍यात्मकता का वैभव उसकी संरचना का अनिवार्य अंग है. यह उनकी कहानियों-उपन्यासों का काव्‍यात्मक जादू ही है, जिसके कारण मलयज उनके गद्य को धूपछांही गद्य की संज्ञा देते हैं, यानी जिसमें स्मॄति की कविता का गद्य तो है, वर्तमान की आंच में तपता सपाट मैदान गद्य नहीं. पर इतना तो वे भी कहते हैं कि शब्दों को बरतने का ढब उन्हें आता है.
    
ऊपर से देखने में उनके कथा संसार की बुनावट में एक तारतम्य दिखता है. भाषा न तो कहीं उच्छल है न स्थिर- वह एक प्रवहमान प्रशांत सरिता की तरह कलकल बहती दिखाई देती है. कभी-कभी एकरसता को बोध कराने वाली भाषा के भीतर कितने स्तर- कितनी गहराइयां, कितने वर्तुल और कितनी लयात्मकता है, यह उनकी कथा-सरिता में उतरने पर ही मालूम होता है. 'परिंदे' को जब नामवर जी ने 'नई कहानी की पहली कॄति' की संज्ञा दी थी तो उसके पीछे भी भाषा का यही जादू बोलता दीखता है. कहानी के हर पात्र की अपनी नियति है, सबका अपना-अपना अतीत है, परिंदे के लगभग सभी चरित्र -लतिका, डाक़्टर मुखर्जी और मिस्टर ह्यूबर्ट अपने-अपने अवसाद भरे अतीत के बावजूद जीवन के एक पड़ाव का हिस्सा हैं, जहां विराग का रागात्मक संगीत गूंजता है. नामवर जी सही कहते हैं, निर्मल की कथात्मक बुनावट की प्रभावत्ता इतनी भावप्रवण है कि उसके आगे न चरित्र याद रह पाते हैं न घटनाएं. घटनाएं और चरित्रादि सब निर्मल के तरल-सांद्र आख्यान में रच-बस जाते हैं. उनकी अलग से जैसे कोई सत्ता या देह नहीं दिखती. वे कहानी में अन्तर्भूत होते हुए इसी प्रवाह के वशीभूत हो उठते हैं और तब पाठक भी प्रवाह में बहता हुआ कथा के आखिरी छोर पर पहुंच कर निर्मल के जादू से ऐसे बंध-बिंध जाता है कि उसे उनसे कोई शिकायत नहीं होती.
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परिवेश नहीं, नियति और प्रकृति के कथाकार     
अक़्सर लोग उनकी कहानियों पर विदेशीपन का आरोप लगाते हुए उन्हें भारतीय निम्नवर्ग के जन-जीवन से वास्ता न रखने वाले कथाकार के रूप में देखते हैं. एक सीमा तक उनकी कहानियों की पृष्ठभूमि में विदेशी वातावरण अवश्य है, किन्तु अधिकांश ऐसी भी हैं जिनमें भारतीय परिवेश ही मुखर है. बहुतेरी कहानियों में शिमला और पहाड़ी इलाके के दृश्य देखे जा सकते हैं, जिसे उन्होंने बचपन से देखा और जिया है. वैसे भी, केवल परिवेश की केंद्रीयता ही कथाकार की परख का आधार नहीं होनी चाहिए. जटिल मानवीय अंतस्संबंधों की वैश्विक भावभूमि का जितना गहरा स्पर्श वे कर पाते हैं, वैसे दूसरे लेखक नहीं. यह कहना सही नहीं है कि वे महज इससे ही विदेशी भावभूमि के कथाकार हो गए हैं, बल्कि सच तो यह है कि वे मध्यवर्गीय जीवन की समझ रखने वाले ऐसे कथाकार हैं, जिनके यहां सर्वहारा की व्‍यथा-कथा की मुनादी बेशक नहीं बजती, किन्तु वे उन प्रवॄत्तियों, संवेदनाओं, सचाइयों से मुंह नहीं मोड़ते जो मनुष्य के स्थायी क्षोभ, दुख और संताप का आधार हैं. वे सत्ता, व्‍यवस्था और संस्थानों द्वारा मनुष्य की स्वतंत्रता के तनिक