अपने लेखन में ख़लील जिब्रान महान दार्शनिक लगते हैं, तो चिंतक और विचारक भी. जीवन को करीब से देखना और अपने विचारों से समूची मानवता को दिशा देना उनकी ताकत रही है. पर वह प्रेम को भी समझते हैं, वह भी इस रूप में की उसपर इतनी उत्तम कविताएं लिख दें...इसे वही समझ सकता है, जिसने सच्चा प्रेम किया हो या ख़लील जिब्रान को डूबकर पढ़ा हो. यह कोई अचरज की बात नहीं कि बुद्ध की तरह ही ख़लील जिब्रान अपनी सूक्तियों, विचारों और कविताओं से ओशो तक को प्रभावित किया था.
साहित्य आजतक के पाठकों के लिए ख़लील जिब्रान की प्रेम पर लिखी दो श्रेष्ठ कविताएं-
प्रेम
1.
प्रेम किसी पर नियंत्रण नहीं रखता
न ही प्रेम पर किसी का नियंत्रण होता है
तब अलमित्रा ने कहा,
हमें प्रेम के विषय में बताओ
तब उसने अपना सिर उठाया
और उन लोगों की ओर देखा
उन सबों पर शांति बरस पड़ी
फिर उसने गंभीर स्वर में कहा
प्रेम का संकेत मिलते ही अनुगामी बन जाओ उसका
हालांकि उसके रास्ते कठिन और दुर्गम हैं
और जब उसकी बाहें घेरें तुम्हें
समर्पण कर दो
हालांकि उसके पंखों में छिपे तलवार
तुम्हें लहूलुहान कर सकते हैं, फिर भी
और जब वह शब्दों में प्रकट हो
उसमें विश्वास रखो
हालांकि उसके शब्द तुम्हारे सपनों को
तार-तार कर सकते हैं
जैसे उत्तरी बर्फीली हवा उपवन को
बरबाद कर देती है.
क्योंकि प्रेम यदि तुम्हें सम्राट बना सकता है
तो तुम्हारा बलिदान भी ले सकता है.
प्रेम कभी देता है विस्तार
तो कभी काट देता है पर.
जैसे वह, तुम्हारे शिखर तक उठता है
और धूप में काँपती कोमलतम शाखा
तक को बचाता है
वैसे ही, वह तुम्हारी गहराई तक उतरता है
और जमीन से तुम्हारी जड़ों को हिला देता है
अनाज के पूला की तरह,
वह तुम्हें इकट्ठा करता है अपने लिए
वह तुम्हें यंत्र में डालता है ताकि
तुम अपने आवरण के बाहर आ जाओ.
वह छानता है तुम्हें
और तुम्हारे आवरण से मुक्त करता है तुम्हें
वह पीसता है तुम्हें, उज्जवल बनाने को.
वह गूँधता है तुम्हें, नरम बनाने तक
और तब तुम्हें अपनी पवित्र अग्नि को सौंपता है
जहां से तुम ईश्वर के पावन भोज की
पवित्र रोटी बन सकते हो!
प्रेम यह सब तुम्हारे साथ करेगा
ताकि तुम हृदय के रहस्यों को समझ सको
और इस 'ज्ञान' से ही तुम
अस्तित्व के हृदय का अंश हो जाओगे.
लेकिन यदि तुम भयभीत हो
और तुम प्रेम में सिर्फ शांति और आनंद चाहते हो
तो तुम्हारे लिए यही अच्छा होगा कि
अपनी 'निजता' को ढक लो
और प्रेम के उस यातना-स्थल से बाहर चले जाओ
चले जाओ ऋतुहीन उस दुनिया में
जहां तुम्हारी हंसी में
तुम्हारी संपूर्ण खुशी प्रकट नहीं होती
न ही तुम्हारे रुदन में
तुम्हारे संपूर्ण आँसू ही बहते हैं
प्रेम न तो स्वयं के अतिरिक्त कुछ देता है
न ही प्रेम स्वयं के अलावा कुछ लेता है
प्रेम किसी पर नियंत्रण नहीं रखता
न ही प्रेम पर किसी का नियंत्रण होता है
चूंकि प्रेम के लिए बस प्रेम ही पर्याप्त है.
जब तुम प्रेम में हो, यह मत कहो
कि ईश्वर मेरे हृदय में हैं
बल्कि कहो कि
'मैं ईश्वर के हृदय में हूं'.