भी अपहरण का इंदराज़ बड़े संयत और संवेदी स्वरों में करते हैं. एक-एक स्थिति, परिस्थिति और उपस्थिति का बयान जैसा वे अपने सीघे-सरल वाक़्य विन्यास में साध पाते हैं, वैसा केवल किसी महान कलाकार की कूची से ही संभव है. जैसे लैंडस्केप, जैसा लोकेल वे अपनी कहानियों में बुनते-रचते हैं, वह जैसे उनका जिया, भोगा और अनुभूत लगता है. वे हर आख्यान के नैरेटर अथवा रचयिता नहीं, बल्कि सहभागी नजर आते हैं. 'मायादर्पण' में तरन की पीड़ा, बाबू का अकेलापन और बुआ की ममता के पीछे लगता है, जैसे लेखक खुद ही ऐसे जीवन का साक्षी रहा हो. इंजीनियर बाबू का यह कहना कि कुछ वर्षों में सब कुछ बदल जाएगा, तरन के लिए न भूतो न भविष्यति  की तरह है- एक ऐसा बदलाव जो शायद तरन के किसी काम का नहीं- उसके खंडित सपनों की इमारत में एक ईंट भी नहीं जुड़ती बदलाव की इस घोषणा से. यह एक निरर्थक बदलाव है उसके लिए. परिंदे में भी मैदानों की ओर उड़ते कुछ दिनों पहाड़ी स्टेशन पर बर्फ की प्रतीक्षा में बसेरा करते परिंदों को देख लतिका का यह सोचना उन सभी चरित्रों (वह, डॉ मुखर्जी और मि ह्यूबर्ट) की गंतव्‍यहीन प्रतीक्षाओं की ओर इंगित करता है. प्रश्न यह है कि परिंदे तो फिर भी उड़ जाएंगे पर वे कहां जाएंगे? कथा कहने की ऐसी बारीक कला, जिसमें जीवन की एक-एक गतिविधि अन्तर्घटना के सूत्र खुलते चले जाएं और वे मानवीय नियति के चरम को छू पाएं- निर्मल का सधा हुआ कथाकार तब गल्प को गल्प के दायरे से बाहर निकाल कर एक जीवन-दर्शन में बदल देता है.

    
निर्मल की कहानियों में अपनी सोच का दबाव कहीं भी नहीं है. अव्‍वल तो नैरेटर के रूप में कथाकार भरसक अपने को नेपथ्य में ही रखता है, पत्र बोलते हैं, स्थितियां बोलती हैं, भाषा बोलती है, संवेदना बोलती है, पर वह अपनी ओर से बहुत कम बोलता है. अपने विचारों के लिए निर्मल निबंधों का रास्ता अख्तियार करते हैं. वहां वे अपने बारे में, लेखक का अस्तित्व प्रमाणित करते हुए अपनी बात कहते हैं. अपने समय के तमाम संभ्रमों, कुहेलिकाओं, मताग्रहों पर अपने दो टूक विचार रखते हैं. वे साहित्य के प्रयोजन पर चलने वाली बहसों को निष्प्रयोजन मानते हैं. उनका मत है कि जब संगीत सुनते हुए या कोई मिनियेचर चित्र देखते हुए प्रयोजन का प्रश्न नहीं उठता तो यह मांग साहित्य से ही क़्यों की जाती है? और सच भी है, साहित्य का तो अर्थ ही सहित भाव से उत्पन्न होता है. निर्मल का मानना है कि साहित्य का आत्म सत्य उसके भीतर ही है, बाहर नहीं. वह बेशक हमारे समक्ष कोई जीने का लक्ष्य नहीं रखता, कोई विराट सत्य हमें नहीं देता, परन्तु वह यथार्थ के मुखौटे उतार कर मनुष्य को उसका सही चेहरा दिखाता है- और तब निर्मल कहते हैं, हम उस चेहरे से डरते हैं, जिसकी फोटो इतिहास व किसी पासपोर्ट के चित्र से मेल नहीं खाता, वह सिर्फ साहित्य में प्रकट होती है. साहित्य को प्रतिबंधित करने वाली सत्ताएं कदाचित इसीलिए साहित्य से भय खाती हैं कि वह उनका सही चेहरा पाठक के सामने लाता है.
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भारत और पश्‍चिम के अंतर्द्वंद्वों के बारीक विश्‍लेषक    
कला और विचार व साहित्य और विचार तथा विचारधारा पर तमाम बहसें हो चुकी हैं. आज भी साहित्य पर विचारधारा के वर्चस्व को थोपने की कोशिशें होती हैं. किन्तु कुछ लेखक कला की- साहित्य की शुद्धता के लिप विचार को तो महत्त्व देते हैं, विचारधारा को नहीं. निर्मल वर्मा ऐसे ही लेखकों में थे, जो यह मानते थे कि जहां विचार और साहित्य एक दूसरे का पोषण करते हैं, वहीं विचारधारा विष की तरह उसे खोखला करती है. निर्मल की भले कोई इस बात पर निंदा करे अथवा उन्हें कोई सुखी समाज का लेखक माने, किन्तु उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि यह निर्मल ही हैं जो यह कह सकते हैं, आप चाहें कि जीने का भोग-विलास, ऐश्वर्य भी उठाएं और लिखने की प्रसिद्धि भी तो यह असंभव है. उनके शब्दों में, लिखना बड़े त्याग की अपेक्षा रखता है -और आज के ज्यादातर लेखकों में त्याग नहीं बल्कि ऐश्वर्य और विलास की अभिलाषा ही बलवती दिखती है.

पिछले एक दशक से वे भारतीय संस्कॄति, राष्ट्र, धर्म, धर्मतंत्र, राजनीति तथा भारत और यूरोप की प्रतिश्रुतियों को लेकर आलोचकों की चर्चा के केंद्र में रहे हैं. भारत का अतीत उनके लिए केवल गौरव-गान का विषय नहीं था, बल्कि भारतीय परंपराओं के बरअक़्स पश्चिमी अंतर्द्वंद्वों को समझने का शास्त्र भी था. अपने विश्वासों और चिंतन के बल पर वे अपने आलोचकों के सवालों से अंत तक भिड़ते रहे. उनके सनातनी रुझान को सामने रखते हुए उनकी विचारधारा पर आक्रमण होते रहे हैं, पर निर्मल को इसकी कतई चिंता नहीं थी. वे कला और साहित्य को लेकर जितने सुचिंतित रूप से सोचते थे, अपने विचारों के स्पष्टीकरण के लिए भी वे अपने को उतनी ही उत्तरदायी मानते थे. उनका रचना संसार जितना कल्पना-प्रवण, भावप्रवण और सत्वग्राही है, उनके चिंतन की दुनिया भी उतनी ही शुद्ध, स्वाभिमानी और मानवीय है. आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत् उनके चिंतन का हेतु है. किन्तु मानवीय मूल्य बचे रहें, हमारी सांस्कॄतिक पहचान बनी रहे, हम अपनी परंपरा से विमुख न हों, यह कामना उनके कथा और वैचारिक संसार दोनों में समुज्ज्वलता के साथ प्रतिबिम्बित हुई है.