यह मत सोचो कि तुम प्रेम को
उसकी राह बता सकते हो
बल्कि यदि प्रेम तु्म्हें योग्य समझेगा
तो वह स्वयं तुम्हें तुम्हारा रास्ता बताएगा
'स्वयं' की परिपूर्णता के अतिरिक्त
प्रेम की कोई और अभिलाषा नहीं
लेकिन यदि तुम प्रेम करते हो
फिर भी इच्छाएं हों ही
तो उनका रूपांतरण ऐसे करो
कि ये पिघलकर उस झरने की तरह बहे
जो मधुर स्वर में गा रही हो रात्रि के लिए
करुणा के अतिरेक की पीड़ा समझने को
प्रेम के बोध से स्वयं को घायल होने दो
बहने दो अपना रक्त
अपनी ही इच्छा से सहर्ष
सुबह ऐसे जागो कि
हृदय उड़ने में हो समर्थ
और अनुगृहीत हो एक और
प्यार-भरे दिन के लिए
दोपहर विश्राम-भरा और प्रेम के
भावातिरेक से समाधिस्थ हो
और शाम को कृतज्ञतापूर्वक
घर लौट जाओ
इसके उपरांत सो जाना है
प्रियतम के लिए
हृदय में प्रार्थना और ओठों पर
प्रशंसा का गीत लिए हुए.
- मूल रचनाः ख़लील जिब्रान
- अनुवादः विजयलक्ष्मी शर्मा
2.
जब प्रेम तुम्हें बुलाये, उसके साथ जाओ,
यदि प्रेम तुम्हे ताज पहनाता है तो यह तुम्हें सलीब पर भी लटकायेगा,
यदि यह तुम्हें बड़ा करता है तो यह तुम्हारी काट-छांट भी करेगा.
जैसे यह तुम्हारी ऊंचाई तक पहुँच कर सूरज में कांप रही नर्म शाखाओं को सहलाता है,
वैसे ही यह तुम्हारी जड़ों तक उतर कर उन्हें ज़मीन से हिला भी देता है.
यह तुम्हें मक्के की पूलियों की तरह अपने में समेटता है,
निरावरण कर देने के लिये तुम्हें कूटता है.
यह तुम्हें तुम्हारे छिलकों से आज़ाद करता है.
यह तुम्हें पीसता है उजलेपन के लिये
यह तुम्हें तब तक गूंथता है जब तक तुम इकतार नहीं हो जाते.
और तब यह तुम्हें उसकी पवित्र आग में झोंक देगा,
ताकि तुम भगवान की पवित्र दावत में उसकी पवित्र रोटी बनो.
यह सभी चीजें तुम्हें प्रेम देंगी ताकि तुम अपने दिल के राज़ जान सको,
और यह ज्ञान ज़िन्दगी के दिल का टुकड़ा बनेगा.
पर यदि तुम अपने डर में सिर्फ प्रेम की शांति और प्रेम का सुख तलाशोगे,
तब फिर तुम्हारे लिये अच्छा होगा कि तुम अपनी नग्नता को ढक लो
और प्यार की पिसने वाली ज़मीन से निकल जाओ.
मौसम-विहीन संसार में तुम हंसोगे,
पर तुम्हारी सम्पूर्ण हंसी नहीं, और रोओगे, पर तुम्हारे सम्पूर्ण आंसू नहीं
प्रेम स्वयं के सिवा कुछ नहीं देगा और कुछ नहीं लेगा स्वयं से.
प्रेम नियंत्रण नहीं रखता न ही इसे नियंत्रित किया जा सकता है;
प्रेम के लिये प्रेम में होना काफी है.
जब तुम प्रेम में होगे तब तुम्हें नहीं कहना चाहिये
‘भगवान मेरे दिल में है’ तुम्हें कहना चाहिये ‘मैं भगवान के दिल में हूँ.’
और यह नहीं सोचो की तुम सीधा प्रेम तक जा सकते हो,
प्रेम के लिये, यदि वह तुम्हें अमोल पायेगा तो सीधा तुम तक आ जायेगा.
प्रेम की स्वयं को सम्पूर्ण करने के सिवा कोई ख्वाहिश नहीं होती.
पर यदि तुम प्रेम करते हो
और ख़्वाहिश करना जरूरी हो तो, इन्हें अपनी ख़्वाहिश बनाओ:
पिघलो और एक छोटी सी नदी की तरह बहो
जो रात को अपना संगीत सुनाती है.
बहुत अधिक प्रेम का दर्द जानो.
स्वयं के प्रेम की समझ से स्वयं को घायल करो;
और खुशी-खुशी अपने को लहूलुहान कर दो.
सुबह उठो खुले दिल के साथ
और एक और अच्छे दिन के लिये शुक्रिया कहो;
शाम को आराम करते हुए
और प्रेम के आनन्द का ध्यान करते हुए;
अहसान के साथ घर वापस लौटो;
और फिर सो जाओ एक प्रार्थना के साथ उन प्रियजनों के लिये
जो तुम्हारे दिलों में रहते हैं
और अपने होंठों पर प्रेम का गाना गाते हुए.
- मूल रचनाः ख़लील जिब्रान
-अनुवाद: विनीता यशस्वी