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आत्‍ममंथन और चिंतन से उपजी अंतर्दृष्‍टि
निर्मल वर्मा ने अपनी कहानियों, उपन्यासों के लिए एक नई भाषा चुनी है. साठ के दशक में यह भाषा साहित्यिक हल्के में एक खोज की तरह थी. इस भाषा में मनुष्य के एकांत-सुनसान और अंधेरे में व्‍याप्त सुख-दुख की हर पदचाप सुनाई देती है. दरअसल जिस अध्यात्म की चर्चा निर्मल जी यत्र-तत्र अपने निबंधों में करते हैं, वह अध्यात्म उनकी कहानियों में भी पर्यवसित दिखता है- वह भले स्पष्ट दृष्टिगोचर न हो, एक सांस की तरह वह उनकी कथा-चेतना में बसा हुआ है. अंतिम अरण्य में उनका अध्यात्म एक नए बोध, नए विश्वास के साथ सामने आता है. वे जीवन के अध्यात्म को साहित्य के अध्यात्म से जोड़ते हैं. साहित्य में जीवन की और जीवन में साहित्य की छाया देखने वाले निर्मल महज विचारधारा की लीक का अनुगमन करने वाले आलोचकों के लिए सदैव एक चुनौती रहे हैं. अकारण नहीं कि आलोचना के भटकाव पर उन्होंने एक निबंध ही लिखा है, जिसमें उन्होंने कहा है, हमारे यहां खूंटों से आधी हुई आलोचनाए एक तरफ हैं, जंगल में अरक्षित और अकेली घूमती हुई रचना दूसरी तरफ, बीच के बीहड़ को पार करने की हिम्मत बहुत कम में है. जिस दिन कोई घरेलू आलोचक अपनी जंजीर तोड़ कर वनैली रचना की आँखों में भभकते हुए स्वप्न की तरफ भागेगा, तब उस क्षण असली आलोचना जन्म ले पाएगी. यह किसी लेखक का दंभ नहीं है, उस निर्मल-हृदय आलोचक का वक़्तव्‍य भी है, जिसने खुद रेणु पर दिए अपने व्‍याख्यान में कहा था, रेणु जिस आँख से दुनिया को देखते थे, उनके आँसू में वह डबडबाती हुई चमकती थी. हम नहीं जान पाते हैं कि वह दुनिया के आँसू है, जो रेणु की आँखों में चमक रहे हैं या रेणु की आँख है, जिसमें दुनिया डबडबा रही है. निर्मल के भीतर प्रारंभ से ही एक ऐसी पैनी और चौकस दृष्टि सक्रिय रही है, जिसकी चमक में बुद्ध, श्री अरविंद, आनंदकुमार स्वामी और जे. कॄष्णमूर्ति जैसे चिंतकों की आभा झलकती है. वह सतत आत्ममंथन से उपजी और संवरी अंतर्दृष्टि है जो यथार्थ के आर-पार देखने की शक़्ति और साहस रखती है. निर्मल कहानी का अपना अलग छंद रचते हैं, उपन्यास कला को एक नई लय, एक नया विन्यास देते हैं. उनके शब्द शाश्वतता और चिरंतनता का अहसास दिलाते हैं, जैसे कहते हों, हम न मरै मरिहै संसारा.

निर्मल की संवेदना लगातार परिस्थितियों को उधेड़ती है. वह यथार्थ को सूक्ष्मतर अनुभवों में बदलने तक छीलती रहती है. अकारण नहीं कि उनके गद्य की मांसपेशियों के चीमड़ हो जाने की शिकायत करने वाले मलयज भी यह स्वीकार करते हैं कि निर्मल वर्मा की रचना की पारदर्शी चमड़ी के नीचे आप उस अनुभव को धड़कते सुन सकते हैं, छू सकते हैं. एक ऐसी पैस्टोरल इमेजरी उनकी कहानियों-उपन्यासों-रिपोर्ताजों में बुनी हुई होती है कि सब कुछ दृश्यमान हो उठता है.

निर्मल जी का लिखित गद्य जितना प्रभावी है, उनका वाचिक कथन भी उतना ही प्रभावी होता था. धीरे-धीरे वे विषय को एक सुर की तरह उठाते हुए उसे एक ऐसे चमकदार भाष्य में बदल देते थे कि लोग उन्हें सुनकर चकित हो उठते थे. शब्द उनकी अभ्यर्थना में जैसे भवदीय हो उठते. उनके भीतर विचारों का समुद्र भले ही थपेड़े खाता, गर्जन-तर्जन करता हो, किन्तु प्रकट में वह एक सरोवर के जल की तरह ठहरा, मंद-मंद लहरियां उठाता-सा लगता. उनके संस्मरणों और यात्रावॄत्तों की ताजगी में जल की-सी स्निग्धता 'धुंध से उठती धुन' और 'सुलगती टहनी' के पाठ में महसूस की जा सकती है. एक वेदना उनके समूचे कथा संसार में आवाजाही करती है. अकेलापन और आत्मसंघर्ष उनके चरित्रों की विशेषता है. उनकी कहानियों-उपन्यासों का टेक़्सचर और स्थापत्य उनकी पहचान का परिचायक है. उसका एक टुकड़ा उठा कर कहानियों के अंबार में रख दीजिए -उन्हें पढ़ने वाला उसे दूर से पहचान सकता है.
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तन और मन की मैल से बाहर आने की कोशिश
निर्मल का कथा संसार और निबंधात्मक लेखन एक-दूसरे के पूरक हैं. वे एक-दूसरे का मार्ग प्रशस्त करते हैं. इस संबंध में उनका यह कथन गौरतलब है- मैं अपने निबंधों और कहानियों में कोई फांक नहीं देखता. दोनों की तॄष्णाएं भले ही अलग-अलग हों, शब्दों के जिस जलाशय से वे अपनी प्यास बुझाते हैं, वह एक ही है. निबंध मेरी कहानियों के हाशिए पर नहीं, उसके भीतर के रिक़्त स्थानों को भरते हैं, जहां मेरी तॄष्णाएं सोती हैं. भूलने के विरूद्ध निर्मल वर्मा की शख्सियत और उनका लेखन व्याक्ति और साहित्य दोनों के आत्मसत्य का एक ऐसा साक्षात्कार है जो सदैव उनकी याद दिलाता रहेगा. वे एक ऐसे कथाशिल्पी के रूप में याद किए जाएंगे जिसने अपने पात्रों-चरित्रों के भीतर की अंतर्यात्राएं की, उनके दुख-अवसाद और खुशियों की चमक को बुहारा तथा संवेदना और समवेदना दोनों भाव से समव्‍यथी होने का परिचय दिया है. वे एक ऐसे चिंतक के रूप में अविस्मरणीय रहेंगे जिसने जड़ीभूत चिंतन की संकीर्णताओं से ऊपर उठ कर सनातन की साधना की है, सत्य का संधान किया है. 'अंतिम अरण्य' के उस वाक़्य पर गौर करें जो कहता है, क़्या कोई अपने तन की त्वचा और मन की मैल से बाहर आ सकता है? निर्मल का समूचा व्यक़्तित्व और कॄतित्व इसी तन की त्वचा और मन की मैल से बाहर आने की कोशिश है. वे मन की मैल धोने वाले एक ऐसे लेखक हैं, जिनके कॄतित्व का सारभूत संदेश जैसे केदारनाथ सिंह की इन पंक्तियों में छिपा है- इतनी गर्द भर गई है दुनिया में/ कि हमें खरीद लाना चाहिए एक झाड़ू/ आत्मा के गलियारों के लिए/ और चलाना चाहिए दीर्घ एक स्वच्छता अभियान अपने सामने की नाली से उत्तरी ध्रुवान्त तक. (तालस्ताय और साइकिल)

गिरिजाकुमार माथुर की एक पदावली है, छाया मत छूना मन, होगा दुख दूना मन. निर्मल दुख की सभी छायाएं छूते हैं और दुगुने होते दुख से भरे मन को परखते हैं. एक चिथड़ा सुख दुख के मन को परखने का ही एक उद्यम है जहां बिट्टी और डैरी तथा इरा और नित्ती जैसे अपने-अपने अजनबी बने संबंधों को जी रहे हैं और मुन्नू का किशोर मन इस टूटन और दुख की दैनंदिनी से आहत हो रहा है. रात का रिपोर्टर में रिशी और बिन्दू का प्रारब्ध भी कचोटता है, यद्यपि रिशी के प्रति वह आत्मदया नहीं उभरती जैसे एक चिथड़ा सुख में मुन्नू के प्रति. अक़्सर पात्रों में एक आत्मनिर्वासन का- सा भाव बना रहता है. वे जैसे ट्रेजेडीज़ के, दुखांतों के कथाकार नज़र आते हैं. आत्मा, मॄत्यु, अकेलापन, निस्संगता और दुख उनके जाने-पहचाने पद-प्रत्यय हैं, जो उनके कथा संसार में एक उदास गरमाहट भरते हैं. उनके यहां स्‍मृति एक अंतस्‍सूत्रता के साथ प्रवाहित होती है, कहानियों उपन्‍यासों दोनों में -भूलने के विरुद्ध निर्मल वर्मा की यह एक अचूक युक्‍ति और शक्‍ति है जिसके सघन गुणसूत्र ही साहित्‍य में निर्मल वर्मा का एक अलग ही प्रभामंडल रचते हैं.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

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